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मई दिवस विशेष : कोरोना महामारी में भारत के मजदूरों की बदहाली

Janjwar Desk
1 May 2021 11:12 AM GMT
मई दिवस विशेष : कोरोना महामारी में भारत के मजदूरों की बदहाली
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एक साक्षात्कार में गृहमंत्री अमित शाह ने कहा, कुछ लोगों ने धैर्य खो दिया और सड़कों पर चलना शुरू कर दिया, यह एक बेहद असंवेदनशील बयान था...

जनज्वार, डेस्क।आज 1 मई यानी मई दिवस है. मई दिवस श्रमिकों के संघर्ष को याद करने का दिन है. आज के दिन दुनिया भर के मजदूरों के संघर्षों और बलिदानों को याद कर उनके जीवन की बेहतरी के लिए आवाज़ उठाने का दिन है.

मई दिवस की जड़ें अमेरिका के मजदूर आंदोलन से जुड़ी हैं. 19वीं शताब्दी में मजदूरों ने अपने काम के घंटों को 8 करवाने के लिये व्यापक तौर पर कई दशकों तक संघर्ष किया था. इससे पहले मजदूरों से 14 से 18 घंटे तक काम लिया जाता था. मजदूरों को फैक्ट्रियों, कारखानों में सूर्यास्त से लेकर रात होने तक काम करना पड़ता था। आज मई दिवस के रूप में उन तमाम मजदूर आंदोलनकारियों के संघर्ष और बलिदानों को याद किया जाता है.

भारत में मजदूरों की स्थिति

हमारे देश में कुल कामगारों की संख्या 60 करोड़ है. जिसमें असंगठित क्षेत्रों में 42 करोड़ मजदूर काम कर रहे हैं. इन मजदूरों का वर्गीकरण- घर से काम करने वाले श्रमिक, स्ट्रीट वेंडर, बोझा ढोने वाले श्रमिक, ईट-भट्टा मजदूर, चर्मकार, कचरा उठाने वाले, घरेलू कामगार, धोबी, रिक्शा चालक, भूमिहीन मजदूर, खेतिहर मजदूर, निर्माण मजदूर, बीड़ी मजदूर, हथकरघा मजदूर आदि के बतौर किया जाता है।

देश की आजादी से अब तक हमारे देश की बड़ी अर्थव्यवस्था को आकार देने में देश के श्रमिक वर्ग का सबसे ज्यादा योगदान है. यह देश के खेतिहर मजदूरों और औद्योगिक मजदूरों के योगदान से ही संभव हुआ है. भारत में श्रमिक वर्ग की बदहाल स्थिति किसी से छिपी नहीं है.

कोरोना काल में भारत के औद्योगिक और खेतिहर मजदूर

पिछले वर्ष 2020 से कोरोना महामारी का प्रसार देशभर में शुरू हुआ है. इस दौरान देश के श्रमिक वर्ग को सबसे ज्यादा नुकसान और असुरक्षा झेलनी पड़ी है. चाहे यह आर्थिक मोर्चे पर हो या सुरक्षा के मोर्चे पर हो या फिर स्वास्थ्य के मोर्चे पर हो. पिछले वर्ष सरकार ने कोरोनावायरस के प्रसार की रोकथाम के लिए देश भर में लॉकडाउन लगा दिया था. यह लॉकडाउन देशभर के प्रवासी मजदूरों की समस्याओं को नजरअंदाज करते हुए लगाया गया था. मजदूरों के नियोजन के लिए कोई तैयारी नहीं की गई थी. देशभर में मजदूरों का पलायन शुरू हो गया.

सरकारों द्वारा प्रवासी श्रमिकों की अनदेखी का सवाल बड़े स्तर पर हम लोगों के सामने आया था. इन मजदूरों को ठेकेदारों कंपनियों, दफ्तरों और जिन भी लोगों के ऊपर वे आश्रित थे ने उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया. बीमारी की दहशत, कामबंदी, भुखमरी का डर और पुलिस की सख्ती के चलते प्रवासी मजदूरों के सामने ऐसे हालात पैदा हो गए कि उन्हें पैदल अपने घरों की ओर लौटना पड़ा.

8 मई को महाराष्ट्र के औरंगाबाद में 16 मजदूरों की रेलवे ट्रैक पर सोते वक्त मौत हो गई. 16 मई को यूपी के औरैया जिले में दो ट्रकों की आपस में भिड़ंत से 24 मजदूरों की मौत हुई और दर्जनों घायल हुए. हादसे का शिकार हुए मजदूर बिहार, झारखंड व पश्चिम बंगाल के थे.

मजदूरों के लिए उत्पन्न संकट की स्थिति के लिए भारत सरकार में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने श्रमिकों को ही दोषी ठहरा दिया था. एक टेलीविजन चैनल को दिए गए साक्षात्कार में भारत के गृहमंत्री ने कहा "कुछ लोगों ने धैर्य खो दिया और सड़कों पर चलना शुरू कर दिया."

यह भारत के गृहमंत्री के द्वारा दिया गया एक बेहद असंवेदनशील बयान था. इस लॉक डाउन के बाद धीरे-धीरे अनलॉक की प्रक्रिया शुरू हुई तब सरकारों ने औद्योगिक मजदूरों के अधिकारों में कटौती करनी शुरू कर दी। कई राज्यों की सरकारों ने अर्थव्यवस्था को गति देने के नाम पर मजदूरों के शोषण की कंपनी और नियोक्ताओं को छूट दे दी, जिसका ट्रेड यूनियनों ने विरोध भी किया.

इसी कोरोनकाल में भारत सरकार ने 44 केंद्रीय श्रम कानूनों को खत्म कर चार श्रम संहिताओं को लागू कर दिया. इन श्रम संहिताओं के नाम पर सरकार ने कामगार वर्ग के अधिकारों में कटौती कर कारखाना मालिकों, नियोक्ताओं को मजदूरों के शोषण और दमन की छूट देदी है. इन श्रम संहिताओं के बारे में आप विस्तार से इस लिंक पर क्लिक करके जान सकते हैं...

श्रम-सुधारों के नाम पर कामगार वर्ग को धकेला जा रहा शोषण की खाई में, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और यूनियनों ने किया प्रदर्शन

पिछले वर्ष द्वारा उत्पन्न स्थिति 2021 के शुरुआत में कुछ हद तक नियंत्रण में आयी थी. श्रमिकों ने अपने काम पर दोबारा लौटना शुरू कर दिया था. मार्च 2021 से ही कोरोना की दूसरी लहर का प्रसार भारत में शुरू हो गया. कोरोना की दूसरी लहर को भारत सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया, जिस कारण दूसरी लहर ने विकराल रूप ले लिया है.

कोविड संक्रमण के इस विकराल रूप के चलते दिल्ली में फिर लॉकडाउन लगाना पड़ा.लॉकडाउन लगते ही दिल्ली में काम करने वाले औद्योगिक मजदूरों, दिहाड़ी मजदूरों के लिए जीवन यापन का खतरा उत्पन्न हो गया. पिछले बार की तरह ही सरकार ने श्रमिकों की मूलभूत समस्याओं को नजरअंदाज करते हुए लॉकडाउन लगा दिया. एक बार फिर से देश की राजधानी दिल्ली से बड़े पैमाने पर श्रमिकों का पलायन शुरू हो गया है.

कामबंदी के चलते दिल्ली में मजदूरों के आगे जीवन यापन का संकट फिर से गहरा गया है. हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद सरकार ने प्रवासी मजदूरों के लिए कुछ घोषणाएं की हैं. हाईकोर्ट ने 19 अप्रैल को दिल्ली सरकार को निर्देश जारी करते हुए कहा था कि मजदूरों को जरूरी चीजें मुहैया करवाई जाएं. लॉकडाउन की वजह से उन्हें परेशानी नहीं होना चाहिए. इसके बाद मजदूरों को आर्थिक मदद देने का फैसला किया गया.

कोर्ट में दाखिल दिल्ली सरकार के हलफनामे के मुताबिक रजिस्टर्ड कंस्ट्रक्शन वर्कर्स को 5000 रुपये की आर्थिक मदद दी जाएगी. वही प्रवासी मजदूरों की पहचान और मदद के लिए कमेटी गठित की जाएगी और उनकी मदद की जाएगी. इन घोषणाओं के बीच दिल्ली से मजदूरों का पलायन लगातार जारी है. घर लौट रहे मजदूरों का साफ कहना है कि उन्हें सरकार पर बिल्कुल विश्वास नहीं है. सरकार द्वारा की गई घोषणाएं जमीन पर काम करती नजर नहीं आ रही है.

देश में मजदूरों की स्थिति पर ईरानी कवि सबिर हका की कविता "शहतूत" जिसका हिन्दी अनुवाद गीत चतुर्वेदी ने किया है, बिल्कुल सटीक बैठती है-

क्या आपने कभी शहतूत देखा है,

जहाँ गिरता है, उतनी ज़मीन पर

उसके लाल रस का धब्बा पड़ जाता है.

गिरने से ज़्यादा

पीड़ादायी कुछ नहीं.

मैंने कितने मज़दूरों को देखा है

इमारतों से गिरते हुए,

गिरकर शहतूत बन जाते हुए.

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