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आंदोलन

खेत बने टापू और पुनर्वास साबित हो रहा बेमतलब का

Janjwar Team
17 Oct 2017 1:23 PM GMT
खेत बने टापू और पुनर्वास साबित हो रहा बेमतलब का
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सरदार सरोवर इलाके में डूब जहां नहीं आयी वहां के भी तुड़वाये घर, बिना संपूर्ण पुनर्वास सरकार भर रही दंभ, मेधा ने कहा सरोवर ने आदिवासियों की जिंदगी का कर दिया है संपूर्ण नाश

भोपाल। सरदार सरोवर बांध का लोकार्पण फर्जी व खोखला साबित हुआ। न वहां 2000 साधु वाराणसी से पधारे, न ही महाआरती हुई। गुजरात छोड़कर किसी भी राज्‍य का मुख्यमंत्री निमंत्रण मिलने पर भी वहां नहीं पहुंचा। बांध स्थल पर पहुंचने के पहले गुजरात के ही 1100 से अधिक विस्थापितों को गिरफ्तार करने बाद मोदीजी बांधस्थल पर रोड से पहुंचे।

अभी बांध में 138.68 मीटर के बदले 129 मीटर पर ही पानी भरा और रुका है तो निमाड़ के बड़े—बड़े गांव, घर, हजारों हेक्टेयर खेती योग्य जमीन, मंदिर, मस्जिद, लाखों पेड़, शासकीय भवन बचे हुए हैं। हजारों परिवारों का पुनर्वास बाकी है। बांध में 129 मीटर उंचाई तक भरे पानी का गंभीर असर दिखना शुरू हो गया है। कई गांवों के निचले मोहल्ले, घर, दुकान डूबने लगे हैं।

कुछ पहाड़ी और निमाड़ गांवों में शासकीय अधिकारियों ने दबाव डाल डालकर आदिवासियों, मछुआरों के घर तोड़े हैं जिनमें से कइयों को या तो पुनर्वास के पूरे लाभ नहीं मिले हैं तो अन्य को पुनर्वास स्थल पर वैकल्पिक स्थान एवं सुविधाएं उपलब्ध न होते हुए खुले में सामान रखने या किरायेदार के रूप में रहने मजबूर किया गया है।

भिताड़ा में नरसिंग बाबा, भंगडया जैसे आदिवासियों के पहाड़ पर बसे घर तुड़वाये गए हैं, वो इन्हीं हालातों में रहने को मजबूर हैं। अलीराजपुर जिले के रोलीगांव के शक्तिसिंह भिलाला का घर जो डूब क्षेत्र में अभी नहीं आया था, उसे तोड़ दिया गया। उसका घर तुड़वाकर गुजरात में जमीन व घर के लिए भूखंड मिला तो मात्र शिफ्टिंग करके सामान हटाने के बदले दो वृद्ध माता पिता का आधार बना, भायरा भिलाला का घर भी ग्राम झंडाना में तोड़ दिया।

निसरपुर में जिन्हें आज तक वैकल्पिक भूखंड, घर या दुकान के लिए या तो मिला ही नहीं था या तो कागज पर मात्र मिला, उनके परिवारों को हर पात्र या अपात्र व्यक्तियों को मुख्यमंत्री ने घोषित किए नए कुल 900 करोड़ के पैकेज का लाभ मिला नहीं और कई गुजरात में पुनर्वासित परिवारों को भी भुगतान कर दिया गया। सर्वोच्च अदालत में दिए गए 2015 तक दिए गए हलफनामे वही नहीं थे। इस तरह पैकेज व भूखंड की धांधली अधिकारी, कर्मचारी व दलालों के गठजोड़ के माध्यम से की गई।

स्थायी पुनर्वास हजारों परिवारों का बाकी होते हुए टिब्यूनल फैसला, जो कानून है, सर्वोच्च अदालत के 1992 से 2017 तक के फैसलों के पुनर्वास संबंधी आदेशों का उल्लंघन करते हुए गांव खाली करवाने के लिए मध्य प्रदेश शासन ने जो अस्थायी पुनर्वास का खेल खेला वह भी बेकार गया। 150 वर्ग फीट से 200 वर्ग फिट तक के टीन शेड बनाए गए जिन पर सैकड़ों करोड़ रुपयों के ठेके दिए गए।

इस मामले में बांध प्रभावितों की लड़ाई लड़ रहीं सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर कहती हैं, मात्र 8 गांवों में 13 करोड़ और अकेले निसरपुर में 8 करोड़ 86 लाख रुपए ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने के लिए टीन शेड्स पर खर्च हुए। लेकिन एक भी टीन शेड में एक भी परिवार रहने नहीं गया, क्योंकि न केवल वह दूर थे, बहुत छोटे थे, और लोहे के होने कारण उनमें बिजली के करंट का खतरा था और गर्मी में भट्टी की तरह गरम होते हैं। उनमें मात्र पुलिस और मजदूरों को रखा गया। वैसे ही करोड़ों रुपए के ठेके भोजन के लिए दे दिए गए।

नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण और राज्य शासन मप्र विद्युत मंडल पर दबाव डालकर गांवों से टांसफार्मर उठाकर ले गए, इससे पूरे इलाके में खेती पर संकट आ गया है। घाटी के एकत्रित लोगों ने इकट्ठे होकर कार्यालयों के सामने आवाज उठाई तो उसे भी नहीं सुना गया। आज भी निसरपुर में बिजली के कनेक्शन काट दिए गए हैं जिससे इस दीवाली में लगभग 200 घरों में अंधेरा रहेगा।

कुक्षी तहसील के करोंदिया, खापरखेड़ा, निसरपुर, कोठडा, चंदनखेड़ी गांवों के तथा मनावर तहसील के कई गांवों में रास्ते एकलबारा, उरधना जैसे कई गांवों में रास्ते डूब गए हैं, जिससे आसपास के सभी खेत टापू में तब्दील हो गए हैं।

नर्मदा बचाओ आंदोलन ने बिना पुनर्वास डूब का विरोध किया है और मांग की है कि आज की स्थिति में बांध के गेट खोलकर जलाशय का स्तर 122 मीटर पर लाया जाए।

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