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कोरोना का कुष्ठ रोगियों पर पड़ेगा व्यापक असर, भारत में हैं दुनिया के 50% से ज्यादा कुष्ठ रोगी

Janjwar Team
11 April 2020 11:00 AM GMT
कोरोना का कुष्ठ रोगियों पर पड़ेगा व्यापक असर, भारत में हैं दुनिया के 50% से ज्यादा कुष्ठ रोगी
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वर्ष 2005 में भारत सरकार ने WHO को बताया था कि अब इस देश से कुष्ठ रोग का उन्मूलन हो चुका है। इसके बाद इन रोगियों को मुफ्त मिलने वाली दवाएं बंद कर दी गयीं, इसके परिणाम से जल्दी ही यह रोग फिर तेजी से फ़ैलने लगा। वर्तमान में हरेक वर्ष दुनिया में जितने नए कुष्ठ रोगी आते हैं उनमें से 66 प्रतिशत से अधिक भारत में हैं...

महेंद्र पाण्डेय की टिप्पणी

कोरोना वायरस के बारे में लगातार कहा जाता रहा है कि यह सबसे अधिक प्रभाव फेफड़े के रोगियों और बुजुर्गों पर डालता है, पर अब नए अनुसन्धान और अध्ययन से ऐसे कई समूहों का पता चल रहा है जिनपर ये अधिक असर डाल सकता है और मृत्यु दर में तेजी ला सकता है। कुष्ठ रोग से पीड़ित मरीज या फिर इससे निजात पाए मरीजों पर भी यह वायरस घातक असर डाल सकता है। लेप्रा नामक कुष्ठ रोगियों पर कार्य करने वाली अंतर्राष्ट्रीय संस्था के हैदराबाद कार्यालय में विशेषज्ञ डॉ अपर्णा श्रीकांतन के अनुसार कुष्ठ रोग एक बैक्टीरिया, माइकोबैक्टीरियम लेप्री, से पनपता है और पेरीफेरल नर्व को प्रभावित करता है।

स रोग के बारे में अभी तक विज्ञान में पूरी जानकारी नहीं है, पर इसे दवाओं से ठीक किया जा रहा है। पूरी तरह ठीक होने के बाद भी इसके निशान पूरी तरह से नहीं जाते। निशान के जगह पर चमड़ी फट जाती है या फिर पैरों और हाथों में अकड़न रहती है। डॉ. अपर्णा के अनुसार स्वस्थ्य लोगों की सामान्य चमड़ी से भी जब इस वायरस का प्रसार हो रहा है, तो फटी चमड़ी वाले लोगों पर इसके प्रभाव को आसानी से समझा जा सकता है। दूसरी तरफ पूरी तरह से ठीक हो गए व्यक्ति भी हाथों में अकड़न के कारण अपना पूरा काम करने में असमर्थ रहते हैं। ऐसे लोगों के लिए हाथ धोना एक कठिन समस्या है, फिर वे बार-बार कैसे हाथ धो सकते हैं।

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र्ष 2005 में भारत सरकार ने विश्व स्वास्थ्य संगठन को बताया था कि अब इस देश से कुष्ठ रोग का उन्मूलन हो चुका है। इसके बाद इन रोगियों को मुफ्त मिलने वाली दवाएं बंद कर दी गयीं और साथ ही अन्य सुविधाएं भी बंद कर दी गयीं। इस रोग के निवारण का बजट बहुत कम किया गया और विशेषज्ञ डाक्टरों को दूसरी ड्यूटी पर लगा दिया गया। इसके परिणाम से जल्दी ही यह रोग फिर तेजी से फ़ैलने लगा। वर्तमान में हरेक वर्ष दुनिया में जितने नए कुष्ठ रोगी आते हैं उनमें से 66 प्रतिशत से अधिक भारत में हैं।

वर्ष 2005 तक कुष्ठ रोगियों के रहने का इन्तजाम सरकार करती थी, और अधिकतर शहरों के बाहरी हिस्सों में कुष्ठ रोगियों की कालोनी बसाई जाती थी। पर, वर्ष 2005 के बाद से ऐसी कॉलोनी बंद कर दी गयी, और पुरानी कॉलोनियों में ही इनकी संख्या बढ़ती गयी, जिससे हरेक कॉलोनी में लोगों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। इस भारी-भरकम सख्या के कारण ये लोग एक दूसरे से दूरी बनाकर भी नहीं रह सकते।

जो लोग कुष्ठ रोग से ठीक भी हो जाते हैं उनकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है क्योंकि इनमें दवाओं के कारण ऑटोइम्यून प्रतिक्रियाएं होतीं हैं। लन्दन स्कूल ऑफ़ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन में संचारी रोगों की विशेषज्ञ डॉ बारबरा डेबर्रोस के अनुसार कुष्ठ रोगियों पर कोरोना वायरस का घातक असर होगा क्योंकि कार्टीकोस्तेरोइड दवाएं, जो इनके उपचार के लिए दी जातीं हैं, वे रोग-प्रतिरोधक क्षमता को प्रभावित करती हैं। कमजोर रोग-प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों में ऐसे वायरस का खतरा बढ़ जाता है।

कुष्ठ रोगियों को लगातार देखभाल की जरूरत पड़ती है, पर लॉकडाउन के बाद इन्हें देखने स्वास्थ्यकर्मी और सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ता नहीं जा पा रहे हैं। लॉकडाउन में ये लोग अपनी कालोनी से बाहर नहीं आ पा रहे हैं, यदि किसी तरह बाहर आ भी गए तब भी स्थानीय परिवहन के अभाव में ये दवा लेने नहीं जा पाते। वर्ष 2005 के बाद से स्वास्थ्य सेवाओं ने इनपर ध्यान देना भी बंद कर दिया है, और वर्तमान में कोरोनावायरस के कहर के कारण जो कुष्ठ रोगी अस्पताल पहुंचते भी हैं, उन्हें वापस कर दिया जा रहा है।

र्ष 2016-2017 में भारत में कुष्ठ रोग के कुल 135485 नए मामले आये थे। भारत को कुष्ठ रोग की दुनिया की राजधानी के तौर पर जाना जाता है क्योंकि विश्व स्वास्थ्य संगठ के अनुसार दुनिया के 66 प्रतिशत से अधिक कुष्ठ रोगी यहीं हैं। इस संख्या को भी विशेषज्ञ कम आंकी गयी संख्या बताते हैं। आरभ से ही हमारे समाज में कुष्ठ रोग से सम्बंधित बहुत भ्रांतियां रहीं हैं और इन्हें हमेशा सामान्य आबादी से दूर ही रखा जाता है। दवा के बाद जब कुष्ठ रोगी ठीक हो जाते हैं तब इनसे किसी स्वस्थ्य व्यक्ति को यह रोग नहीं हो सकता, फिर भी इनसे हमेशा भेदभाव होता है।

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देश में कुल 108 क़ानून ऐसे हैं, जो कुष्ठ रोगियों से भेदभाव करते हैं, इनमें से 3 क़ानून केंद्र के हैं और शेष राज्यों के हैं। देश के 128 जिलों में प्रति दस हजार जनसँख्या पर 1 या इससे अधिक कुष्ठ रोगी हैं। मार्च 2017 में देश के 11 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 53 जिलों में इनकी संख्या प्रति दस हजार आबादी पर 2 से भी अधिक थी। ये राज्य हैं – बिहार, ओडिशा, छत्तीसगढ़, गुजरात, झारखण्ड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, वेस्ट बंगाल, दादरा एंड नगर हवेली, लक्षद्वीप और दिल्ली। गुजरात के कुछ जिलों में तो इनकी संख्या प्रति दस हजार आबादी में 18 से भी अधिक है।

1991 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वर्ष 2005 तक कुष्ठ रोग को मिटाने का लक्ष्य रखा था और वर्ष 2005 में ही इसे स्वास्थ्य सेवाओं से बाहर कर दिया। इस बीच में देश में लगभग 700 कुष्ठ रोगियों की कालोनियां बनाई गयीं और इन्हें बुनियादी सुविधाएं दी गयीं, पर वर्ष 2005 के बाद से सभी रोगी और कालोनियां उपेक्षित हो गयीं अनेक विशेषज्ञों के अनुसार सरकार के दावे के विपरीत कुष्ठ रोग कभी देश से मिटा ही नहीं था।

रेक वर्ष 30 जनवरी को विश्व कुष्ठ दिवस मनाया जाता है। कोरोना वायरस के बढ़ाते खतरे को देखते हुए अब सरकार को कुष्ठ रोगियों को बचाने के लिए नए सिरे से सोचना पड़ेगा, पर इसकी संभावना कम ही लगती है।

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