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आंदोलन

एनडीटीवी ने की 70 कर्मचारियों की छंटनी

Janjwar Team
25 July 2017 7:28 AM GMT
एनडीटीवी ने की 70 कर्मचारियों की छंटनी
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लोग पूछ रहे हैं रवीश कुमार कुछ बोलेंगे, क्या इस पर मुंह खोलेंगे

सीबीआई की रेड पड़ने पर एनडीटीवी के पक्ष में तमाम बुद्धिजीवी खड़े हो गए थे, इन 70 परिवारों के पक्ष में कोई 2 लाइन लिखेगा

दिल्ली। एनडीटीवी पर पड़ी सीबीआई की रेड के विरोध में जब देश के बुद्धिजीवियों के चर्चाओं के अड्डे प्रेस क्लब, इंडिया हैबिटैट सेन्टर, कॉन्स्टिट्यूशन क्लब जैसी जगहों से लेकर सोशल मीडिया पर प्रेस की आज़ादी बचाये रखने के नाम पर सेमिनार से लेकर अभियान तक चलाये जा रहे थे, उसी दौरान एनडीटीवी ने बड़े चुपके से अपने लिए लोगों में तैयार हुई सिमपैथी फायदा उठाते हुए 70 लोगों को नौकरी से बाहर कर दिया। आउटलुक मैगज़ीन की रिपोर्ट के अनुसार एनडीटीवी प्रबंधन ने अपने 70 कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है।

इसे बिज़नेस की रिस्ट्रक्चरिंग का नाम दिया जायेगा या फिर कॉस्ट कटिंग का।

क्या इन लोगों का रोजगार बचाने के लिए कोई #notinmyname के मुकाबले #onmyname जैसा अभियान चलायेगा कि मेरे नाम को भी इन लोगों की नौकरी बचाने के लिए इस्तेमाल करो।

शायद किसी ने ध्यान न दिया हो या नहीं। पिछले कुछ दिनों से एनडीटीवी में फील्ड रिपोर्टिंग करने जाने वाले के साथ अब कैमरामैन नहीं जाता है।

जैसा कि इस संवाददाता को पता चला है और इसने खुद एनडीटीवी के रिपोर्टर्स को रिपोर्टिंग करते हुए देखा है। रिपोर्टर को कैमरामैन साथ शूट पर ले जाने के बजाए रिपोर्टर के हाथ मे सैमसंग का फोन दे दिया गया है जो फोन की सहायता से रिकॉर्डिंग करेगा और सवाल भी पूछेगा। अपनी नौकरी बचाने के लिए रिपोर्टर्स ने फोन से शूट करना शुरू कर दिया और चैनल में काम कर रहे कैमरामैन को बेकार घोषित कर उन्हें बेरोजगार कर दिया

इतना ही नहीं अब जब रिपोर्टर के साथ न कैमरामैन होगा और न कैमरा तो गाड़ी का क्या काम, सो फील्ड में जाने वाले एनडीटीवी के रिपोर्टर्स पर अब गाड़ी ले जाने पर भी रोक लगा दी है। यदि कोई रिपोर्टर कहीं रिपोर्टिंग के लिए जाता है तो उसे ओला या उबेर बुक कराकर फील्ड रिपोर्टिंग के लिए निकलना होगा।

खैर, कल तक जो कैमरामैन रिपोर्टर के साथ उठते बैठते थे। साथ चाय पीते थे गप्प मारते थे आज वही रिपोर्टर उनकी नौकरी खा गए। एनडीटीवी के लोगों का कहना है कि चैनल मोजो यानी मोबाइल बेस जर्नलिज्म की ओर बढ़ रहा है।

शायद इन रिपोर्टर्स ने अपने ही चैनल के प्रवचन देने वाले सीनियर पत्रकार रवीश कुमार की बातों पर थोड़ा अमल किया होता तो शायद ये नौकरी बचाने वाले रिपोर्टर्स अड़ जाते की रिपोर्टिंग के दौरान और उसके बाद भी उनके सुख दुख के साथियों (कैमरामैन) को न निकाला जाए। उन्हें निकाला जाएगा तो वो भी काम ठप कर देंगे। लेकिन उन्होंने अपने चैनल के पत्रकार रवीश के क्रांतिकारी विचार ध्यान से नहीं सुने जो विचार दूसरों को देने में बहुत अच्छे लगते हैं।

हालांकि ऐसा माना जा रहा है न्यूज़ चैनल्स में कैमरामैन की जरूरत खत्म करने की शुरुआत एनडीटीवी ने की है। आने वाले दिनों में अन्य न्यूज़ चैनल इसी पैटर्न को अपनाने वाले हैं। इसका साफ मतलब है कि जल्दी ही न्यूज़ चैनल्स में छटनी शुरू होने वाली है, वो भी बड़े पैमाने पर।

न्यूज़ चैनल्स आर्थिक संकट का हवाला देकर बड़े पैमाने पर लोगों को बाहर का रास्ता दिखा सकते हैं। ऐसे समय में देखना होगा कि कौन से नेता और बुद्धिजीवी बाहर किये जाने वाले लोगों के समर्थन में आकर जंतर—मंतर पर प्रदर्शन करते हैं।

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