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पत्रकारों के लिए भारत उतना ही खतरनाक जितना इराक या अफगानिस्तान

Janjwar Desk
11 Dec 2020 9:10 AM GMT
पत्रकारों के लिए भारत उतना ही खतरनाक जितना इराक या अफगानिस्तान
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हमारे देश में पत्रकारों की हत्या या उन पर हिंसा के बाद हत्यारों पर सरकार या पुलिस की तरफ से कोई कार्यवाही नहीं की जाती, इन आंकड़ों से यह समझना आसान है कि देश में सरकार और पुलिस की मिलीभगत से पत्रकारों की ह्त्या की जाती है...

वरिष्ठ लेखक महेंद्र पाण्डेय की टिप्पणी

इस वर्ष भारत में अपने काम के दौरान तीन पत्रकारों की हत्या कर दी गई, जबकि आतंक के साए से जूझ रहे अफगानिस्तान, इराक और नाइजीरिया में भी इतने ही पत्रकार मारे गये। पूरी दुनिया में इस वर्ष अपने काम के दौरान कुल 42 पत्रकार मारे गए, जिसमें सर्वाधिक संख्या मेक्सिको के पत्रकारों की है, जहां अब तक 13 पत्रकार मारे जा चुके हैं।

इसके बाद पाकिस्तान का स्थान है, जहां 5 पत्रकार मारे गए। इसके बाद भारत का स्थान है। इन आंकड़ों को इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स ने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस यानी 10 अक्टूबर को जारी किया है। इसी दिन डच सरकार और यूनेस्को ने संयुक्त तौर पर पत्रकारों पर बढ़ते खतरे के सम्बन्ध में एक ऑनलाइन वैश्विक कांफ्रेंस भीे आयोजित किया था।

इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स पिछले तीस वर्षों से पत्रकारों की स्थिति पर वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित करता रहा है। इस फेडरेशन के 6 लाख सदस्य हैं, जो लगभग 150 देशों में फैले हैं। पिछले तीस वर्षों के दौरान कुल 2658 पत्रकारों की ह्त्या उनके काम के दौरान की जा चुकी है। पिछले 5 वर्षों के दौरान 4 वर्षों में मेक्सिको पहले स्थान पर रहा है। मेक्सिको की सरकारें बदलती हैं, पर पत्रकारों की हालत नहीं बदलती। इस फेडरेशन के जनरल सेक्रेटरी ऐन्थोनी बेल्लान्गेर के अनुसार पिछले कुछ वर्षों के दौरान पत्रकारों की ह्त्या के आंकड़े कम होते जा रहे हैं, पर इसका कारण इनकी स्थिति में सुधार नही,ं बल्कि सरकारों द्वारा ऐसी खबरों को दबाना है।

फेडरेशन के प्रेसिडेंट यूनेस जाहेद के अनुसार अधिकतर देशों ने पत्रकारों की हत्या के बदले बिना किसी आरोप के ही उन्हें जेलों में बंद करना शुरू कर दिया है। इस वर्ष दुनिया में लगभग 235 पत्रकारों को बिना किसी आरोप के ही जेल में डाला गया है। जेल में बंद करने पर ज्यादा हंगामा भी नहीं होता और पत्रकार को शांत कराने का काम भी हो जाता है।

10 दिसम्बर को ही सर्वोच्च न्यायालय की तमाम तल्ख टिप्पणियों के बाद भी नए संसद भवन का भूमिपूजन आयोजित किया गया। दरअसल मोदी सरकार की अनेक कामों में जल्दीबाजी ही संशय को जन्म देती है और नए संसद भवन के साथ भी ऐसा ही हो रहा है। इतनी जल्दीबाजी और तमाम कटु टिप्पणियों के बाद भी नए संसद भवन के काम को आगे बढाते रहने का सम्बन्ध कम से कम लोकतंत्र से तो कतई नहीं हो सकता। दरअसल यह कवायद उन सम्राटों के समकक्ष खड़ा होने की है, जिन्होंने आलीशान किले, दुर्ग या दूसरी इमारतें बनवाईं।

प्रधानमंत्री मोदी भी विराट संसद भवन और ऊंची मूर्तियों के बल पर उनके बराबर पहुँचाना चाहते हैं, भले ही इसके लिए लोकतंत्र का गला घोटना पड़े। मोदी सरकार में सबसे मीडिया ही सबसे अधिक गिरा हुआ स्तम्भ है। जाहिर है चाटुकारों से भरी मीडिया से इस तानाशाही को लोकतंत्र की खाल में लपेटना सरकार के लिए आसान है। निष्पक्ष मीडिया के नाम पर थोडा सी जान सोशल मीडिया या फिर स्थानीय समाचार पत्रों या वेब न्यूज पोर्टल के कारण है, और इसी से जुड़े पत्रकार मारे जाते हैं या फिर जेल में डाले जाते हैं।

कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स नामक संस्था वर्ष 2008 से लगातार हरेक वर्ष ग्लोबल इम्पुनिटी इंडेक्स प्रकाशित करती है। इसमें पत्रकारों की हत्या या फिर हिंसा से जुड़े मामलों पर कार्यवाही के अनुसार देशों को क्रमवार रखती है। इस इंडेक्स में जो देश पहले स्थान पर रहता है वह अपने यहाँ पत्रकारों की ह्त्या के बाद हत्यारों पर कोई कार्यवाही नहीं करता।

ग्लोबल इम्पुनिटी इंडेक्स में भारत का स्थान 12वां था, जबकि 2019 में 13वां और 2018 में 14वां। इसका सीधा सा मतलब है कि हमारे देश में पत्रकारों की हत्या या उनपर हिंसा के बाद हत्यारों पर सरकार या पुलिस की तरफ से कोई कार्यवाही नहीं की जाती। इन आंकड़ों से यह समझना आसान है कि देश में सरकार और पुलिस की मिलीभगत से पत्रकारों की ह्त्या की जाती है।

इस इंडेक्स में सोमालिया, सीरिया और इराक सबसे अग्रणी देश हैं। पाकिस्तान 9वें स्थान पर और बांग्लादेश 10वें स्थान पर है। दुनिया के केवल 7 देश ऐसे हैं जो वर्ष 2008 से लगातार इस इंडेक्स में शामिल किये जा रहे हैं और हमारा देश इसमें एक है। जाहिर है, वर्ष 2008 के बाद से देश में पत्रकारों की स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है।

भारत से अधिक संवेदनशील पत्रकारिता पड़ोसी देश अफगाानिस्तान में की जा रही है, जहां पिछले 10 वर्षों के दौरान 100 से अधिक पत्रकार मारे जा चुके हैं। पर, हरेक ऐसी ह्त्या के बाद निष्पक्ष पत्रकार झुकाते नहीं, बल्कि उनकी एक नई पौध सामने आ जाती है। तालिबान की तमाम धमकियों के बाद भी बड़ी संख्या में महिलायें भी निष्पक्ष पत्रकारिता कर रही है। अनेक महिला पत्रकारों की हत्या भी की गई है। 9 दिसम्बर को ही जलालाबाद में मलालाई मैवंद नामक एक महिला टीवी रिपोर्टर और महिला अधिकार कार्यकर्ता की गोली मारकर हत्या की गई है।

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