जनज्वार विशेष

उसने सभी कुकर्म किए, बस एक सच नहीं स्वीकारा

Janjwar Team
15 Sep 2017 5:50 PM GMT
उसने सभी कुकर्म किए, बस एक सच नहीं स्वीकारा
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लोग हंसेंगे, मगर सच कह रही हूं मुझे लगता था कि मेरे सपनों का राजकुमार भी बिल्कुल फिल्मी दुनिया की तरह रूहानी होगा और उतनी ही खूबसूरत होगी मेरी जिंदगी...

'हाउस वाइफ' कॉलम में इस बार गोरखपुर से गीता सिंह

मैं भी 'हाउस वाइफ' कॉलम के जरिए पूरे समाज—दुनिया के सामने अपनी बात रखना चाहती हूं। लोग जानें कि क्या—क्या झेलती हैं महिलाएं।

कहां से शुरू करूं। मैं अब 41 साल की हूं और इन दिनों यूपी के गोरखपुर में रहती हूं। इससे पहले खलीलाबाद में रहती थी। यह बात उन्हीं दिनों की है, जब मैं खलीलाबाद में परिवार के साथ रहती थी।

शादी से पहले की लाइफ ठीकठाक गुजरी। दसवीं तक की पढ़ाई की, उसके बाद घरेलू कामों में मां का हाथ बंटाने लगी, क्योंकि बड़ी बहनों की शादी हो चुकी थी। आगे की पढ़ाई क्यों नहीं की? का जवाब यही कह सकती हूं कि मेरा खुद भी पढ़ाई को लेकर बहुत ज्यादा रूझान नहीं था।

मगर शादी को लेकर खूब सारे ख्वाब सजाए हुए थे मैंने। लोग हंसेंगे, मगर सच कह रही हूं मुझे लगता था कि मेरे सपनों का राजकुमार भी बिल्कुल फिल्मी दुनिया की तरह रूहानी होगा और उतनी ही खूबसूरत होगी मेरी जिंदगी।

हां, तो 18 साल की उम्र में मेरी शादी कर दी गई। शादी संयुक्त परिवार में की गयी थी। ससुराल में सास—ससुर, जेठ—जेठानियों और उनके बच्चों से भरा—पूरा परिवार था।

शुरुआत में तो सबकुछ ठीकठाक था, पति सरकारी नौकरी में थे। सास के भी सबसे दुलारे थे। मैं जेठानियों के साथ खुशी—खुशी घरेलू कामों में हाथ बंटाती, मुझे अच्छा लगता ये सब करना। पति के साथ—साथ जेठानियों और सास का व्यवहार भी ठीक—ठाक था शुरुआत में। हां, मंझली जेठानी हर बात में जरूर मीन—मेख निकालती थीं, मगर मैं हंसकर रह जाती।

शुरू का एक साल तो ऐसे ही गुजर गया। शायद जीवन की असल परीक्षा मुझे अब देनी थी। सब लोगों ने बच्चे को लेकर कहना शुरू कर दिया था। सास कहती बड़की और मंझली के तो सालभर से पहले ही गोदी में बच्चे आ गए थे। तुम भी कुछ करो अब।

मगर बच्चा पैदा होना सिर्फ मेरे ही हाथ में तो नहीं था न। मैं पति से कहती कि सब लोग कहते हैं, मगर पति कभी कोई प्रतिक्रिया नहीं देते। अब सास—जेठानियों का व्यवहार मेरे प्रति बदलने लगा था, एक हद तक पति का भी।

एक रात को जब पति घर आए तो मंझली जेठानी ने मुझे ताना मारते हुए कहा, लगता है देवर जी देवरानी ने पाबंदी लगा रखी है अभी बच्चे के लिए, हम लोगों की तो गोदी में तो शादी के सालभर बाद ही बच्चा आ गया था।'

उस दिन पति पीकर घर लौटे थे, कमरे में जाते ही उन्होंने मुझे गाली देना शुरू कर दिया। जब मैंने प्रतिवाद किया तो बोले, बांझ हो तुम, मेरा वंश नहीं बढ़ने दोगी। इस पर जब मैंने कहा अगर बच्चा नहीं हो रहा तो हम दोनों को डॉक्टर के पास जाना चाहिए, तो पति बुरी तरह बिलख गए। बात बढ़ी तो हाथ छोड़ दिया मुझ पर। उसके बाद तो यह सिलसिला लगभग रोज का किस्सा हो गया।

मेरे पति खुद के नपुंसक होने की कुंठा में इतने सनक गये कि इस सनकपन में वह एक दिन वीसीआर और रंगीन टीवी खरीद कर ले आए। दिन में उसमें घर के लोग रामायण—महाभारत और भगवान के कीर्तन सुनते और रात में पति उसमें ब्लू फिल्में लगा कर देखते। वह मुझे भी देखने के लिए मजबूर करते। नहीं देखने पर जलील करते। पर वह फिल्में इतनी हिंसक ढंग से सेक्स करतीं कि कोई लड़की उसे देख ही नहीं सकती। फिल्म देखने के बाद मेरे पति मेरे साथ संबंध बनाते हुए वैसी ही अमानवीय जोर आजमाइश करते।

मैं कई बार सोचती यह क्या इनकी कोई नई बीमारी है जो बच्चा नहीं हो पाने के कारण उभर आई है। या पहले से छुपी हुई गंदगी है जो शादी के शुरुआती साल में छिपी हुई थी। छुपी हुई इसलिए कि यह फिल्मों के पोस्टरों पर भी नैतिकता की बातें करते। कहते भी देखो समाज मुनाफे लिए किस तरह गर्त में धकेला जा रहा है।

इस बीच सास—जेठानियां भी अब मुझे बांझ कहकर ताने देने लगी थीं। जब भी पलटकर कुछ बोलने के लिए मुंह खोलती, मुझे बुरी तरह मार पड़ती। यहां तक कि मंझली जेठानी—सास भी उसमें सहयोग करती। अब तो उत्पीड़न की हद यह हो गई कि मुझे खाना भी नहीं दिया जाता, दिनभर काम में खटाया जाता और रात को पति मार के साथ शरीर नोचता। ससुर जी कुछ हद तक प्रतिवाद करते, मगर उनकी कोई नहीं सुनता। पड़ोस की भाभी कभी—कभी जब भूखी होती तो छुपाकर छत से खाने को कुछ दे देतीं। सास को पता चला तो उन्होंने उन्हें भी बुरी तरह डांटा।

मैं मायके से संपन्न घर से थी, तो पिता—भाई मुझे मायके जाने पर पैसे देते। मैं स्कूल जाने वाले पड़ोसी बच्चों से कुछ मंगवा लेती अपने लिए। पहले सोचा धीरे—धीरे सब ठीक हो जाएगा, मगर जब वो लोग मुझे बुरी तरह सताने लगे, मुझे खाना भी नहीं देते तो मैंने सोचा मुझे इस बारे में मायके में बात करनी चाहिए।

इस बारे में पिता को बताया तो वो सकते में आ गए, मगर वो भी यही कहते कि ससुराल में एक बार लड़की की डोली जाती है और उसके बाद उसकी अर्थी उठती है उस घर से तुम निबाहो। मैं बात करूंगा दामाद जी से। मगर इस बीच मायके आने पर मां के साथ मैं डॉक्टर से अपना चैकअप जरूर करवा आई। मुझमें किसी तरह की कमी नहीं थी। मैं बच्चा पैदा कर सकती थी।

इस बार जब ससुराल लौटी तो जब पति ने उसी बात पर मुझे गालियां देते हुए मारना शुरू किया तो मैंने कहा मैं बांझ नहीं हूं, मैंने डॉक्टर से अपना टेस्ट करवाया है, तुम भी करवा लो। मेरा ये कहना तो जैसे मेरे लिए काल बनकर निकला। उस दिन उसने मुझे इतनी बुरी तरह से मारा कि मेरा हाथ ही तोड़ दिया।

लेकिन मेरे पति ने अपना चैकअप नहीं कराया और न ही डॉक्टरी सलाह ली। इन मुश्किलों के बीच मैंने एक दिन अपने सास से भी बहुत विनम्रता से कहा कि उन्हें कहिए एक बार दिखा लें, शायद सब ठीक हो जाए। पर उन्होंने मुझे धमका दिया।

कहने लगीं, पूरे मोहल्ले में मेरा बेटा नपुंसक का तमगा लेके घूमेगा। डॉक्टरों का क्या है, वे पैसे के लिए कुछ भी कह देंगे। हमने तो न सुनी कि मरद में कोई कमी होती है। हमेशा औरत ही बांझ होती है।

इन हालातों के बीच मुझे लगने लगा कि मैं मानसिक रोगियों के बीच हूं, यहां ज्यादातर लोग पागल हैं और पूरा घर एक बच्चे के लिए सनक गया है। अब मेरे लिए ये सब सहन करना असंभव हो रहा था। 4 साल बीत चुके थे ये झेलते—झेलते। किसी तरह मां और भाभी ने हिम्मत दिखाई और तलाक के लिए अर्जी दाखिल की।

जब तलाक की प्रक्रिया चल रही थी, पड़ोस में मेरे जानने वाले कुछ लोगों ने मुझे बताया कि उसी बीच पति के घरवालों ने उसकी दूसरी शादी करवा दी थी। ताकि लोगों को ये बता सकें कि मैं बांझ थी इसलिए तलाक दिया और उनके घर में बच्चा आ जाए।

हमारा तलाक का केस तो लंबा चला, मगर मुझे खबर मिलती रही कि दूसरी शादी से भी उसका कोई बच्चा नहीं हुआ। हां, दूसरी बीवी ने शादी के 5 साल बाद उसका डॉक्टर के पास टेस्ट जरूर करवा दिया, जिसमें पता चला कि वह कभी बाप बन ही नहीं सकता।

तलाक के बाद मेरे घरवालों ने मुझ पर दूसरी शादी के लिए दबाव डाला, मगर उस हद तक प्रताड़ना झेलने के बाद मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी कि दोबारा शादी करूं। किसी तरह मुझे मनाकर मेरी शादी करवा दी घर वालों ने। आज मैं दो बच्चों की मां हूं, और दूसरे पति मुझे समझते भी हैं। मगर जब भी पिछली जिंदगी को याद करती हूं, मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

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