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संस्कृति

लो अब तुम्‍हारा धर्म भी गया

Janjwar Team
21 July 2017 10:53 AM GMT
लो अब तुम्‍हारा धर्म भी गया
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'सप्ताह की कविता' में पढ़िए देश के कवि आर. चेतन क्रांति को

धूमिल के बाद आर.चेतन क्रांति ऐसे पहले कवि हैं, जिनके यहाँ चेतना का प्रतिवादी स्वर सर्वाधिक मुखर है। चेतन इस मामले में विशिष्ट भी हैं कि उन्हें धूमिल की तरह अपनी बातों को बल प्रदान करने के लिए किसी की पूंछ उठाने की जरूरत नहीं पड़ी है। ऐसे समय में जब हिंदी के तमाम चर्चित कवि कविता को माथापच्चीवाले खेल में तब्दील करते जा रहे हैं, चेतन अपने समय की विसंगतियों को न केवल उसकी जटिलता में चिन्हि‍त करते हैं, बल्कि सफलतापूर्वक उससे मोरचा लेते दिखते हैं। अपनी एक कविता में चेतन लिखते हैं -

धर्माचार्यो तुम्हारे दिन तो जा ही चुके थे बरसों पहले
लो, अब तुम्हारा धर्म भी गया
हत्या पर हत्या करके भी अब तुम उसे लौटा नहीं सकते...।

ऐसा नहीं है कि चेतन का यह रवैया मात्र धर्म के प्रति ऐसा दो-टूक हो, छद्म क्रांतिकारिता को भी वे अस्थिरता और स्थगन के रूप में देखते हैं।... हिंदी कविता में विष्णु खरे अकेले कवि हैं, जो विवरणात्मकता को अपनी ताकत बना पाते हैं। ऐसा वे अपने दृश्यांकन (आब्ज़र्वेशन) की क्षमता से कर पाते हैं। चेतन खरे की शैली को और विकसित करते हैं। और उनकी कविता ज्यादा मारक बनती जाती है - कुमार मुकुल

तुम्‍हारा क्‍या नहीं है सिवा राम के

ओ लंका के धर्म रक्षको !
सारे मृत्यु मंत्र
तुम्हारे पास पड़े हैं
यम के सारे दूत
श्रद्धावान ये सब हत्यारे
ये मृत्युपूजक
मानस पूत तुम्हारे
तैयार खड़े हैं ।

तो जब तक आएँ राम
बजे हत्या का डंका
ख़ून की प्यासी
रह न जाए
सोने की लंका
तिलक रक्त का चढ़ा
पहन कर असुरों का उत्साह
है मेरा शाप तुम्हें
तुम जाओ ताक़तवर की राह ।

ये विश्वमाता है

सपाट सोच, इकहरा दिमाग, दिल पत्थर.
सैकड़ों साल से ठहरी हुई काई ऊपर.
बेरहम सोच की खुदकश निगहबानी से फरार,
तुम जो फिरते हो लिए सर पे कदीमी तलवार.
तुमको मालूम भी है वक्त कहाँ जाता है,
और इस वक्त से इंसान का रिश्ता क्या है.

तुम जो पापों को दान-दक्षिणा से ढकते हो,
और भगवान् को गुल्लक बना के रखते हो.
तुम जिन्हें चीखकर ताकत का भरम होता है,
जुल्म से अपनी हुकूमत का भरम होता है.
तुम जिन्हें औरतों की आह मजा देती है,
जिनको इंसान की तकलीफ हंसा देती है.
तुम जिन्हें है ही नहीं इल्म कि ग़म क्या शै है,
कशमकश दिल की, निगाहों की शरम क्या शै है.

तुम तो उठते हो और जाके टूट पड़ते हो,
सोच की आंच पे घबरा के टूट पड़ते हो.
न ठहरते हो न सुनते हो न झिझकते हो,
राम ही जाने कि क्या-क्या अनर्थ बकते हो.
यूं कभी देश कभी धर्म कभी चाल-चलन,
असल वजह तो इस गुस्से की है ये ठोस बदन.
इससे कुछ काम अब दिमाग को भी लेने दो,
जरा सा गोश्त गमो-फ़िक्र को भी चखने दो.
रुको, सोचो तो कि इस मुल्क का मतलब क्या है,
इसकी हस्ती-ए-लामहदूद का शबब क्या है.

जोशे-कमज़र्फ इस मिट्टी को नहीं भाता है,
इसको दानां की उदासी पे प्यार आता है.
इसने हमलावरों को लोरियों से जीत लिया,
खून के वल्वलों को थपकियों से जीत लिया.
लेके लश्कर जो इसे जीतने आये बाबर,
इसका जादू कि उन्हीं से उगा दिए अकबर.
तंगनजरी से इसे जानना मुमकिन ही नहीं,
नफरतों से इसे पहचानना मुमकिन ही नहीं.
इसको जनना ही नहीं, पालना भी आता है,
सिर्फ भारत की माँ नहीं, ये विश्वमाता है ।

शाम को सिंगार करने वाली औरतें

उन्हें बताया गया कि वे वेश्याएं नहीं विवाहित हैं
सो दोपहर बाद वे पूरे हक़ से सिंगार करने बैठ जातीं

उन्हें यह भी कहा गया कि वे नौकरानियां नहीं
घर की मालकिन हैं
सो सजकर अपनी पूरी सामर्थ्य से
वे रसोई में कल से अच्छी सब्जी आज बनातीं

उन्हें कहा गया
कि यहाँ कोई उन्हें देखकर पैसे नहीं फेंकेगा
तो बेखटके आकर वे छज्जों पर जम जातीं

और इंतिजार करतीं
उनका
जिनके नाम पर वह घर था जिसमें वे रहती थीं
जिनके पास वे पैसे थे जिन्हें वे खर्च करती थीं
जिनके वे बच्चे थे जिन्हें वे पैदा करती
और पालती थीं

वे जब नुक्कड़ पर झूमते दिखते
लहराकर वे दरवाजा खोलतीं
और पूरे होशोहवाश में बिस्तर पर गिर कर बेसुध हो जातीं

शाम को सिंगार करने वाली औरतें
घर से ज्यादा दूर नहीं ले जायी जाती थीं
सो वे नहीं जान पाती थीं
कि वेश्याओं के मोहल्ले में भी यह सब
लगभग ऐसे ही होता है ।

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