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कृषि बिलों की वापसी, चुनावी मजबूरी न कि हृदय परिवर्तन

Janjwar Desk
23 Nov 2021 2:17 PM GMT
कृषि बिलों की वापसी, चुनावी मजबूरी न कि हृदय परिवर्तन
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देश में गैर-कृषि रोजगार सृजन बहुत कम है। इसलिए कृषि कानून की आड़ में खेती—किसानी का मशीनीकरण श्रमिकों की स्थिति सीमांत किसानों की तुलना में ज्यादा बदतर हो जाएगी। सबसे बड़ी बात यह होगी कि यह जीवन के एक तरीके को ही नष्ट कर देगा।

कृषि बिलों की वापसी पर प्रोफेसर अरुण कुमार का विश्लेषण

किसानों और सरकार के बीच एक साल से अधिक समय तक गतिरोध के बाद, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरु नानक देवजी के प्रकाश पर्व के अवसर पर तीनों कृषि बिलों को वापस लेने की घोषणा की। तीनों बिल एक साल से किसानों और सरकार के बीच विवाद की वजह बने हुए थे।

बिल लाने की जल्दी क्या थी?

सरकार ने जून, 2020 में जब पहली कोरोनावायरस लहर चरम पर थी, तब तीन कृषि बिलों को लागू करने के लिए एक अध्यादेश जारी किया था। इसके तुरंत बाद किसानों ने बिल के खिलाफ अपना विरोध शुरू कर दिया था। अब सवाल ये है कि इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर अध्यादेश लाने की जल्दी क्या थी? जाहिर है, कॉरपोरेट दिग्गजों की मदद करना सरकार के एजेंडे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था। क्योंकि उस वक्त विरोध प्रदर्शन की अनुमति नहीं थी तो सरकार को लगा कि यह कानून जबरदस्ती थोपे जा सकते हैं। अगले संसद सत्र में अध्यादेशों को विधेयकों में बदलना ज़रूरी था। पर बिना उचित बहस के विधेयकों को पारित किया गया। यहां सवाल वही है कि बिलों को इतनी जल्दी आगे बढ़ाना ज़रूरी क्यों था? जबकि विरोध पहले ही भड़क चुका था? पहले किसान अपने अपने राज्यों में विरोध कर रहे थे लेकिन उसके बाद किसानों ने अपना विरोध तेज कर दिया और नवंबर 2020 में किसान दिल्ली की सीमा पर आ गए। उन्होंने महसूस किया कि राज्यों में विरोध प्रदर्शन का उतना असर नहीं होता है, जितना कि दिल्ली में विरोध का है। वे रामलीला मैदान में विरोध करना चाहते थे, लेकिन उन्हें दिल्ली की सीमाओं पर रोक दिया गया और यहीं पर लगभग एक साल से प्रदर्शन कर रहे हैं।

संसद द्वारा विधेयकों को निरस्त करने की वर्तमान घोषणा किसानों की जीत है। यह और भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि वर्तमान सत्तारूढ़ सरकार गलतियों को स्वीकार नहीं करती है और अपने एजेंडे के साथ आगे बढ़ती है। भले ही विपक्ष और लोकतांत्रिक आवाजें कुछ भी कहें। उदाहरण के लिए, विमुद्रीकरण का निर्णय और जीएसटी कार्यान्वयन दोनों ही गलत फैसले थे, लेकिन सरकार ने बिना अपनी गलती को स्वीकार किये इन्हें आगे बढ़ाया। महामारी से प्रेरित लॉकडाउन के कारण अर्थव्यवस्था के पतन के संबंध में यह स्पष्ट था कि मांग कम थी और गरीबों को अपने हाथों में पैसे की सख्त जरूरत थी, लेकिन सरकार ने अपने व्यापार-समर्थक एजेंडे को जो आपूर्ति पक्ष नीतियों पर आधारित है को जारी रखा। जबकि पहला बिंदू, एक अल्पकालिक उपाय है, जिसका तत्काल प्रभाव पड़ता, लेकिन दूसरा एक दीर्घकालिक उपाय है, जो तब तक काम नहीं करेगा जब तक कि मांग पुनर्जीवित न हो जाए। लेकिन सरकार ने अपनी नीति नहीं बदली।

हृदय परिवर्तन चुनावी मजबूरी

तो क्या किसानों को जश्न मनाना चाहिए और अपना आंदोलन वापस लेना चाहिए? किसान नेताओं को भी पता है कि यह कदम उत्तर भारत में और महत्वपूर्ण रूप से यूपी में आगामी चुनावों के कारण उठाया गया है। यहां तक कि आरएसएस ने भी अपनी हालिया बैठक में भाजपा को सलाह दी थी कि उत्तर प्रदेश महत्वपूर्ण है और किसानों के विरोध का समाधान निकालने की जरूरत है। ताकि इससे होने वाले नुकसान को कम से कम किया जा सके। बीजेपी को यह भी एहसास है कि अगर यूपी हार गए तो 2024 के राष्ट्रीय चुनावों में भी नुकसान होगा।

स्पष्ट है कि सरकार की ओर से हृदय परिवर्तन चुनावी है। इसलिए नहीं कि यह किसानों के तर्कों से आश्वस्त है कि तीन कृषि बिल सुधार नहीं हैं, बल्कि विकृत हैं। वे किसानों की स्थिति को सुधारने के बजाय और खराब करेंगे। वे कृषि के बाज़ारीकरण और निगमीकरण को बढ़ावा देने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं जो केवल अधिकांश किसानों की स्थिति में गिरावट का कारण बन सकते हैं। छोटे और सीमांत किसानों को अपनी जमीन खोने और अपने ही खेतों में मजदूर बनने का खतरा महसूस हो रहा है। चूंकि, बढ़ते मशीनीकरण के कारण देश में गैर-कृषि रोजगार सृजन बहुत कम है, इसलिए श्रमिकों के रूप में उनकी स्थिति वर्तमान में सीमांत किसानों के रूप में जो है उसकी तुलना में बदतर हो जाएगी। सबसे बड़ी बात यह होगी कि यह जीवन के एक तरीके को ही नष्ट कर देगा।

ऐसा नहीं है कि किसान अपनी बदहाल स्थिति में बदलाव नहीं चाहते हैं। लेकिन उनका तर्क है कि तीन विधेयकों से उनकी पहले से ही खराब स्थिति और बिगड़ जायेगी । कोई आश्चर्य नहीं कि वे लंबे समय से जोरदार विरोध कर रहे हैं। किसानों का विरोध कोई नया नहीं है। 2019 के राष्ट्रीय चुनावों से पहले, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, दिल्ली के आसपास और अन्य जगहों पर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। उनकी मांग लाभकारी मूल्य, गारंटीकृत एमएसपी और एपीएमसी मंडियों को जारी रखने की रही है। इनमें से किसी की भी गारंटी यह बिल नहीं दे रहे थे।

बाजारीकरण और निगमीकरण

व्यापार समर्थक होने के कारण सरकार ने केवल बाजार आधारित समाधान पर जोर दिया है। लेकिन इससे उन लोगों को मदद मिलती है जिनके पास पूंजी है और जिनकी बाजार में मजबूत स्थिति है। यानि यह कारपोरेटरों के लिए लाभकारी सौदा है। सरकार ने किसानों की मांगों को बाजार विरोधी के रूप में देखा है और इसलिए उन्हें स्वीकार नहीं किया। आज अधिकांश अर्थशास्त्री और ज़्यादातर राजनीतिक दल भी बाजार समर्थक हैं और वे 1991 से बाज़ार आधारित सुधारों पर जोर दे रहे हैं।

एक आधार पर सरकार सही है, जब कहती है कि अधिकांश अर्थशास्त्री और राजनीतिक दल तीन विधेयकों द्वारा सुझाए गए सुधारों के पक्ष में हैं। सरकार का यह कहना भी सही है कि चर्चा लंबे समय से चल रही है और ऐसा नहीं है कि आम सहमति नहीं है। मुद्दा ये है कि सुझाए गए सुधारों पर किसके बीच आम सहमति है? इतना तो तय है कि इसमें किसानों की सहमति नहीं है। इसके अलावा, कृषि में 'मुक्त' बाजार संभव नहीं हैं, क्योंकि बाजार आपस में जुड़े हुए हैं। किसान जो ऋण लेते हैं, उसके कारण उन्हें अपनी फसल अपने लेनदारों को बेचनी पड़ती है और वह भी कटाई के तुरंत बाद। इसलिए, उनके पास जहां चाहें बेचने के लिए बहुत कम 'विकल्प' होते हैं।

जब संकट की बात आई, तो अमीर किसानों को भी एहसास हुआ कि तीन विधेयकों में जो प्रस्ताव हैं, उससे वे बुरी तरह आहत होंगे। 85% छोटे और सीमांत किसान जो 2 हेक्टेयर से कम भूमि पर खेती करते हैं, वे तो बुरी तरह प्रभावित होंगे ही और नीति निर्माण में उनकी कोई आवाज भी नहीं होती है। आमतौर पर, अमीर और सीमांत किसानों के हितों में टकराव होता है, लेकिन वर्तमान स्थिति में वे मेल खाते हैं और इसीलिए, पिछले एक साल में कृषि विरोध का नेतृत्व करने वाले अमीर किसान और व्यापारी सीमांत और छोटे किसानों के हितों का भी प्रतिनिधित्व करते हैं।

आमतौर पर ऐसा होता है कि किसी भी आंदोलन में संपन्न वर्ग ही आगे बढ़कर नेतृत्व देता है क्योंकि गरीब विरोध का जोखिम नहीं उठा सकते हैं। लंबे समय से देश में गरीबों के शोषण के बावजूद हमने भारत में उन्हें विरोध करते कब देखा है? एकमात्र वर्ग जो वर्तमान आंदोलन में हाशिए पर रहा है, वह है खेत मजदूर। उन्हें बेहतर मज़दूरी की आवश्यकता है, लेकिन उन्होंने यह मुद्दा शायद ही कभी विरोध में उठाया हो। असल में, उनकी किस्मत किसानों के साथ जुड़ी हुई है। ज़ाहिर है खेती में कोई भी संकट उन पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा। इस मायने में उनके हितों का भी प्रतिनिधित्व आंशिक रूप से किसानों के विरोध से जुड़ा हुआ है।

सुधार के लिए प्रभावी ब्लू प्रिंट जरूरी

क्या कृषि कानूनों का निरस्तिकरण सत्तारूढ़ व्यवस्था के दिल में बदलाव का संकेत देता है? प्रधान मंत्री के भाषण के निष्पक्ष विश्लेषण से समझ में आता है कि ऐसा नहीं है। उन्होंने कहा है कि ये बिल छोटे किसानों की भलाई के लिए हैं। इसके अलावा उन्होंने कहा कि केवल कुछ ही किसान बिलों के विरोध में थे और वे सरकार के तर्क से सहमत नहीं थे। दूसरे शब्दों में प्रधानमंत्री ने कहा कि बिल सही थे लेकिन कुछ लोगों की समझ कमजोर है।इसलिए ये तो साफ है कि संसद द्वारा विधेयकों को निरस्त करने से किसानों की मांगों का कार्यान्वयन नहीं होगा। इसलिए ये तो साफ है कि संसद द्वारा विधेयकों को निरस्त करने से किसानों की मांगों का कार्यान्वयन नहीं होगा। वे बिलों के पारित होने से पहले, वहीं वापस आ जाएंगे जहां वे थे।


अगर प्रधानमंत्री किसी भी समिति का गठन करेंगे, जैसा उन्होंने कहा है, तो उसमें ज्यादातर बाजार समर्थक सुधारक होंगे। कुछ किसान नेता जिन्हें समिति में शामिल किया जा सकता है, शेष समिति के सामने हाशिये पर ही होंगे। सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त कमेटी भी एकतरफा थी। इसकी रिपोर्ट ने दिन का उजाला अभी तक नहीं देखा है और इसके एक सदस्य ने बिलों को निरस्त करने की घोषणा का विरोध किया है। यह संभव है कि समिति की रिपोर्ट को सरकार स्वीकार न करे या ठंडे बस्ते में डाल दे, या केवल आंशिक रूप से लागू करे। आखिरकार स्वामीनाथन समिति की रिपोर्ट को भी तो आंशिक रूप से ही लागू किया गया है।

किसानों के पास अपनी मांगों को सरकार से लागू कराने के लिए यूपी के चुनाव तक का समय है। लेकिन उनकी समस्या का समाधान सिर्फ कृषि में नहीं है। नीतियों का एक समग्र पैकेज होना चाहिए। इसमें श्रमिकों और सीमांत किसानों सहित समाज के सभी वर्गों के हितों को शामिल किया जाना चाहिए। यह अतीत में प्रयास किया गया है और फिर से किया जा सकता है। किसानों को अपनी वर्तमान जीत से उत्साहित होकर आगे प्रयास को तेज कर देना चाहिए।

संभावना है कि गतिरोध आगे भी जारी रह सकता है। किसानों को सरकारी हस्तक्षेप की जरूरत है जबकि सरकार पीछे हटना चाहती है। सरकार द्वारा गारंटीकृत एमएसपी स्वीकार किए जाने की संभावना नहीं है क्योंकि वह उसको व्यवहारिक नहीं मानती है। सैद्धांतिक रूप से सभी फसलों के लिए न्यूनतम कीमतों की घोषणा की जा सकती है। समस्या कार्यान्वयन में होगी। प्रशासनिक कठिनाइयों और भ्रष्टाचार को सुलझाना होगा और यह वर्तमान में भारतीय परिवेश में चुनौतीपूर्ण है।

लेकिन मौजूदा व्यवस्था क्या ठीक है? इसने सैकड़ों कठिनाइयों को जन्म दिया है और क्या यह करोड़ों किसानों और उनके परिवारों की जरूरतों को पूरा करता है? दरअसल, जहां चाह हो वहां मुश्किलों से पार पाने का रास्ता निकाला जा सकता है।

( प्रोफेसर अरुण कुमार : Indian Economy since Independence: Persisting Colonial Disruption' के लेखक हैं) ।


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