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रामविलास पासवान में क्या थी खासियत, जो कहे जाते थे राजनीति के मौसम विज्ञानी

Janjwar Desk
8 Oct 2020 6:56 PM GMT
रामविलास पासवान में क्या थी खासियत, जो कहे जाते थे राजनीति के मौसम विज्ञानी
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File photo

राजनीतिक गलियारों में कहा जाता था कि उनका आकलन काफी सटीक होता था और अक्सर वे चुनावों के पहले की लहर और जनता की सोच को भांप जाया करते थे, लिहाजा केंद्र में चाहे जिसकी सरकार बनती थी, उसके घटक दल के रूप में वे साथ खड़े मिल जाते थे...

जनज्वार ब्यूरो, पटना। केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान का गुरुवार को दिल्ली में निधन हो गया। वे एक ऐसे राजनेता थे, जो हवा का रुख भांप लेने में माहिर माने जाते थे, जिस कारण से उन्हें राजनीति का मौसम विज्ञानी भी कहा जाता था। वे अपनी राजनीतिक दूरदर्शिता की बदौलत पिछले दो दशकों से केंद्र की हर सरकार में मंत्री रहे, सरकार चाहे यूपीए की हो या एनडीए की। वैसे कहा जाता है कि पहली बार मौसम विज्ञानी उन्हें लालू प्रसाद ने कहा था।

राजनीतिक गलियारों में कहा जाता था कि उनका आकलन काफी सटीक होता था और अक्सर वे चुनावों के पहले की लहर और जनता की सोच को भांप जाया करते थे। लिहाजा केंद्र में चाहे जिसकी सरकार बनती थी, उसके घटक दल के रूप में वे साथ खड़े मिल जाते थे।

कभी कांग्रेस की सत्ता के खिलाफ इमरजेंसी के दौरान वह जेल गए तो उसी की अगुवाई वाली यूपीए सरकार में मंत्री भी रहे। तब जो बीजेपी उनकी नीतियों का विरोध करती थी उसी एनडीए की सरकार में पासवान मंत्री भी रहे।

अपने 5 दशक के लंबे राजनीतिक कैरियर में वे 9 दफा सांसद रहे। साल 1969 में पासवान ने अपना पहला चुनाव तब लड़ा और जीता था, जब नीतीश कुमार और लालू प्रसाद अपने छात्र जीवन मे ही थे।

रामविलास पासवान का जन्म पांच जुलाई 1946 को बिहार के खगड़िया जिले एक गरीब और दलित परिवार में हुआ था। उन्होंने उच्च शिक्षा ग्रहण की थी। बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी झांसी से एमए और पटना यूनिवर्सिटी से एलएलबी किया था। साल 1969 में पहली बार पासवान बिहार के चुनाव में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्‍मीदवार के रूप चुने गए थे।

1977 में पहली बार वे छठी लोकसभा में जनता पार्टी के उम्‍मीदवार के रूप में संसद चुने गए थे। उस वक्त उन्होंने हाजीपुर संसदीय सीट से रिकॉर्ड मतों से जीत हासिल की थी।

1982 में हुए लोकसभा चुनाव में पासवान दूसरी बार जीते। वे देश की दलित राजनीति के बड़े चेहरे थे। साल 1983 में उन्‍होंने दलित सेना का गठन किया तथा 1989 में नौवीं लोकसभा में तीसरी बार चुने गए। 1996 में दसवीं लोकसभा में वे फिर से निर्वाचित हुए। साल 2000 में पासवान ने जनता दल यूनाइटेड से अलग होकर लोक जन शक्ति पार्टी का गठन कर लिया था।

इसके बाद वह यूपीए सरकार से जुड़ गए और रसायन एवं खाद्य मंत्री और इस्पात मंत्री बने। पासवान ने 2004 में लोकसभा चुनाव जीता, लेकिन 2009 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था।

इसके बाद बारहवीं, तेरहवीं और चौदहवीं लोकसभा में भी वे विजयी रहे। अगस्त 2010 में बिहार से राज्यसभा के सदस्य निर्वाचित हुए और कार्मिक तथा पेंशन मामले और ग्रामीण विकास समिति के सदस्य बनाए गए।

राम विलास पहले जनता पार्टी से होते हुए जनता दल और उसके बाद जनता दल यूनाइटेड का हिस्सा रहे, लेकिन जब बिहार की सियासत के हालात बदल गए तो उन्होंने अपनी पार्टी बना ली।

एलजेपी की स्थापना के वक्त उन्होंने कहा था कि पार्टी का गठन सामाजिक न्याय और दलितों पीड़ितों की आवाज उठाने के मकसद से किया गया है। बिहार में दलित समुदाय की आबादी तो करीब 17 फीसदी बताई जाती है।

उनकी राजनीतिक समझ इतनी अच्छी थी कि उन्होंने खुद को कभी अप्रासंगिक नहीं होने दिया। यही वजह है कि 1977 में पहली बार लोकसभा चुनाव जीतने वाले पासवान ने 9 बार लोकसभा सांसद रहे। फिलहाल वो बीजेपी और जदयू के सहयोग से राज्यसभा सांसद थे।

हालांकि, जब उन्होंने एलजेपी की स्थापना की थी, तब वो यूपीए और लालू यादव के साथ थे। गठन के बाद एलजेपी ने 2004 के लोकसभा चुनाव में चार सीटें जीतीं। चार सीटों के साथ ही वो यूपीए का हिस्सा बने। आरजेडी भी उस वक्त कांग्रेस के साथ यूपीए सरकार का हिस्सा थी। राम विलास पासवान को केंद्र में मंत्री भी बनाया गया।

इसके बाद फरवरी 2005 में बिहार में विधानसभा चुनाव हुए। पासवान ने एक बड़ा दांव चला। केंद्र में वो कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार का हिस्सा रहे और बिहार में भी कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। लेकिन दूसरी तरफ यूपीए सरकार के ही सहयोगी लालू यादव की पार्टी आरजेडी के खिलाफ उन्होंने बिहार विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी उतार दिए।

पासवान की पार्टी ने इस चुनाव में शानदार प्रदर्शन किया और 29 सीटों पर जीत दर्ज की। दूसरी तरफ किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिल पाया। नीतीश कुमार और लालू यादव दोनों ही पासवान से समर्थन की कोशिश करते रहे लेकिन पासवान ने मुस्लिम मुख्यमंत्री की ऐसी मांग रखी कि दोनों नेताओं में से कोई भी राजी नहीं हुआ।लिहाजा, सरकार नहीं बन पाई और राष्ट्रपति शासन लागू हो गया।

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