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केरल में प्रवासी मज़दूरों का बहिष्कार, सरकारी योजना हुईं सब बेकार

Janjwar Desk
21 April 2021 12:29 PM GMT
केरल में प्रवासी मज़दूरों  का बहिष्कार, सरकारी योजना हुईं सब बेकार
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केरल में बेहतर मज़दूरी कमाने की चाहत के साथ अपने-अपने गृह-राज्यों से आये प्रवासी मज़दूरों को इस तरह के पूर्वाग्रहों और उपेक्षा का बार-बार सामना करना पड़ता है। कभी-कभी यह सब इतना अधिक होता है कि कुछ मज़दूर तो इस तरह के व्यवहार के अब आदी हो गए हैं....

हरिथा जॉन की रिपोर्ट

"हम अपने घर का अहाता साफ कराने के लिए मलयाली मज़दूरों पर निर्भर रहते हैं लेकिन महीनों तक वे हमें नहीं मिलते हैं। ठीक कहा आपने ! प्रवासी मज़दूर तो खुले आम मिलते हैं लेकिन हमारी समस्या ये है कि उन पर हमारा विश्वास नहीं है, इसलिए हम उन्हें काम पर नहीं रख सकते हैं। हमें डर लगा रहता है कि वो कहीं हमें लूट न लें या हम पर कातिलाना हमला न बोल दें।', यह कहना है एक अस्सी साल के बूढ़े दम्पति का जो केरल के तिरुवंतपुरम ज़िले के तिरुमला स्थान के पास की एक हाऊसिंग सोसायटी में रहता है। तिरुवंतपुरम के श्रीकरीयम स्थान में रहने वाले एक अन्य परिवार का कहना है कि वे अपना मकान और जायदाद बेचने का मन बना रहे हैं क्योंकि उनके मोहल्ले में सैकड़ों की संख्या में प्रवासी मज़दूर रहते हैं। परिवार के एक सदस्य विजयन कहते हैं, "हम घर में अपनी बेटियों को अकेला नहीं छोड़ सकते।"

एक हत्या की तहक़ीकात के दौरान जब असम से आया एक प्रवासी मज़दूर गिरफ्तार हुआ था तब एर्नाकुलम ज़िले के पुलिस अधिकारी ने इस रिपोर्टर से कहा था, "जब कभी पड़ोस में कोई अपराध होता है तो वहां के बाशिंदे इलाक़े में रह रहे प्रवासी मज़दूरों के बारे में कानाफूसी करने लगते हैं। यहाँ तक कि पुलिस भी उन्हें ही कलंकित करने लगती है। बड़ी आसानी से प्रवासी मज़दूरों को अपराध या ग़ैर-क़ानूनी गतिविधियों से जोड़ दिया जाता है।"

केरल में बेहतर मज़दूरी कमाने की चाहत के साथ अपने-अपने गृह-राज्यों से आये प्रवासी मज़दूरों को इस तरह के पूर्वाग्रहों और उपेक्षा का बार-बार सामना करना पड़ता है। कभी-कभी यह सब इतना अधिक होता है कि कुछ मज़दूर तो इस तरह के व्यवहार के अब आदी हो गए हैं।

बिहार के गया से आये महेश कहते हैं, "कुछ लोग बस में हमारे बगल में बैठने में हिचकिचाते हैं। ना तो घरेलू परिवार और ना ही व्यावसायिक संस्थान हमें काम देते हैं। लोग हमारी तरफ शक की निगाहों से देखते हैं। लेकिन मैं हमारे प्रति लोगों के व्यवहार को ले कर बहुत चिंतित नहीं हूँ,इसका हमारे काम पर कोई असर नहीं पड़ता है।" वह पिछले 4 साल से केरल में चिकन की एक दुकान में काम कर रहा है। वो कहता है कि उसे अच्छी तरह पता है कि लोगों का नज़रिया उसके प्रति कभी नहीं बदलेगा।

केरल में पिछले 3 साल से निर्माण मज़दूर के रूप में कार्य कर रहे पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी से आये प्रवासी मज़दूर दनेश भी कुछ दर्द भरी घटनाओं का जिक्र करते हैं। वो बताते हैं,"एक बार एक ऑटो रिक्शा चालक ने 50 रुपये का बकाया वापिस नहीं किया। जब मैंने उससे बकाया माँगा तो वो मलयालम में चिल्लाने लगा। एक दूसरी घटना में एक बार मुझे ट्रेन की अपनी सीट से उठा दिया गया और यात्रियों ने मुझे शौचालय के पास की जगह पर खड़े होने को बोला।

केरल के Centre for Migration and Inclusive Development के अनुसार केरल में 3.5 मिलियन प्रवासी मज़दूर हैं। यह संगठन कहता है,"केरल दूसरे राज्यों से आये प्रवासी मज़दूरों पर बहुत ज़्यादा निर्भर है और प्रवास राज्य के आर्थिक-सामाजिक ताने-बाने के मूल में है।" यह संगठन प्रवासी मज़दूरों के सामाजिक समावेश,विकास और कल्याण के लिए काम करता है और एर्नाकुलम के पेरुम्बवूर स्थान में स्थित है। यह स्थान राज्य में प्रवासी मज़दूरों का मुख्य केंद्र माना जाता है।

हालांकि केरल की सरकार ने इनके समावेश को सुनिश्चित किया है लेकिन केरल के लोग इन्हें अपने समुदाय का हिस्सा बनाने से बचते रहे हैं। प्रवासी मज़दूरों से जुडी अनेक घटनाओं और पेरम्बवूर का जीशा हत्याकांड जैसी अपराधिक वारदातों तथा पुलिस द्वारा शुरू किये गए बहुत से नियमों ने इस तरह की पूर्वधारणाओं और रूढिवाद को जन्म दिया है। सच तो ये है कि मशहूर कवि स्वर्गीय सुगथाकुमारी ने एक बार उन्हें ऐसे "अशिक्षित अपराधी कहा था जो केरल में सांस्कृतिक तबाही को जन्म दे सकते हैं।"

केरल वासियों के लिए वे "भाई' या "अन्ना" ही होते हैं, उन्हें उनके नाम से नहीं पुकारा जाता है। लोग उन्हें "बंगाली' के रूप में ही पहचानते हैं, भले ही वे अलग-अलग राज्यों से आते हों। इसके अलावा, प्रवासी मज़दूर असंगठित क्षेत्र में ही काम करते हैं, वे किसी कर्मचारी संघ के सदस्य भी नहीं होते हैं। इसलिए उनका शोषण आसान हो जाता है।

'अतिथि मज़दूर'-मात्र प्रतीकवाद

समायोजन नीति के तहत, केरल सरकार राज्य के प्रवासी मज़दूरों को सरकारी आदेशों सहित सभी काग़जों में अतिथि थोजीलाली (अतिथि मज़दूर) कह कर सम्बोधित करती रही। हालांकि केरल में प्रवासी मज़दूरों की भलाई के लिए काम कर रहे विशेषज्ञ और कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह शब्द उचित नहीं है।

Centre for Migration and Inclusive Development (CMID) के बिनॉय पीटर, सची सांघवी और विष्णु नरेंद्रन द्वारा लिखे गए लेख 'Inclusion of Interstate Migrant Workers in Kerala and Lessons for India' में कहा गया था " सरकारी आदेशों सहित सभी दस्तावेजों में प्रवासी मज़दूरों को "अतिथि मज़दूर" सम्बोधित कर सरकार उन्हें पराया बना दे रही है। यह सबको ये याद दिलाना चाह रही है कि मज़दूर,जिन्हें देश के किसी भी हिस्से में काम करने,रहने और घूमने का मौलिक अधिकार है,'केरल के नहीं हैं'और जिनसे यह उम्मीद रखी जाती है कि काम ख़त्म होने पर वे अपने-अपने गांव लौट जायेंगे।"

लेख में यह भी कहा गया है,"हालांकि सरकार यह कहते हुए इसे महिमा मंडित करती है कि मज़दूरों को "सरकारी अतिथि" का दर्ज़ा दिया जाता है, लेकिन इस प्रतीकवाद की परिणिति परदेसियों को ना पसंद करने में व्याप्त हो जाती है क्योंकि मलयालियों की तुलना में मज़दूरों को 'कम सुविधाएँ' मिलने वाले वर्ग के रूप में पेश किया जाता है।

CMID के Co-founder और Executive director बिनॉय पीटर ने The News Minute को बताया कि परदेसियों को ना पसंद करने का फैशन वैसे तो पूरी दुनिया में हैं लेकिन केरल जैसा राज्य, जिसने प्रवास के चलते ही विकास की सीढ़ियां चढ़ी हैं, ऐसा नहीं कर सकता है। वो कहते हैं," जब हम दूसरे देश या राज्य में जाते हैं तो हम लोगों से एक अच्छे व्यवहार की उम्मीद रखते हैं। इसीलिये हमें भी यहाँ प्रवासी मज़दूरों के साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए। इसके बदले हम उन्हें "अतिथि मज़दूर" कहते हैं और उन्हें याद दिलाते हैं कि काम ख़त्म करके उन्हें अपने राज्य वापिस जाना है।"

प्रवासी मज़दूरों की ज़िंदगी बेहतर बनाने के लिए स्थानीय बाशिंदों के बीच प्रवासी मज़दूरों को स्वीकार करने की जागरूकता पैदा करनी होगी। बेनॉय आगे कहते हैं," मालिक मज़दूर को सही या औद्योगिक मानकों के आधार पर मज़दूरी नहीं देते हैं; सब्ज़ी बेचने वाले स्थानीय बाशिंदों के लिए उसे बगल हटने को कहते हैं और ऑटो रिक्शा चालक तो उससे पैसा ही छीन लेता है। इसलिए यहाँ लोगों के बीच हस्तक्षेप करना ज़रूरी है।"

पीटर कहते हैं," इस धारणा का, कि मज़दूर अपराधी होते हैं, ना तो कोई आधार है और ना ही यह सच है। कुछ लोग गलत विचार रखते हैं कि ये मज़दूर स्थानीय बाशिंदों से काम के अवसर छीन लेते हैं और ज़्यादा कमाने लगते हैं। बेनॉय कहते हैं," वे हर साल 1 ख़रब रूपया डाक से भेजते हैं। वे मेहनत से कमाया रुपया ही लेते हैं। वे अपनी आमदनी का बड़ा हिस्सा उन राज्यों में रह रहे अपने परिवारों को भेज देते हैं जहां से वे आते हैं।" बेनॉय यह भी बताते हैं कि ऐसे बहुत कम लोग या संगठन हैं जो इनके बीच काम करते हैं।

सरकार विभिन्न योजनाओं के माध्यम से हस्तक्षेप करती है

कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान राज्य में प्रवासी मज़दूरों के लिए केरल सरकार का हस्तक्षेप काफी समायोजित और प्रशंसनीय था। सरकार ने उनके लिए सामुदायिक रसोई और विशेष शिविरों का इंतज़ाम किया था जहां वे अपने घरों को जाने तक रुक सकते थे। लॉकडाउन से पहले राज्य सरकार ने उनके कल्याण के लिए बहुत सारी योजनाएं चालू की थीं। लेकिन इन सरकारी हस्तक्षेपों से उनका कितना कल्याण हुआ ?

1961 से ही तमिलनाडु और कर्नाटक से श्रमिक काम की तलाश में केरल आते रहे। बाद में 1990 के दशक में, जब पलक्कड़ ज़िले के कंजीकोडे में लोहा उद्योग फलने-फूलने लगा तब बिहार से मज़दूरों का पलायन केरल की ओर होने लगा। पिछले दो दशकों के दौरान तमिलनाडु और कर्नाटक के अलावा असम,पश्चिम बंगाल,उड़ीसा,झारखण्ड,बिहार और उत्तरप्रदेश से मज़दूरों का बहुत बड़ा रेला केरल आया है।

इत्तेफ़ाक़ से 2010 में केरल ऐसा पहला राज्य बन गया जिसने प्रवासी मज़दूरों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजना चालू की। केरल प्रवासी मज़दूर कल्याण योजना के तहत पंजीकृत प्रवासी मज़दूर को दुर्घटना बीमा या चिकित्सा सेवा के मद में 25,000 रुपये तक दिए जायेंगे। मज़दूर की मृत्यु होने पर उसके परिवार को 1 लाख रुपये के अलावा मृत शरीर पर मसाला लगाने और उसे गृह राज्य तक पहुँचाने का खर्च भी दिया जायेगा। योजना के तहत मिलाने वाले दूसरे लाभों में शामिल हैं मज़दूरों के बच्चों के लिए शिक्षा भत्ता और 5 साल बाद नौकरी से निकले जाने पर 25,000 रुपयों का फायदा।

देखा-देखी दूसरे सरकारी विभागों ने भी यह सुनिश्चित करने के लिए हस्तक्षेप किया कि प्रवासी मज़दूरों और उनके परिवारों को कुछ फ़ायदे और कल्याणकारी योजनाएं मुहैय्या कराई जाएँ। उदाहरण के लिए 2017 से ही राज्य साक्षरता अभियान मज़दूरों को हिंदी और मलयालम पढ़ाने का एक कार्यक्रम चला रहा है,जबकि कदंबश्री अभियान के तहत महिला प्रवासी मज़दूरों को भी इस समूह में शामिल करने के प्रयासों की शुरुआत की गई।

2010 में श्रम विभाग की Interstate Migrant Workers Welfare Scheme (ISMWWS) के तहत Kerala Building and Other Construction Workers Welfare Board (KBOCWWB) गठित कर मज़दूरों के कल्याण के लिए एक अलग फंड बनाया गया। इसके तहत मज़दूरों को 30 रूपए ( यह राशि उनके लिए आसान है ) से पंजीकरण करना होता है, साथ ही राज्य सरकार भी इस फंड में अपना योगदान देती है।

दूसरी जिन योजनाओं का फायदा मज़दूर उठा सकते हैं उनमे शामिल हैं चुकाए जा सकने वाले किराये वाली अपना घर गृह योजना और आवाज़ स्वास्थ्य बीमा योजना जिसके तहत केरल के सभी सरकारी और कुछ निजी अस्पतालों में 15,000 रुपये तक का मुफ़्त इलाज कराया जा सकता है।

लेकिन क्या ये योजनाएं असरकारी रहीं ?

उपरोक्त अध्ययन में CMID ने पाया कि श्रम विभाग द्वारा लागू की गई योजनाएं असरकारी नहीं रहीं। प्रवासी मज़दूरों के लिए शुरू की गई बहुत सारी योजनाएं या तो उन तक पहुंची ही नहीं या फिर उन्हें इस बारे में जानकारी ही नहीं थी। अपने लेख में CMID ने कहा है,"दिसंबर 2019-जनवरी 2020 में एर्नाकुलम ज़िले में किये गए अध्ययन में यह बात सामने आई कि 419 मज़दूरों के साक्षात्कार में पता चला कि उनमें से किसी ने भी ISMWW योजना के बारे में नहीं सुना था।"

लेख में कहा गया है कि चूंकि केरल आने वाले ज़्यादातर मज़दूरों को उनके गृह राज्य का ठेकेदार अनुबंधित नहीं करता है इसलिए ISMW क़ानून 1979 उन पर लागू नहीं होता है। ISMW क़ानून अंतर्राज्यीय प्रवासी मज़दूरों के रोज़गार को नियंत्रित करने और उनकी सेवाओं की शर्तों तथा कुछ दूसरे मुद्दों को पूरा करने के लिए लाया गया था। हालाँकि CMID के अनुसार केरल में काम कर रहे 2.5 मिलियन मज़दूरों में से 2016-2017 के दौरान इस क़ानून के तहत केवल 2,741 मज़दूर ही पंजीकृत हुए थे।

CMID बताता है कि यहाँ तक कि अपने-अपने राज्यों से नौकरी पर लिए गए और ठेकेदार द्वारा केरल लाये गए मज़दूरों में से ज़्यादातर पंजीकृत नहीं हैं। मज़दूरों का पंजीकरण 2012-2013 में 6,833 था जो बढ़ कर 2014-2015 में 11,011 हो गया। लेकिन फिर 2016-2017 में घट कर लगभग आधा हो गया।

ज़्यादातर मज़दूर आवाज़ स्वास्थ्य बीमा योजना के बारे में नहीं जानते थे। लेख में कहा गया है,"2019-2020 के दौरान जितने भी मज़दूर इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती हुए थे उनमें से किसी को भी आवाज़ योजना का फ़ायदा नहीं मिला था। अस्पताल का खर्चा उन्होंने अपनी जेब से दिया था या फिर अपने मालिकों की सहायता से।"

बेनॉय पीटर कहते हैं कि श्रम विभाग में मानव संसाधन की कमी के चलते इन प्रवासियों को बहुत कम सूचना दी जाती है और कम जागरूकता ही पैदा करी जा सकती है।

CMID का यह भी आरोप है कि राज्य सरकार आवाज़ के माध्यम से इन मज़दूरों का ब्यौरा इकठ्ठा करना चाहती है,वहीं यह योजना मज़दूरों पर निगरानी रखने के लिए उनके बायोमेट्रिक डाटा को जमा करने का एक प्रयास नज़र आती है,ना कि स्वास्थ्य एवं दुर्घटना बीमा उपलब्ध करने की नीयत रखने वाली योजना। बेनॉय आगे कहते हैं,"

ISMWWS पहले से ही मज़दूरों और उनके परिवार के सदस्यों को ये सेवाएं और दूसरे बहुत से लाभ पहुंचा रही है। इसके अलावा उनका बायोमेट्रिक ब्यौरा इकट्ठा करने से यह सन्देश जाता है कि ये लोग अपराधी हैं और हर हाल में इनका ब्यौरा इकठ्ठा किया जाना चाहिए।"

अपना घर गृह योजना भी प्रवासी परिवारों की असली ज़रूरतों को पूरा नहीं करती है। यह शायद ग़ैर-शादीशुदा पुरुष मज़दूरों के लिए ही लाभकारी रही है। बेनॉय के अनुसार इस योजना के तहत केरल में केवल एक ही घरेलू सुविधा काम कर रही है। इस सुविधा इकाई में 620 बिस्तरों का इंतज़ाम है। लेकिन डॉरमिटरी जैसी यह सुविधा उन मज़दूरों के लिए उचित नहीं है जो परिवार के साथ आते हैं।

बेनॉय कहते हैं कि सरकार को घरेलू मज़दूरों को ठीक-ठाक मकान उपलब्ध करने चाहिए, ना कि डॉरमिटरी और श्रमिक शिविर। इससे समायोजन ज़्यादा बढ़ेगा।

फिर भी, बेनॉय कहते हैं, तमाम कमियों के बावजूद प्रवासी मज़दूरों के लिए केरल बहुत अच्छी जगह साबित हुआ है। वे कहते हैं,"दूसरे राज्यों की तुलना में केरल में उनके साथ कम भेदभाव किया जाता है और उन्हें मज़दूरी भी ज़्यादा मिलती है।"

केरल में रोज़ मज़दूरी कर कमाने वाले प्रवासी मज़दूर को 600 से 800 रुपये रोज़ाना की दर से मज़दूरी मिलती है। वहीं एक मलयाली मज़दूर को 100 रुपये रोज़ाना मज़दूरी मिलती है। बिहार से आया एक मज़दूर महेश The News Minute को बताता है," हमारे राज्य में रोज़ाना मज़दूरी 200 या 300 रुपये ही है। इसलिए हमें इस बात को ले कर परेशानी नहीं होती कि स्थानीय लोगों की तुलना में हमें कम मज़दूरी मिलती है।"

मुंबई में बेस केरल के मानवाधिकार कार्यकर्ता जॉन अब्राहम कहते हैं,"प्रवासी मज़दूर अब केरल का हिस्सा वैसे ही हैं जैसे केरल के रहने वाले खाड़ी देशों का हिस्सा हो चुके हैं।"

वो कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि राज्य में एक भी ऐसा व्यक्ति है जो प्रवासी मज़दूरों की सेवा न लेता हो। निर्माण कार्य से ले कर रोज़ाना मज़दूरी वाले घरेलू कामों तक लोग उनकी सेवाएं हासिल करते हैं। फिर भी हम उनका आभार नहीं मानते हैं और उन्हें 'अलग' मानते हैं। हम उनके साथ अपराधियों जैसा बर्ताव करते हैं और उन्हें बीमारी फ़ैलाने वाला और ना जाने क्या-क्या कहते हैं। यह मानवाधिकारों के खिलाफ है और नस्लवाद का स्पष्ट उदहारण है।" आगे वो कहते हैं कि शिकायत निवारण इकाइयों का गठन भी होना चाहिए, खासकर केरल में प्रवासी मज़दूरों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए।

(हरिथा जॉन की यह रिपोर्ट पहले The News Minute में अंग्रेजी में प्रकाशित)

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