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संस्कृति

गाँधी की पीठ पीछे से बेटी कहाँ गयी!

Janjwar Team
21 July 2017 4:19 PM GMT
गाँधी की पीठ पीछे से बेटी कहाँ गयी!
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सत्यनारायण पटेल की कहानी 'मैं यहीं खड़ा हूँ' का शेष भाग

वाहनों की पें पें और धुएँ में मेरी चीख़ खो गयी। घन्टों बीते। गुमशुदगी लिखवाई। जिसने जहाँ का कहा, वहीं हम पति-पत्नी ने माथा झुकाया। हर किसी से फरियाद की। बेटी न मिली...

हाँ, पेड़ जीवित रहता तो छाँव देता। आॅक्सीजन देता। फल-फूल देता। ख़ुशबू व ख़ुशी देता। हालाँकि उस पेड़ के बाद भी अनेक पेड़ बचे थे। पर वह पेड़ अकेला पड़ गया था। जैसे उसका जुड़वा भाई कट गया था।

रात में ड्यूटी के दौरान अक्सर मैं देखता कि वह पेड़ गुमसुम खड़ा रहता था। जैसे उसे जोड़ीदार का ग़म भीतर ही भीतर खा रहा होता! साँझ को उस पर असंख्य तोते शोर मचाते। शायद तोते उससे पूछते हों कि तुम्हारे साथी को क्यों कटना पड़ा! उसके पास कोई वाजिब जवाब न होता, और वह गुमसुम खड़ा रहता! अपने भीतर! अपनी ही छाल-पत्तियों में छुपकर! ख़ुद से नज़र चुराता हुआ!

सुबह जब मैं घर जाते वक़्त उसे देखता। पत्तियाँ भीगी और धुली-धुली होती। नीचे की ज़मीन पर भी कुछ नमी होती। जैसे कि पेड़ रात माई की गोद में सिर रख सुबक-सुबक कर रोता रहा हो! दिन में लगता कि पेड़ झूठ—मूठ का नार्मल बना खड़ा हो! लेकिन उस साँझ जब पेड़ मुस्कराया था। पत्तियाँ भौंहों की तरह खिली थी, मुझे अच्छा लगा था। मेरी स्मृति की पेन ड्राइव में उस पेड़ के भी अनेक क़िस्से हैं! पर अभी छोड़िए उन सभी को। अपने साथी को खोने का दुःख पहाड़ से भी जबरा होता है। कहीं पेड़ ने सुन लिया, तो वह फिर रोने लगेगा और हम सभी को भिगो देगा!

मैं वैसे भी साईं बाबा का क़िस्सा सुना रहा हूँ। पेड़ का नहीं। हाँ! और साईं बाबा भी फुटपाथी! शिर्डी वाला नहीं! और उस बड़े-बड़े और घुँघराले बाल वाले... बहुत सारे स्कूल और अरबों की संपत्ति वाले ठग का तो बिलकुल भी नहीं। देश में साईं बाबा के भेष में ठगों की कमी कभी नहीं रही।

हालाँकि जब एक गूँगा और बुजुर्ग इन्सान देश का प्रधान सेवक था। तब प्रोफ़ेसर साईं बाबा का आईना चर्चा में था! प्रोफ़ेसर के आईने में जब छात्र, पालक और आम जन झाँकते, तो उन्हें गूँगा प्रधान सेवक बोलता दिखाई देता। लेकिन उसका बोलना देश हित में न था, इसलिए लोग उसकी मुख़ालिफ़त करते! मुख़ालिफ़त उसे भी पसंद न थी, और जो कि प्रोफ़ेसर साईं बाबा की वजह से हो रही थी। इसलिए उसने प्रोफ़ेसर साईं बाबा का न सिर्फ़ आईना जप्त किया था, बल्कि साईं बाबा को जेल भी भेज दिया था। बाद में लकड़बग्घे जैसी शक्ल का शख़्स प्रधान सेवक बन गया था, लेकिन प्रोफ़ेसर साईं बाबा जेल में ही था। ख़ैर छोड़ो! बहरहाल प्रोफ़ेसर की नहीं, फुटपाथी साईं बाबा की बात करते हैं।

हाँ... तो फुटपाथी साईं बाबा का वही-वही दोहराना-पूछना ज़ारी था। वह जिस किसी की भी आँखों में आँखें डालता। सामने वाला सकपका जाता ! असहज हो जाता। पलकें झुका लेता। कुछ बोल नहीं पाता था।

लेकिन जिससे पूछा नहीं जाता, और जो दूर से देख रहा होता। उसे वह सब नाटकीय लगता और वह मुस्कराता या फिर हँसता! कुछ के चेहरे के भाव कहते कि साईं बाबा गेल्या हो गया है। कुछ अपने कंधे पर पता नहीं अपनी ही या किसी और की गंभीर शक्ल लिए खड़े होते। कोई मोबाइल पर बतियाता। कोई वॉट्सएप्प, फेसबुक पर व्यस्त। कोई फुटपाथी साईं बाबा का वीडियो बनाता। वॉट्स एप्प पर सेंड करता।

चंद मिनटों में मौसम ने फिर रंग बदला। बादल कहीं उड़ गए, देश के प्रधान सेवक के वादों की तरह। जादुई ढँग से! हवा जा समाई किसी मॉल, मेक्डॉनल्स के सामने खड़े टेड़ी बियर में। उमस देश के बजट की तरह दम घोटने लगी। सूरज प्रधान सेवक के चेहरे की तरह फिर पूरी बेशर्मी से दमकने लगा।

जो लोग पेड़ के नीचे ठिठके हुए थे, आगे बढ़ गए। लोगों के पास और कोई चारा भी नहीं था। किसी ने पेड़ का शुक्रियादा नहीं किया ! किसी ने नहीं पूछा कि तुम्हारे पड़ौसी को क्यों कटना पड़ा! क्या वह भी तुम्हारी नस्ल, जाति, धर्म या सम्प्रदाय का था ! क्या वह तुम्हें बचाने के लिए आरी के सामने आ गया! या तुमने उसे आरी के सामने धकेल दिया! हम आदमियों की तरह! या बस यूँ ही रूटीन में कट गया! या उस दिन उसकी बारी थी, फिर कभी तुम्हारी बारी भी होगी!

पूछना चाहते, तो बहुत कुछ पूछ सकते थे। लेकिन महज़ पेट भरने को जीती भेड़ें सवाल कहाँ करती! भेड़ें, फिर रायसीना के जंगल में चरने वाली हों! या नदी-नालों के किनारे चरने वाली हों! भेड़ कहीं भी हो! मेडीसन स्क्वेयर पर या गँगा घाट पर! प्रॉइम टाइम पेनल डिस्कसन में! भेड़े या तो मिमियाती या फिर चुपचाप चरती रहती! और जब बारी आती कट जाती! भेड़ें, सवाल नहीं करतीं! किसी ने किया भी नहीं! सभी अपने-अपने रास्ते चल दिए! फुटपाथी साईं बाबा, टीकाधारी और मैं भी वहीं रह गए!

तभी चिंता का झोंका! हाँ! चिंता होने लगी थी, क्योंकि बेटी अभी तक नहीं आयी थी! ख़याल आया कि बूँदाबाँदी से बचने के लिए रास्ते में खड़े बुजुर्ग पीपल के नीचे रुक गयी होगी! जैसे यहाँ बहुत-सी भेड़ें रुकी, वैसी वहाँ भी रुकी होंगी!

चिंता टीकाधारी के चेहरे पर भी उभरी! चाय लेने गया युवक न आया! उसने शास्त्री ब्रीज के ऊपर चढ़ने वाले महात्मा गाँधी मार्ग के पार देखा। वह जिधर देखता, मैं भी उधर देखता। उसे युवक नज़र नहीं आ रहा था, और मुझे बेटी । लेकिन भेड़ सभी तरफ़ नज़र आ रही थी! बरगद के नीचे भेड़। भेड़ों की भीड़! भेड़ें चर रही! मेरे भीतर-बाहर के जंगल में सिर्फ़ भेड़ थीं!

फिर नथुनों में भेड़ों की हगार की गँध घुसने लगी! बहुत तेज़ गँध! रूमाल मुँह और नाक पर लगाया। गँध कम हुई, लेकिन पूरी तरह नहीं! तभी ख़याल की बिजली कौंधी! अभी मैं पूरी तरह भेड़ नहीं बना हूँ! क्योंकि भेड़ को भेड़ की हगार की गँध महसूस नहीं होती। भेड़ नाक पर रुमाल न लगाती। शायद मैं अभी इन्सान और भेड़ के बीच का कुछ हूँ। शायद भेड़ में तब्दील हो रहा हूँ ! शायद कभी मेरे कंधों पर भेड़ का सिर नज़र आने लगेगा।

लेकिन भेड़ों की भीड़ से अलग दिखा तो... प्रोफ़ेसर साईं बाबा की तरह पिंजरे में डाल दिया जाऊँगा! या फिर किसी पेड़ की तरह काट दिया जाऊँगा! या फुटपाथी साईं बाबा की तरह गाँजे की तुरंग में कहीं भी... ज़ोर-ज़ोर से कुछ भी चीख़ता नज़र आऊँगा! या फिर युवक की तरह किसी बेंच पर लेट-बैठ ज़िन्दगी कटने का इंतज़ार करूँगा! चन्द्रकान्त देवताले और विष्णु खरे की तरह कलपूँगा ! किसी की तरह गाता नज़र आऊँगा- अच्छे दिन आ गए रे रामा / बुरे दिन भले गए रे रामा। लेकिन आइटम सांग के जमाने में ये गीत भी कौन सुनेगा!

टीकाधारी भेड़ का मन भी ऊबने लगा। अपनी झुग्गी में जाने को जी तोड़ाने लगा। खान नदी किनारे की झुग्गियों में उसकी भी एक झुग्गी थी। जिसमें एक मादा भेड़ और दो मेमने, उसकी राह देख रहे थे। टीकाधारी ने उन्हीं को याद करते हुए कहा- बाबा... अब मैं चलता हूँ। वो छोरा तो नज़र नी आ रिया, जाने किधर गया।

-अरे बैठो... अभी चाय ले कर आ रिया... बूँदाबाँदी की वजह से रुक गया होगा भिया ! फुटपाथी साईं बाबा ने कहा और टीकाधारी के पास आकर बैठ गया। फिर ख़बर को विस्तार से पढ़ने लगा। ज़ोर से पढ़ रहा था, ताकि टीकाधारी भी सुन सके! सुन भी रहा था! ख़बर किसी दूसरे गाँव, क़स्बे या शहर की नहीं, महानगर की ही थी। अभी कुछ ही पढ़ी थी कि दोनों के मुँह से एक साथ आवाज़ निकाली- च्च्च च्च्च..!

फिर एक-दूसरे से दुःख मिश्रित स्वर में पूछा- क्या-क्या हो रिया धरती पर!

-अब तक तो धर्म-सम्प्रदाय के नाम पर शहर के मुँह पर कालिख पुतती थी, अब ये भी होने लगा। कितना गिरेगा इन्सान! टीकाधारी ने चिंतित होते हुए कहा।

फुटपाथी साईं बाबा के हाथ से अख़बार लेकर टीकाधारी पढ़ने लगा। और जब आगे उसने पढ़ा कि कुकर्मी का नाम इरफान है। ‘इरफान ’ इरफान पढ़ते ही टीकाधारी ने ऎसा मुँह बनाया जैसे नथुनों में सड़ी मछली की तीव्र गंध भर गयी हो! और उबकाई को जैसे-तैसे रोका हो! फुटपाथी साईं बाबा ने उसके चेहरे को देखा, तो उसके चेहरे के भाव भी अजीब-ग़रीब हुए। उसने पूछा- क्या लिखा भिया...?

-तुम्हारे वाला भिया! टीकाधारी ने कहा और बुरा-सा मुँह बनाते हुए अख़बार फुटपाथी साईं बाबा को पकड़ा दिया।

-क्या मतलब...! फुटपाथी साईं बाबा धीरे से बुदबुदाया और तेज़ी से ख़बर को पढ़ने लगा। जब कुकर्मी का नाम ‘ इरफान ’ पढ़ा, तो वह भी रुका। उसे दिल में कहीं झटका भी लगा। कुछ चुभा भी! लेकिन चुभन सहते हुए उसने पूरी ख़बर पढ़ी-समझी। फिर अख़बार टीकाधारी को पकड़ाता बोला- देखो... पढ़ो ज़रा।

हरामी ने पाँच-छः साल पहले इस्लाम क़ुबूल किया था। इसलिए कि एक से अधिक निकाह पढ़ सके। दस साल की बेटी की विधवा माँ से निकाह पढ़ा। और जब बेटी पन्द्रह-सोलह की हुई ! डील-डौल निकला, तो कुत्तरे ने उसे भी नी छोड़ा! जो बहन-बेटी तक को न बख़्शे ! स्त्री का सम्मान न करे! वो काहे का मेरे वाला… और काहे का तेरे वाला! वो स्साला तो इन्सान ही नी भिया! कुत्तरा है स्साला.. कुत्तरा...

-हाँ... कुत्तरा है, या जो भी है... पर है तो तेरे ही वाला...! मामा की लड़की... बुआ की लड़की किसी के भी साथ निकाह पढ़ लेते हो! अब बेटी को भी न छोड़ा भिया! टीकाधारी ने ख़बर पढ़ते हुए कहा था और जब ख़बर पूरी पढ़ी, तो उसके दिल में भी बहुत गहरे से कुछ चुभ गया था। चेहरे पर शर्मिंदगी-सी छा गयी। उसने भी बिंधे शब्द में वही दोहराया- सई कहते हो, कुत्तरा है स्साला... कुत्तरा।

तभी युवक चाय ले आया था। वे तीनों चाय पीने लगे थे।

-भिया इन्सान चाहे तो...! टीकाधारी ने चाय की चुस्की लेते बुदबुदाया- तो कुछ भी कर सकता। भेड़ और कुत्तरे का जीवन जीने से बच सकता है।

-हाँ... इन्सान चाहे तो... फुटपाथी साईं बाबा ने अख़बार के पेज पर छपी दूसरी ख़बर दिखाते हुए कहा- प्रोफ़ेसर साईं बाबा, दाभोलकर, पानसारे, और कलबुर्गी भी बन सकता भिया। किसी लकड़बग्घा को प्रधान सेवक मानने से इंकार कर सकता है। अरे इस सिपाही को देखो... रोज़ अपनी बेटी के लिए यहाँ खड़ा रहता है। मतलब कि कुछ भी कर सकता है! ...पर चाहे तो...।

मुझे आश्चर्य हुआ कि साईं बाबा मुझे जानता था। जबकि मेरा कभी उससे कोई संवाद या दुआ-सलाम नहीं हुआ था।

तभी मुझे बेटी भी नज़र आयी थी। वह भीगी हुई थी। मतलब वह किसी पेड़ के नीचे नहीं रुकी थी और उधर बरसात भी कुछ ज्यादा हुई थी। अभी वह गाँधी प्रतिमा की उस तरफ़ थी। साइकिल पर। भीड़ में।

मुझ तक पहुँचने से पहले उसे प्रतिमा की पूरी परिक्रमा लगानी थी। मैं पेड़ तरफ़ देख बुदबुदाया- मुझे धूप, और बूँदाबाँदी से बचाने के लिए शुक्रिया भिया...।

मैंने महसूस किया कि जैसे पेड़ भी बुदबुदाया- क्यों शर्मिन्दा कर रिए हो भिया! ये तो मेरी ज़िम्मेदारी है! मैंने निभायी! तुम अपनी निभाओ ...! बात बराबर भिया!

-हाँ भिया... बुदबुदाते हुए मैंने उधर देखा, जिधर से बेटी आ रही थी। उधर गाँधी प्रतिमा के पीछे ट्रैफ़िक बत्ती लाल हो गयी थी। भीड़ का लम्बा रेला रुक गया था। मैंने सोचा कि बस... अभी आएगी और साइकिल टिकाए बग़ैर ही किलकती हुई कहेगी- मऊ... इधर बरसात नी हुई... उधर तो ज़ोर से बरसी! हे... हे... मैं भीग गयी। देखो...

उन तीनों की चाय ख़त्म हो चुकी थी। टीकाधारी अपने रास्ते हो लिया था। युवक बैंच पर जा बैठा था। साईं बाबा बीड़ी सुलगाने लगा था। आसमान में बिजली चमकने लगी थी।

तभी ट्रैफ़िक बत्ती हरी हो गयी। भर्रर्र… से ट्रैफिक छूटा, जैसे बहुत-सी भेड़ों का रेला छूटा हो। अनेक बाईक व कारों के बीच से साइकिलें भी निकलीं। लेकिन बेटी की साइकिल नज़र न आयी। बेटी कहाँ रुक गयी! मन में संदेह की काली रेखा खींच गयी। मैं गाँधी प्रतिमा की तरफ़ दौड़ पड़ा। लेकिन वहाँ न बेटी थी, न बेटी की साइकिल।

ओह। गाँधी की पीठ पीछे से बेटी कहाँ गयी! सड़क निगल गयी कि किसी भक्त की गाड़ी ने दबोच ली। वाहनों की पें पें और धुएँ में मेरी चीख़ खो गयी। घन्टों बीते। गुमशुदगी लिखवाई। जिसने जहाँ का कहा, वहीं हम पति-पत्नी ने माथा झुकाया। हर किसी से फरियाद की। बेटी न मिली।

यह बात कल-परसों की नहीं। ढाई-तीन बरस पुरानी हो गयी। आज भी गाँधी वैसे के वैसे ही खड़े हैं और मैं भी यहीं पेड़ नीचे खड़ा हूँ। भर्रर्र देनी से ट्रैफ़िक छूटता है। मैं एक-एक चेहरे को, साइकिल को देखता हूँ। बेटी नहीं दिखती है। सुनो, कहीं नज़र आए तो कहना- मैं यहीं खड़ा हूँ।

समाप्त

कहानी का पहला हिस्सा :

सत्यनारायण पटेल की कहानी 'मैं यहीं खड़ा हूँ'भाग एक

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