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कोरोना में अगर संसद सत्र नि​लंबित तो प्रधानमंत्री और कैबिनेट की क्या जरूरत

Janjwar Desk
16 Dec 2020 11:59 AM GMT
कोरोना में अगर संसद सत्र नि​लंबित तो प्रधानमंत्री और कैबिनेट की क्या जरूरत
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लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है विपक्ष, अगर विपक्ष की कोई भूमिका प्रधानमंत्री और उनकी कैबिनेट के आदेशों से निरस्त हो सकती है तो फिर ऐसी सरकार की जरूरत ही क्या है...

वरिष्ठ पत्रकार दिनकर कुमार की टिप्पणी

जनज्वार। कोरोना काल में चुनाव हो सकते हैं, लेकिन संसद का शीतकालीन सत्र आयोजित नहीं हो सकता। मोदी सरकार के इस हास्यास्पद तर्क की वजह से इस बात में कोई संदेह नहीं रह गया है कि कोरोना उसके लिए एक हथियार ही है। वह संसदीय लोकतंत्र का गला घोटकर तानाशाही लागू करने में जुटी हुई है।

मोदी सरकार को अपने आईटी सेल और गुलाम यानी गोदी मीडिया पर पूरा भरोसा है और वह अपने निरंकुश फैसलों को जनता पर थोपकर किसी भी तरह के विमर्श की संभावना को खत्म कर देना चाहती है। उसने लोकतंत्र की तमाम संवैधानिक संस्थाओं को अपाहिज बना दिया है और निर्लज्जता के साथ देश की दौलत को कॉरपोरेट के हवाले करने में जुट गई है।

इससे पहले संसद का मानसून सत्र सितंबर में आयोजित हुआ था, जो हर लिहाज से संसद का अब तक का सबसे खराब सत्र रहा है। राज्यसभा में जब कृषि से संबंधित दो विधेयकों पर विचार किया जा रहा था, तब संसदीय लोकतंत्र का मजाक उड़ाया गया था। एक संक्षिप्त चर्चा के बाद उपाध्यक्ष ने सभी संसदीय प्रक्रियाओं और नियमों का उल्लंघन करते हुए किसान बिलों को पारित करवा दिया।

अध्यादेशों को अस्वीकार करने के लिए वोटिंग के वैधानिक प्रस्ताव को रखने की मांग को नजरअंदाज कर दिया गया था। बिलों को एक समिति को संदर्भित करने के प्रस्तावों को अनुमति नहीं दी गई। अंत में विपक्षी सदस्यों द्वारा रखे गए विभिन्न संशोधनों पर विभाजन की मांग को खारिज कर दिया गया और वॉयस वोट द्वारा बिल को पारित किया गया।

सरकार को पता था कि उसके पास इन विधानों के माध्यम से बिल को ले जाने के लिए कोई बहुमत नहीं था, जिसके कारण यह दबंग जैसा व्यवहार किया गया, जिससे एक मौलिक नियम का उल्लंघन हुआ कि यदि कोई भी सदस्य विभाजन का अनुरोध करता है, तो संख्याओं की गणना करके वोट लिया जाना चाहिए।

प्रक्रियाओं और नियमों के इन प्रमुख उल्लंघनों ने स्वाभाविक रूप से विपक्षी सदस्यों को विरोध करने के लिए मजबूर किया। सरकार की प्रतिक्रिया एक सप्ताह के लिए सदन से आठ सदस्यों को निलंबित करने की थी। निलंबित किए गए सदस्यों में से कई ऐसे थे, जिन्होंने एक विभाजन के लिए अपने अधिकार की मांग की थी, जैसे कि सीपीआई (एम) के ई करीम और केके रागेश।

सांसदों के दमन के इस प्रयास के चलते संसद के परिसर के अंदर गांधीजी की प्रतिमा के सामने आठ निलंबित सांसदों ने दिन-रात धरना दिया। विपक्ष ने राज्यसभा के शेष सत्र का बहिष्कार किया जो 23 सितंबर को समाप्त हो गया।

संसद के बारे में मोदी सरकार का व्यवहार पहले स्पष्ट था, जब सत्र के लिए प्रश्नकाल को समाप्त कर दिया गया था। सरकार यह नहीं बता सकी कि बैठने की व्यवस्था में शारीरिक दूरी और मास्क पहनने जैसी महामारी संबंधी प्रतिबंधों के चलते संबंधित मंत्री से सवाल पूछने में संसद सदस्यों को कैसी कठिनाई होगी। सदस्यों को सवाल पूछने और सरकार को जवाबदेह ठहराने के प्राथमिक अधिकार से वंचित कर दिया गया।

संसद के प्रति मोदी सरकार के उपेक्षापूर्ण रवैये को लिखित प्रश्नों के उत्तर में देखा गया था। सरकार ने जवाब दिया कि उसके पास उन प्रवासी श्रमिकों की मौतों का कोई डेटा नहीं है जो महामारी की अवधि के दौरान अपने घरों की तरफ लौटकर गए थे। सरकार ने यह भी कहा कि उसके पास असम के डिटेंशन कैंपों में कैद व्यक्तियों की संख्या का कोई आंकड़ा नहीं था, जबकि उसने पिछले साल संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान उन आंकड़ों को पेश किया था।

संसदीय कार्यप्रणाली को कुचलने का एक और पहलू सत्र में पेश किए गए सभी विधेयकों को स्थायी समिति के पास या इसे किसी चुनिंदा समिति के पास भेजने से सरकार द्वारा इंकार करना था। संसदीय प्रणाली में यह चर्चा और छानबीन का एक सामान्य व्यवहार है जिसमें गहनता की आवश्यकता होती है।

पिछले नौ महीनों में सरकार द्वारा घोषित ग्यारह अध्यादेशों को बिलों द्वारा प्रतिस्थापित किया जा चुका है गया था। एक को छोड़कर, कोई भी अध्यादेश किसी भी तात्कालिक मामले से संबंधित नहीं था जो महामारी द्वारा उत्पन्न असाधारण स्थिति से जुड़ा हो। सरकार ने संसद को अप्रासंगिक बनाने के लिए अध्यादेश मार्ग को सुविधाजनक पाया है।

अध्यादेश को बदलने के संबंधित कानून को स्थायी समिति को इस आधार पर संदर्भित नहीं किया जा रहा है कि अध्यादेश की घोषणा के 6 सप्ताह के भीतर संसद द्वारा इस तरह का विधेयक पारित किया जाना जरूरी होता है।

संसद का मजाक लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थानों पर व्यापक हमले का हिस्सा है। नागरिकों के अधिकारों पर एक व्यापक हमला है; यूएपीए और एनएसए जैसे बर्बर कानूनों का उपयोग; प्रतिरोध का निषेध करते हुए असंतोष का दमन; 'राष्ट्र-विरोधी' के रूप में अल्पसंख्यकों, बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं को निशाना बनाना और मीडिया को डराना मोदी सरकार का काम करने का तरीका बन गया है।

20 दिनों से देश के किसान राजधानी दिल्ली को घेरकर तीन किसान बिलों को निरस्त करने की मांग कर रहे हैं। कायदे से ऐसे गंभीर मुद्दे पर संसद में विमर्श करने और निर्णय लेने की जरूरत थी। लेकिन वर्तमान में जब एक व्यक्ति ने ही खुद को संसद से भी बड़ा मान लिया हो, तब संसद प्रणाली को गर्त में धकेलकर किसानों को देशद्रोही संबोधित करने के लिए मीडिया के श्वानों को छोड़ दिया गया है और न्यायपालिका को भी इस किसान विद्रोह को कुचलने के काम पर लगा दिया गया है।

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