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जनज्वार विशेष

जलवायु परिवर्तन पर मीडिया कर रहा कैसी रिपोर्टिंग जिससे नहीं पड़ रहा कोई असर

Prema Negi
26 Aug 2019 3:50 AM GMT
जलवायु परिवर्तन पर मीडिया कर रहा कैसी रिपोर्टिंग जिससे नहीं पड़ रहा कोई असर

सामान्य धारणा के विपरीत बहुत सरल शब्दों में जलवायु परिवर्तन जैसे विषय की रिपोर्टिंग दर्शकों को प्रभावित नहीं करती। जब रिपोर्टर जलवायु परिवर्तन के मामले में भारी-भरकम वैज्ञानिक शब्दों का प्रयोग करते हैं, तब लोगों को यह समस्या अधिक गंभीर लगती है...

महेंद्र पाण्डेय की रिपोर्ट

लवायु परिवर्तन और तापमान वृद्धि का व्यापक प्रभाव दुनिया भर में पड़ रहा है और इसकी चर्चा भी खूब की जा रही है। ऐसे में जाहिर है मीडिया भी इस मुद्दे को लगातार उठा रहा है पर इसका कोई असर दिखाई नहीं देता। दुनियाभर में जिन कारणों से जलवायु परिवर्तन हो रहा है, उसमें से किसी पर रोक नहीं लगी और न ही लोगों ने अपना रहन-सहन पर्यावरण अनुकूल बनाया। जाहिर है, मीडिया इस मुद्दे को उठा तो रहा है, पर इसका प्रभाव नहीं पड़ रहा है।

बोस्टन यूनिवर्सिटी की पत्रिका “द ब्रिंक” में इसी विषय पर एक लेख “हाउ टू कन्विंस अ क्लाइमेट चेंज स्केप्टिक डीनैयर्स बीलिटिल साइंस एंड इग्नोर पब्लिक ओपिनियन” प्रकाशित किया गया है। इसमें बोस्टन यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ़ कम्युनिकेशन की को-डायरेक्टर मिना से-वोगेल, कॉलेज ऑफ़ आर्ट्स एंड साइंस में अर्थ और एनवायरनमेंट की प्रोफेसर सूचि गोपाल और रोहन कुन्दर्गी के एक अध्ययन का हवाला दिया गया है। इस दल के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि जलवायु परिवर्तन की प्रभावी रिपोर्टिंग में किसी घटना की दूरी और रिपोर्टिंग की वैज्ञानिक भाषा बहुत महत्वपूर्ण होती है।

स दल ने अनेक देशों के विजुअल मीडिया में जलवायु परिवर्तन की खबरों के साथ दिखाए गए वीडियो का अध्ययन किया और देखा की जलवायु परिवर्तन के स्थानीय प्रभावों की रिपोर्टिंग के समय भी वीडियो सुदूर क्षेत्रों के प्रस्तुत किये जाते हैं। उदाहरण के तौर पर केरल की बाढ़ की रिपोर्टिंग या महाराष्ट्र के सूखा की रिपोर्टिंग में जलवायु परिवर्तन की चर्चा शुरू होते ही अलास्का, ग्रीनलैंड या फिर दक्षिणी ध्रुव की वीडियो चलने लगती है।

सूचि गोपाल के अनुसार ऐसे वीडियो देखने वालों पर कोई प्रभाव नहीं छोड़ते। लोग अपने शहर, राज्य या देश की खबर से प्रभावित होते हैं। यदि भारत की खबर है तो कश्मीर के लोग भी कन्याकुमारी की खबर से कुछ हद तक प्रभावित होते हैं, पर देश की सीमा से परे की जलवायु परिवर्तन की खबरें लोगों पर कोई असर नहीं डालतीं।

सी तरह सामान्य धारणा के विपरीत बहुत सरल शब्दों में जलवायु परिवर्तन जैसे विषय की रिपोर्टिंग दर्शकों को प्रभावित नहीं करती। जब रिपोर्टर जलवायु परिवर्तन के मामले में भारी-भरकम वैज्ञानिक शब्दों का प्रयोग करते हैं, तब लोगों को यह समस्या अधिक गंभीर लगती है।

नाडा में चुनावों के लिए बनाई गयी संस्था इलेक्शंस कनाडा ने फरमान जारी किया है कि अगले चुनावों के अभियान के दौरान जलवायु परिवर्तन को गंभीर समस्या बताने वाली रिपोर्टिंग नहीं कर सकती और न ही वहां के गैर-सरकारी संगठन इसके विरुद्ध कोई बड़ा आंदोलन कर सकते हैं। यदि इस आदेश का अनिपालन नहीं किया गया तो मीडिया घराने का लाइसेंस रद्द किया जा सकता है।

गैर-सरकारी संगठन ने यदि आदेश का उल्लंघन किया तो उसे एक राजनीतिक पार्टी का दर्जा दे दिया जाएगा और गैर-सरकारी संगठन के सभी अधिकार छीन लिए जायेंगे। कनाडा के कानूनों के अनुसार राजनीतिक पार्टियों द्वारा उठाये गए मुद्दों के विरूद्ध पूरे चुनाव अभियान के दौरान केवल दूसरी राजनीतिक पार्टियां ही बोल सकती हैं।

नाडा में कुल 6 राजनीतिक पार्टियों में से 5 के अनुसार जलवायु परिवर्तन एक गंभीर मुद्दा है और इसे आपातकाल मानकर निपटाना चाहिए। दूसरी तरफ, पीपल्स पार्टी ऑफ़ कनाडा के प्रमुख मैक्सिम बर्नी जलवायु परिवर्तन को मानव निर्मित समस्या नहीं मानते और न ही इसे गंभीर समस्या मानते हैं। इसलिए कोई भी ऐसा विज्ञापन, सर्वेक्षण या फिर आंदोलन जो जलवायु परिवर्तन के समर्थन में हो और जिससे किसी राजनीतिक पार्टी का सम्बन्ध न हो, पीपल्स पार्टी ऑफ़ कनाडा का विरोध माना जायेगा और इलेक्शन कनाडा के आदेश के अनुसार इसमें सम्मिलित वर्गों को चुनावों के लिए थर्ड पार्टी का दर्जा देकर सभी वर्त्तमान रियायतें छीन ली जायेंगी।

केले कनाडा में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में इलेक्शन कनाडा के इस आदेश पर लोग हैरान हैं और इस बीच जलवायु परिवर्तन और तापमान वृद्धि के नए असर रोज ही सामने आ रहे हैं।

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