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संस्कृति

नदी! तू इतनी दुबली क्यों है

Janjwar Team
13 Oct 2017 10:29 PM GMT
नदी! तू इतनी दुबली क्यों है
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नदी! तू इतनी दुबली क्यों है

और मैली-कुचैली मरी हुई इच्छाओं की तरह
मछलियाँ क्यों उतराई हैं तुम्हारे दुर्दिन के दुर्जल में...

आह! लेकिन स्वार्थी कारखानों का तेजाबी पेशाब झेलते
बैंगनी हो गई तुम्हारी शुभ्र त्वचा
हिमालय के होते भी तुम्हारे सिरहाने
हथेली भर की एक साबुन की टिकिया से
हार गईं तुम युद्ध - (नदी और साबुन) ‘गंगातट’

ज्ञानेन्द्रपति का ‘गंगातट’ मात्रा काशी की गंगा का तट नहीं है। वह आम भारतीय मानस की भागीरथी भी है, जो अपनी हिमालय जैसी विशाल प्राकृतिक संपदा के बावजूद विश्व बाजार और छद्म आधुनिक सभ्यता के थपेड़ों से धूल-धूसरित हो रही है। उनकी गंगा आमजन की वह शेष छवि है, जो दुबली और मैली-कुचैली होती जा रही है। जिसकी अपनी आकांक्षाएँ दुर्दिन के दुर्जल में मृत उतरा रही हैं।

उत्तरोत्तर आधुनिक होती दुनिया में कविता की प्रासंगिकता को बनाए रखने के लिए हिंदी के जो थोड़े से कवि कोशिश कर रहे हैं, ज्ञानेंद्रपति उनमें से एक हैं। पहाड़ों का अरण्यरोदन हो या ट्राम में लगी मधुबनी पेंटिंग, गुजरात की साबरमती नदी हो या ढेलहवा बाबा, दिनांत का आलू हो या मुंबई का भालू, इस ब्रह्मांड की तमाम घटनाओं पर कवि की नजर है। वह समय की हर दुखती रग पर अपनी उंगली रखता चलता है। बाजारवाद के बाद जिस विषय को ज्ञानेन्द्रपति ने बार-बार उठाया है वह बाल श्रमिकों की समस्या है।

आलोक धन्वा की तरह कहें, तो कवि इस छोटी-सी बात का विशाल प्रचार करता है, क्योंकि हमारा सब-कुछ टिका है इस छोटी-सी बात पर, कि आखिर खेलने की उम्र में ये बच्चे क्यों खटते हैं इस तरह? उनकी कविताओं का प्राणतत्व प्रकृति है। काल का सर्वग्रासी हमला प्रकृति पर ही है। आदमी भूल गया है कि वह हमला आत्मघाती है और वह दिन दूर नहीं, जब पशु-पक्षियों की प्रजातियों को नष्ट कर उनकी रक्षा के लिए अभयारण्य बना रहे मनुष्यों को अपने लिए भी अभयारण्य तलाशना होगा। ऐसे समय में, जब हिंदी कविता नागर कविता बन चुकी है, एक जटिल मनोबुझौवल। ज्ञानेंद्रपति उसमें लोकजीवन, प्रकृति और कस्बाई जद्दोजहद की जीवित धड़कनें भर रहे हैं। ‘चंद्रबिंदु की चिंता’ है उन्हें और ‘मूर्धन्य के लिए एक विदा गीत’ भी लिख रहे हैं वे। आइए पढ़ते हैं ज्ञानेन्‍द्रपति की कुछ कविताएं — कुमार मुकुल

नदी और नगर
नदी के किनारे नगर बसते है
नगर के बसने के बाद
नगर के किनारे से
नदी बहती है।

आए हैं दाता
आए हैं दाता
धवलहृदय भ्राता
गंगातट, आटे की लोई
नान्ह-नान्ह गोली पोई
पूँग रहें हैं जलचर-नभचर
गंगा की मच्छी औ' गौरैया-कबूतर
पुण्यप्रभ उज्ज्वल
आख़िर देते चल
हाथ लपेटे खाली झोली
अँगुरियन इत्ती नरम कि पोली
हाथ वह मुलायम मनजोर
पर छीने उसने कितनों के कौर
हालाँकि उसको प्रिय नमस्कार की मुद्रा है
मुद्रा को ही नमस्कार उसका, उसको बस मुद्रा मुद्रा मुद्रा है

ट्राम में एक याद
चेतना पारीक कैसी हो?
पहले जैसी हो?
कुछ-कुछ ख़ुुश
कुछ-कुछ उदास
कभी देखती तारे
कभी देखती घास
चेतना पारीक, कैसी दिखती हो?
अब भी कविता लिखती हो?

तुम्हें मेरी याद तो न होगी
लेकिन मुझे तुम नहीं भूली हो
चलती ट्राम में फिर आँखों के आगे झूली हो
तुम्हारी क़द-काठी की एक
नन्ही-सी, नेक
सामने आ खड़ी है
तुम्हारी याद उमड़ी है

चेतना पारीक, कैसी हो?
पहले जैसी हो?
आँखों में अब भी उतरती है किताब की आग?
नाटक में अब भी लेती हो भाग?
छूटे नहीं हैं लाइब्रेरी के चक्कर?
मुझ-से घुमन्तूू कवि से होती है टक्कर?
अब भी गाती हो गीत, बनाती हो चित्र?
अब भी तुम्हारे हैं बहुत-बहुत मित्र?
अब भी बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती हो?
अब भी जिससे करती हो प्रेम उसे दाढ़ी रखाती हो?
चेतना पारीक, अब भी तुम नन्हीं सी गेंद-सी उल्लास से भरी हो?
उतनी ही हरी हो?

उतना ही शोर है इस शहर में वैसा ही ट्रैफ़िक जाम है
भीड़-भाड़ धक्का-मुक्का ठेल-पेल ताम-झाम है
ट्यूब-रेल बन रही चल रही ट्राम है
विकल है कलकत्ता दौड़ता अनवरत अविराम है

इस महावन में फिर भी एक गौरैये की जगह ख़ाली है
एक छोटी चिड़िया से एक नन्ही पत्ती से सूनी डाली है
महानगर के महाट्टहास में एक हँसी कम है
विराट धक-धक में एक धड़कन कम है कोरस में एक कण्ठ कम है
तुम्हारे दो तलवे जितनी जगह लेते हैं उतनी जगह ख़ााली है
वहाँ उगी है घास वहाँ चुई है ओस वहाँ किसी ने निगाह तक नहीं डाली है

फिर आया हूँ इस नगर में चश्मा पोंछ-पोंछ कर देखता हूँ
आदमियों को क़िताबों को निरखता लेखता हूँ
रंग-बिरंगी बस-ट्राम रंग बिरंगे लोग
रोग-शोक हँसी-खुशी योग और वियोग
देखता हूँ अबके शहर में भीड़ दूनी है
देखता हूँ तुम्हारे आकार के बराबर जगह सूनी है

चेतना पारीक, कहाँ हो कैसी हो?
बोलो, बोलो, पहले जैसी हो?

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