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एनजीटी को रविशंकर ने रखा ठेंगे पर और आंदोलनकारी हुए नतमस्तक

Janjwar Team
9 Dec 2017 7:41 PM GMT
एनजीटी को रविशंकर ने रखा ठेंगे पर और आंदोलनकारी हुए नतमस्तक
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कुछ धन्नासेठों को खुश करने के लिए एनजीटी ने देश की आवाज का गोल घोंट दिया। इसी तरफ तरह रविशंकर को खुश करने के लिए जुर्माना लगा दिया, लेकिन भौतिक और जैविक नुकसान होने दिया...

सुनील कुमार

आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन के 35 वर्ष पूरा होने पर मार्च 2016 में यमुना के किनारे ‘वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल’ का आयोजन किया गया था। इस प्रोग्राम के लिए 7 एकड़ में स्टेज बनाये और 1000 एकड़ जमीन इस ‘फेस्टिवल’ के लिए किसानों की फसलों को रौंद कर अधिग्रहित किया गया।

कुछ पर्यावरणविद इस मामले को एनजीटी तक लेकर गये और इससे बताया कि इस प्रोग्राम के होने से पर्यावरणीय खतरा है, इसलिए इस पर रोक लागया जाए। एनजीटी ने यह कहते हुए रोक लगाने से इनकार कर दिया कि काफी देरी हो चुकी है और उसने आयोजकों पर 5 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया। इस जुर्माने को भी श्रीश्री रविशंकर ने एक टीवी साक्षात्कार में देने से मना कर दिया।

इस ‘फेस्टिवल’ को पूरा करने के लिए सेना का इस्तेमाल किया गया। देश के चौकीदार माननीय नरेन्द्र मोदी खुद इसमें भागीदारी करते है और साथ ही साथ भारत सरकार और दिल्ली सरकार के मंत्री भी शामिल हुए। किसानों की फसलें बरबाद कर दी गईं, लेकिन किसानों एक रुपए का भी मुआवजा नहीं दिया गया। न सरकार की तरफ से, न ही आयोजकों की तरफ से।

इस मामले में श्रीश्री रविशंकर ने कहा, ‘अगर, कुछ भी, कैसा भी जुर्माना लगाया जाना है तो यह केंद्र और राज्य सरकारों तथा खुद एनजीटी पर लगाया जाना चाहिए, इजाजत देने के लिए। अगर यमुना इतनी ही निर्मल और पवित्र थी तो उन्हें वर्ल्ड कल्चरल फेस्टिवल को रोकना चाहिए था।’ रविशंकर उल्टा चोर कोतवाल को डांटे वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए कहते हैं कि हमें इस काम के लिए आवार्ड मिलना चाहिए था और हमें उल्टा कोर्ट में घसीटा जा रहा है।

इस आयोजन से होने वो नुकसान की जानकारी लेने के लिए एनजीटी द्वारा जल संसाधन मंत्रालय के सचिव शशि शेखर की अध्यक्षता में एक कमिटी का गठन किया गया। इस कमेटी का कहना है कि ‘ऐसा अनुमान है कि यमुना नदी के पश्चिमी भाग (दायें तट) के बाढ़ क्षेत्र के करीब 120 हेक्टेयर (करीब 300 एकड़) और नदी के पूर्वी भाग (बायें तट) के करीब 50 हेक्टेयर (120 एकड़) बाढ़ क्षेत्र पारिस्थितिकीय तौर पर प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुए हैं। पुनर्वास योजना के दो भाग है, भौतिक और जैविक इस नुकसान की पूर्ति करने में 10 साल और 42.02 करोड़ रुपए लगेंगे।’

इसके बावजूद एनजीटी ने रविशंकर पर हर्जाने कि राशि नहीं बढाई, केवल यह आदेश दे दिया है कि जो भी लागत आये आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन से लिया जाये। इस बात को भी रविशंकर ने मानने से इनकार कर दिया है और इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज दे रहे हैं।

पहले के आदेश में एनजीटी जहां एक नौटंकीबाज व्यक्ति को नहीं रोक सकी, वहीं अक्टूबर 2017 में 125 करोड़ का गला दबा दिया। एनजीटी के ‘न्यायमूर्ति’ आर एस राठौर ने याचिका पर फैसला देते हुए जन्तर-मन्तर पर धरना-प्रदर्शन को प्रतिबंधित कर दिया। साथ ही कनॉट प्लेस में लगी रेहड़ियों और अस्थायी ढांचों को भी हटाने को कहा है।

कोर्ट ने कहा है कि सामाजिक संगठनों, राजनीतिक समूहों व एनजीओ द्वारा किये जाने वाले आंदोलन और जुलूस क्षेत्र में ध्वनि प्रदूषण का एक बड़ा स्रोत है। कोर्ट ने कहा है कि वायु प्रदूषण एवं नियंत्रण अधिनियम, 1981 समेत पर्यावरणी कानूनों का उल्लंघन है।

जज आर एस राठौर के मुताबिक आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को शांतिपूर्ण व आरामदायक ढंग से रहने का अधिकार है। साथ ही कोर्ट ने दिल्ली सरकार, नई दिल्ली नगर निगम और दिल्ली पुलिस आयुक्त को निर्देश दिया है कि जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन, लोगों को इक्ट्ठा होने और लाउडस्पीकर का इस्तेमाल तुरंत रोके। एनजीटी ने अधिकारियों से कहा कि धरना-प्रदर्शन कर रहे लोगों को तुरंत अजमेरी गेट के रामलीला मैदान में शिफ्ट कर दिया जाए।

जहां एनजीटी को कुछ घरों को लेकर इतनी चिंता है, वहीं रामलीला मैदान के पास बसी सघन आबादी, कॉलेज, दिल्ली के दो बड़े अस्पतालों की मरीजों की चिंता नहीं है।

जंतर-मंतर जिस कारणों के लिए जाना जाता था वह है वहां की वेधशाला। जन्तर-मन्तर के आस-पास ऊंचे-ऊंचे भवन बन गये जिसमें सरकारी और कॉरपोरेट दफ्तर हैं। इन ऊंचे-ऊंचे भवनों के कारण जन्तर-मन्तर वेधशाला के सभी यंत्र बेकार हो गये, क्योंकि वह सही माप नहीं ले सकते हैं। इसका प्रयोग केवल टूरिज्म के लिए होने लगा है।

कुछ धन्नासेठों को खुश करने के लिए एनजीटी ने देश की आवाज का गोल घोंट दिया। इसी तरफ तरह रविशंकर को खुश करने के लिए जुर्माना लगा दिया, लेकिन भौतिक और जैविक नुकसान होने दिया।

जन्तर-मन्तर पर जहां पहले 20-25 लोग, अकेला-दुकेला व्यक्ति भी आकर अपनी मांग उठा सकता था, वह लगभग प्रतिबंधित सा हो गया। जनवादी-क्रांतिकारी समूहों द्वारा भी इसका कोई विरोध नहीं किया गया। सत्ता परिवर्तन की बात करने वाले एनजीटी के चाबुक से डरे हुए हैं।

(सुनील कुमार पिछले 15 वर्षों से मजदूर आंदोलन में सक्रिय हैं और उनकी समस्याओं पर लगातार रिपार्टिंग करते हैं।)

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