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'इस तरह ढह जाता है देश’

Prema Negi
1 Aug 2019 3:30 PM GMT
इस तरह ढह जाता है देश’
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नित्यानंद गायेन के कविता संग्रह से गुजरना सरकार की नाकामियों, बदमाशियों और शैतानी कारस्तानियों दंश दर्द की स्मृतियों को फिर से जीना है...

सुशील मानव

वो नीति नियंता जिनके हाथ में जन ने राष्ट्र निर्माण की जिम्मेदारी सौंपी है, वो नस्लीय ‘हिंदुत्व’ की अवधारणा को सब पर थोप कर नए भारत के ‘निर्माण’ की बात कर रहे हैं। ऐसे में एक कवि ही लिख सकता है कि– जिस तरह से आप राष्ट्र निर्माण निर्माण कर रहे हैं, इस तरह ढह जाता है देश। क्योंकि उनके इस नए भारत यानी ‘हिंदू राष्ट्र’ में सांस्कृतिक बहुलता, संविधान और संवैधानिक संस्थानों और जन अभिव्यक्ति के लिए कोई जगह नहीं है। न ही दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और स्त्रियों के लिए कोई स्थान है।

स ‘नए भारत’ में न्यायिक व्यवस्था की जगह त्वरित न्याय, भीड़ का न्याय, सांप्रदायिक सौहार्द्र पर नफ़रत व विभाजन और सामाजिक सहिष्णुता पर असहिष्णुता को प्रतिस्थापित कर दिया गया है। युवा कवि नित्यानंद गायेन इन सब पर अपने राजनीतिक कविता संग्रह ‘इस तरह ढह जाता है एक देश’ के जरिए एक प्रतिकारात्मक हस्तक्षेप करते हैं। संग्रह की शीर्षक कविता मौजूँ हैं-

“जब देश से भी बड़ा हो जाता है / शासक/ और नागरिक से बड़ी हो जाती है/ पताका/ जब न्याय पर भारी पड़ता है/ अन्याय/और शिक्षा को पछाड़ दे/ धार्मिक उन्माद/ तब हिलने लगता है / देश का/ मानचित्र/ इसी तरह से भूकम्प आता है/ और ढह जाता है/एक देश”

ज जब बड़े-बड़े शब्द शूरमा तटस्थता की खोल में बैठकर पद, प्रतिष्ठा, पुरस्कार हासिल करने की होड़ मचाए हुए हैं, आज जब प्रतिपक्ष और प्रतिरोध की राजनीति पर बात करना सबसे बड़ा जोखिम का काम है, तब एक युवा कवि एक मजबूत विपक्ष की तरह विशुद्ध प्रतिपक्षीय राजनीतिक तेवर से लबरेज़ कविता संग्रह ‘इस तरह ढह जाता है देश’ लेकर आता है, और एक जिम्मेदार विपक्ष की तरह राष्ट्र निर्माताओं से ‘कहां है मेरा देश?’ कविता के हवाले से पूछता है-

“पुलिस ने पहन ली है खाकी निकर / तिरंगा फहराया गया है/ संसद भवन के ऊपर / जय भारत भाग्य विधाता के नारे लगे जोर से / मैंने पूछा- कहां गया मेरा देश! मुझे गद्दार कहा गया.../ मेरी मां को कहा उन्होंने वेश्या/”

क पंथनिरपेक्ष जनतंत्र में सांप्रदायिक विभाजन करके अपना राजनीतिक हित साधने के लिए धर्म, संस्कृति और संप्रदाय के नाम पर जिस तरह सांप्रदायिक दंगे कराए जाते हैं, और इन दंगों को अंजाम देने में सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल किया जाता है। धर्म यज्ञ में सारा कुछ जलाकर स्वाहा कर देने के बाद सरकार शांति की मुनादी करवाती है और फिर पूरा सिस्टम हत्यारे को बचाने में जुट जाता है। ‘दीवारों पर बाकी रह जाते हैं खून के धब्बे’ कविता में कवि इसी हत्यारी ‘व्यवस्था’ का एकसूत्रीय उपसंहार लिखता है-

“सब कुछ जल जाने के बाद/ शहर में अब कर्फ्यू लगा है!”

राजसत्ता द्वारा हवा-हवाई राष्ट्रवाद को प्रतीकों और हिंदू मिथकों के जरिए फौरी तौर पर ऊपर से थोपकर युवा कौम को उन्मादित और चेतनाहीन बनाने का कवि बिल्कुल अलहदा तरीके से प्रतिरोध रचता है। कवि राष्ट्रभावना की रुमानी खामख्याली को खारिज करते हुए देश को यथार्थ की जमीन से देखने की दृष्टिबोध पैदा करता है।

र्वेश्वर दयाल सक्सेना की ‘देश कागज पर बना/ नक्शा नहीं होता’ की प्रतिरोधी परंपरा में विचार करते हुए कवि देश को अपनी देह की तरह एक सांस लेता, जीता, जागता देह मानता है और ‘बुखार में बड़बड़ाना’ कविता में वो देश की प्रति अपनी निष्ठाओं और चिंताओं को कुछ यूँ अभिव्यक्त करता है-

“पहाड़ से उतरते हुए / शीत लहर ने मेरे शरीर में प्रवेश किया/ और तापमान बढ़ गया शरीर का / शरीर तप रहा है मेरा/ भीतर ठंड का एहसास / इस अहसास को बुखार कहते हैं!/ देश भी/ तप रहा है मेरे बदन की तरह/ और सरकार कह रही है/ मामला ठंडा है!/ मेरे देश को बुखार तो नहीं है?”

वि नित्यानंद गायेन की इस कविता संग्रह में एक जिम्मेदार प्रतिपक्ष की तरह सरकार के पिछले 4-5 साल के किये-धरे का लेखा-जोखा दर्ज है। पूरे संग्रह से गुजरना सरकार की नाकामियों, बदमाशियों और शैतानी कारस्तानियों दंश दर्द की स्मृतियों को फिर से जीना है। ‘नोटबंदी’ कविता का एक दृष्टांत देखिए-

“मैं, मँगरूं को सोच रहा हूँ/ सोच रहा हूँ मोंटू के बारे में/ जो गांव छोड़कर आये थे शहर/ काम के लिए/ उनके पास थे कुछ पैसे/ जो उन्होंने उधार लिए थे/ उनका नहीं कोई बैंक खाता/ पुराना नोट कागज हो गया/ गोबरधन लाइन में मर गया/वो देश हित में मरा है/भूख से.....!”

संग्रह की ‘खोजो’ कविता एक खोए हुए देश की मर्सिया है। क्रोनी कैपिटलिज्म ने हमें झूठी रोशनाई के सपने देकर हमसे हमारा क्या क्या छीन लिया कवि उन्हें अपनी कविताओं में दर्ज़ करते चलता है-

“खोजो कि खो गई हैं /हमारी संवेदनाएं/ बच्चों का बचपन खो गया है/ खोजो, कविताओं से गायब हुए प्रेम को/ और सभ्यता की भाषा खो गई है/ खोजो कि देश का लोकतंत्र कहां खो गया है/ सत्ता का विवेक खो गया है / नागरिक का अधिकार खो गया है/ मानचित्र तो मौजूद है/ कहीं मेरा देश खो गया है/ उसे खोजो धरती की आखिरी छोर तक/खोजो कि/ किसान का खेत खो गया है/ पेड़ की चिड़िया खो गई है/”

सामंतवादी राजशाही शासनकाल में जहां भौगोलिक साम्राज्य विस्तार के लिए अश्वमेघ के यज्ञ के घोड़े छोड़े जाते थे वहीं अब फासीवादी शासनकाल में सांस्कृतिक साम्राज्य विस्तार के लिए गौशालायें बनाकर धर्म और संस्कृति के नाम पर अल्पसंख्यकों की हत्या करने वाले मॉब लिंचरों को संरक्षित किया जा रहा है।

“साम्राज्य के विस्तार के लिए’ कविता के जरिए कवि मौजूदा सत्ता द्वारा पंथनिरपेक्ष मूल्यों को ध्वस्त करके देश को ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने के कवायद को इतिहास के सामंतवादी शासन प्रवृत्तियों से जोड़ते हुए लिखता है- “अश्वमेघ के लिए अब/ घोड़े नहीं बचे हैं राजा के पास/ राजा के पास अब/ केवल गौशालायें हैं!”

वि नित्यानंद गायेन भाषा के चमत्कार से चमत्कृत कर देने वाले कवि नहीं हैं। वो अपनी बात, विचार, अनुभव द्वंद और आवेग को आम बोलचाल की भाषा में लिखते हैं जो सहज व संप्रेषणशील है। उनके काव्य-बिंब राजनीतिक रूप से बहद सधे हुए होते हैं। संग्रह की ‘लाईन में खड़ा आदमी’ कविता, कवि का राजनीतिक वक्तव्य है, जिसमें एकगहरा आवेग है, एक तीखा आक्रोश है।

“आज जब/ पूरा मुल्क कतार में खड़ा है/ यह कतार भी कत्ल करने का /एक नया तरीका है/ गिन लीजिए कितने हुए कत्ल/ कतारों में!/ लाशों के गिरने के साथ छोटी होती जाएगी लाइन...”

नित्यानंद के काव्य बिंब परिस्थिति बोधक व संवेगात्मक होते हैं, इनमें एक वर्तमान राजनीतिक विद्रूपताओं के प्रति एक प्रतीकात्मक ध्वन्यात्मकता होती है। ‘भोपाल’ कविता में वो ध्वनि बिंब व घ्राणबिंबों के जरिए फर्जी राष्ट्रवाद के बरअक्श जन समाज के राजनीतिक चेतना, सामूहिक विवेक व व्यवहारिक धरातल के खत्म होते जाने का प्रभावी संकेत करते है- “जयगान का शोर इतना तेज है/ कि कान के साथ-साथ/ कमजोर हो चुकी है/ सूँघने की शक्ति हमारी / हम ठीक से सूँघ नहीं पा रहे हैं/ साजिश की बू”

संग्रह की ‘नहीं रही बूधन की मां’ कविता आदिवासियों शोषितों वंचितों के बीच संरक्षक व मां कही जाने वाली महाश्वेता देवी को एक कवि की श्रद्धांजलि है। कवि अपनी परंपरा की पुरखिन को याद करते हुए एक गहरे दुख व निराशा में डूबकर लिखता है- “ये बच्चे जल जमीन और जंगल के बच्चे हैं/ जिनकी कोई सरकार नहीं/ न कोई मंदिर वाला देवता...”

‘आदमी जब वस्तु में बदल जाता है’ कविता पूंजीवाद के उपभोक्तावादी प्रवृत्ति पर एक गहरा कटाक्ष करती है जो व्यक्ति को वस्तु में तब्दील करके उसे परिधि में धकेल देता है जबकि उपभोग की वस्तुओं को व्यक्ति से ऊपर केंद्र में प्रतिस्थापित कर देता है- “हमने सीख लिया है/ कचरे से खाद, ईंधन और अन्य उपयोगी वस्तु बनाना/ पर अभी तक हम खोज नहीं पाए हैं/ ऐसी कोई तकनीक जिससे बना सके/ ज़रूरत के बाद ठुकराए आदमी को उपयोगी बनाना...”

‘क्रांति की शुरुआत है’ कविता फासीवादी शासनकाल में शासककीय दमन व दमनित जनता के मनोवैज्ञानिक अंतर्द्वंद की पुनर्रचना है-“राज दरबार से/ अब इंसानी खून की गंध आने लगी है/सहमी हुई प्रजा की”

संग्रह की सबसे लंबी कविता ‘यात्रा श्रृंखला’ में कवि संस्कारी बनने बनाने के दक्षिणपंथी प्रयोजनों प्रबोधनों पर सवाल उठाते हुए अपने बौद्धिक उत्तरदायित्व का निर्वाहन करते हुए जनसमाज को संस्कारी और आज्ञाकारी बनने के खतरों से आगाह करता है-“आज्ञाकारी बनना मतलब / प्रश्न करने की आजादी को खो देना है/ सही और गलत के चयन का विवेक खो देना है /आज्ञाकारी बनाने वाले / दरअसल हमें भेड़ बनाकर/हमसे अपनी इच्छाएं पूरी करना चाहते हैं...”

‘टूटी नहीं है प्रतिबद्धता’ कविता कवि का आत्मवक्तव्य है। कवि थोपी हुई तमाम राजनीतिक, सांस्कृतिक, सामाजिक आपदाओं विपदाओंके बावजूद एक संकटग्रस्त देश के जनसमाज को ढांढस देता है कि उसका कवि सत्ता के साथ नहीं, बल्कि जनता के साथ है- “समय के कालचक्र में रहकर भी/ टूटी नहीं है कवि की प्रतिबद्धता / उम्र कुछ बढ़ी ज़रूर है/ पर हौंसला बुलंद है/ बूढ़े बरगद की तरह...”

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