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सावित्री बाई फुले, फ़ातिमा शेख़, ज्योतिबा फुले जैसे शिक्षा को समर्पितों के नाम क्यों नहीं शिक्षक दिवस

Prema Negi
5 Sep 2018 11:27 AM GMT
सावित्री बाई फुले, फ़ातिमा शेख़, ज्योतिबा फुले जैसे शिक्षा को समर्पितों के नाम क्यों नहीं शिक्षक दिवस
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पढ़िए शिक्षक दिवस पर कुछ सवाल उठाता हुआ सुशील मानव का लेख कि सामंतवादी जनेऊधारी गुरुओं से लेकर उत्तर-आधुनिक उपभोगवादी शिक्षकों तक किसी भी समय-काल में, कोई भी शिक्षक समाज के प्रति उत्तरदायी नहीं रहा...

समाज विविध परिस्थितियों एवं भूमिकाओं के अन्तर्संबंधों का समुच्चय होता है। प्रत्येक प्रस्थिति से कुछ न कुछ उत्तरदायित्व का भावबोध जुड़ा होता है; पर सबसे अधिक सम्मान व प्रतिष्ठा जिस सामाजिक परिस्थिति से निबद्ध होती है, निःसंदेह वो शिक्षक ही है।

शिक्षक की भूमिका ही शिक्षक को उसकी परिस्थिति से संबंधित उत्तरदायित्व व अवसरों का बोध कराती है। अतः शिक्षक की भूमिका समाज में उसके पद से संबंधित तथा समाज द्वारा अपेक्षित एवं स्वीकृत व्यवहार व प्रतिमानों की वो अवस्था है जिसमें शिक्षक के कर्तव्य एवं अवयव दोनों का ही समावेश होता है।

शिक्षा समाजीकरण की एक प्रक्रिया है एवं इसी प्रक्रिया में वह नियंत्रण का कार्य भी करती चलती है। सही तरह से शिक्षित (समाजीकरण) होने से व्यक्ति का व्यवहार सामाजिक नियमों एवं मूल्यों के अनुरूप होता है और वो विचलनकारी व्यवहार नहीं करता। इस तरह शिक्षा सामाजिक नियंत्रण का एक महत्वपूर्ण साधन भी है।

इस साधन को साधने के परिप्रेक्ष्य में शिक्षक की भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। शिक्षक, शिक्षा एवं समाज आपस में इस तरह अन्योन्याश्रित हैं कि किन्ही दो को अलग करके किसी एक पर बात कर पाना संभव ही नहीं है।

शिक्षक का कर्तव्य शिक्षा के उद्देश्यों की पूर्ति करके शिक्षा के कार्य को संपन्न करवाना है। सबसे पहले हमें ये समझने की जरूरत है कि आखिर शिक्षा के उद्देश्य क्या है?

पूँजीवादी अर्थव्यवस्था ने शिक्षा के अर्थ को संकुचित करके उसे सिर्फ जीविकोपार्जन तक सीमित कर दिया है। शिक्षा अपने उद्देश्य में कभी भी इकहरी नहीं होती, हो ही नहीं सकती। बावजूद इसके औद्योगीकरण के प्रकरान्तर उत्तर-आधुनिक उदारीकरण, शिक्षा की महत्ता को कार्य विशेष की दक्षता से जोड़कर जीविकोपार्जन मात्र के साधन तक सीमित रखने की वैश्विक साजिश रचती है, जिसमे तर्क एवं विचार के लिए कोई गुंजाइश ही नहीं है।

ऐसे में शिक्षा के सही उद्देश्यों की प्रतिपूर्ति करवाना ही शिक्षक का परम कर्तव्य हो जाता है। ज्ञानार्जन, जीवन-उपार्जन, चरित्र-निर्माण, शारीरिक विकास, सांस्कृतिक विकास के साथ साथ शिक्षा का सामाजिक उद्देश्य, शिक्षा का व्यक्ति उद्देश्य एवं शिक्षा का सम्पूर्ण विकास संबंधी उद्देश्य सही मायने में शिक्षा के उद्देश्य की समग्रता है।

दूसरा मानीखेज़ प्रश्न शिक्षा के कार्य का है, आखिर शिक्षा का कार्य क्या है ? शिक्षा सहायक है मनुष्य को वो सब प्राप्त करने में जिसके वो योग्य है और जिसकी वो आकांक्षा करता है। शिक्षा छात्र को न सिर्फ अतीत (संस्कृति व सभ्यता का इतिहास) का परिचय देती है अपितु वर्तमान में जीने की सक्षमता तथा भविष्य के निर्माण की योग्यता भी प्रदान करती है।

शिक्षा छात्र में मानवोचित एवं समाजोनुकूल गुणो का विकास करके उन्हें समाज का एक कुशल एवं सक्रिय सदस्य बनाने का कार्य करती है। शिक्षा छात्र के मस्तिष्क एवं समाजोनुकूल गुणों को विकसित कर उनमें सहानुभूति, विशाल ह्रदयता,कर्तव्य परायणता, सच्चाई,लगन, परोपकारिता एवं बलिदान की भावना का विकास करती है। जिससे वो सबके हित को अपना हित मानकर सामाजिक मान्यताओं के अनुकूल व्यवहार कर सके।

इसके अतिरिक्त नैतिक एवं चारित्रिक विकास, संस्कृति संरक्षण एवं विकास, चेतना का विकास, राष्ट्र के लक्ष्यों की पूर्ति, भाषा का ज्ञान व विकास, व्यवसायिक कुशलता तथा जन्मजात शक्तियों का उदात्तीकरण ही शिक्षा का कार्य है जिसकी संपन्नता शिक्षक की कार्य कुशलता है।

शिक्षा के सही अर्थ, उद्देश्य एवं कार्य को आत्मसात किये बिना कोई भी शिक्षक अपने कर्तव्य का निर्वाहन नहीं कर सकता।

इधर इन दिनों तमाम पत्र-पत्रिकाओं एवं वैचारिक मंचों द्वारा पढ़ने-सुनने को जो कुछ मिल रहा है उसमें शिक्षा को संस्कार बताया जा रहा है। जबकि शिक्षा संस्कार नहीं है,

जहाँ कोई समूह या समुदाय शिक्षा को संस्कार मान लेता है, वहीं वो शिक्षा के अर्थ का अनर्थ कर बैठता हैं।

संस्कार दरअसल एक ब्राह्मणवादी शब्दावली है। संस्कार शब्द से मुझे इसलिए भी आपत्ति है क्योंकि ये कुछ गिने-चुने वर्णों तक सीमित, संकुचित रही एक दुराग्रही अनुष्ठान है, जिसका अर्थ शुद्धिकरण होता है। इंसान को जन्मजात अशुद्ध मानकर उसके शुद्धीकरण की बात करने वाली सोच ही गंदी है। एक गंदी सोच भला शिक्षा कैसे हो सकती है? जबकि शिक्षा समाज में इंसान होने की तमीज़ है।

चूँकि शिक्षा का कार्य शिक्षक से ही साध्य है अतः जिस अर्थ में शिक्षा सामाजिक प्रक्रिया है उसी अर्थ में शिक्षक की भूमिका भी सामाजिक हैं। शिक्षक की प्रतिष्ठा के निहितार्थ उसके पद के सामाजिक दायित्व एवं अधिकारों से है, जबकि शिक्षक का सम्मान उस पद को निभाने की क्षमता के मूल्यांकन में निहित है।

तो क्या जो सम्मान एवं प्रतिष्ठा शिक्षक की प्रस्थिति से सन्निद्ध हैं, शिक्षक उसकी प्रतिपूर्ति समाज को करता है?

यदि हम अतीत से लेकर वर्तमान तक के समाज को विश्लेषण की दृष्टिकोण से देखें तो हमें तमाम सामाजिक विद्रूपताएं ज्यों की त्यों दिखेंगीं। यदि हम काल के विस्तृत पाटे पर, सभ्यता एक छोर पर एकलव्य एवं दूसरे छोर पर रोहित वेमुला को खड़ा करें तो समाज के प्रति शिक्षकों द्वारा अब तक निभाई गई उनकी भूमिका का एकदम सही सही मूल्यांकन कर सकते हैं।

जन्मजात प्रस्थिति से लेकर अर्जित प्रस्थिति तक शिक्षक की भूमिका में कितना कुछ बदलाव आया! क्या शिक्षकों ने कभी भी, किसी भी काल में अपनी भूमिका का सही सही निर्वाहन किया? सामंतवादी जनेऊधारी गुरुओं से लेकर उत्तर-आधुनिक उपभोगवादी शिक्षकों तक किसी भी समय-काल में, कोई भी शिक्षक समाज के प्रति उत्तरदायी नहीं रहा।

शिक्षकों ने अपनी सारी जवाबदेही सत्ता और व्यवस्था प्रति निभाई है, जबकि इनकी प्रतिबद्धता समाज के प्रति होनी चाहिए थी। यही कारण है कि हमारे देश में शिक्षा प्रणाली हमेशा से ही विसंगतिसम्मत एवं भेदभाव पूर्ण रही है, तभी हमारे यहाँ शिक्षक एवं शिक्षण का कोई गौरवशाली इतिहास नहीं है।

ये विडंबना ही है कि शिक्षकों ने कभी भी अपनी भूमिका का सही निर्वाहन नहीं किया। मिथकीय सन्दर्भों के हवाले से देखें तो गुरु द्रोणाचार्य का एकलव्य के प्रति किया गया दुर्व्यवहार उसके समूह की प्रति उनके दुराग्रह का प्रतिमान था। काल के सापेक्ष्य परिस्थितियाँ सिर्फ इतनी बदली हैं कि आज के सन्दर्भ में एकलव्य की जगह रोहित वेमुला है। सामाजिक विद्रूपताओं के सबसे बड़े पोषक ये शिक्षक ही रहे हैं। शिक्षा आज भी भेदभाव युक्त है। सामंतवादी समय में जहाँ भेदभाव का मापदंड जाति व वर्ण आधारित थे वहीं आज पूँजीवादी समय में भेदभाव का आधार वर्ग या पूँजी है।

यहाँ ये बात भी चिन्तनीय है कि डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के नाम पर, उनके जन्मदिवस 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाना, शिक्षक का महिमामंडन है या सत्ता का? कहीं ना कहीं ये सत्ता का ही गुणगान है। यदि डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन सत्ता के सर्वोच्च पद पर आरूढ़ न हुए होते तो क्या तब भी शिक्षक दिवस उनके नाम पर, उनके जन्मदिवस पर मनाया जाता?

यदि सत्ता को उनके नाम से विलग कर दिया जाये, तो शिक्षक के रूप में उनके नाम-खाते में ऐसा क्या है, कि उनके जन्मदिवस को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाए? बतौर शिक्षक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने शिक्षा एवं समाज के लिए किया क्या है? शिक्षक दिवस को सावित्री बाई फुले, फ़ातिमा शेख़, ज्योतिबा फुले जैसे शिक्षा के लिए समर्पित लोगों के नामों पर क्यों न मनाया जाये? क्या किसी के पास इनसे असहमति के लिए कोई एक भी कारण है?

शिक्षक, शिक्षा द्वारा छात्र में अभियोजन पैदा करता है, जिससे वो मनुष्य बनकर अपने व्यवहार में परिवर्तन लाकर समाज के साथ अनुकूलन स्थापित कर सकें। पर मदरसों एवं संघ (आरएसएस) पोषित विद्यालयों के शिक्षकों की भूमिका शिक्षा के उद्देश्यों से परे है, ऐसा दरअसल शिक्षकों द्वारा अपनी भूमिका व्यवस्था के हाथों गिरवी रख देने से है। मदरसे एवं संघ के छात्रों में धार्मिक कट्टरता एवं अंधभक्ति की भावना प्रबल होती है जिससे समाजिक तनाव उत्पन्न होता है।

शिक्षा सामाजिक, राजनैतिक, नैतिक एवं धार्मिक तथ्यों को देखने, सोचने, समझने एवं महसूस करने की दृष्टि प्रदान करती है। शिक्षा व्यक्ति के दृष्टिकोण, मनोवृत्ति एवं विचारधारा को प्रभावित करती है। इस अर्थ में शिक्षक का काम शिक्षा द्वारा छात्र में आत्मविश्लेषण की क्षमता का विकास करके आत्मज्ञान का संचार करना है जिससे वो भविष्य में उचित अनुचित व्यवहार का अंतर समझ कर ज्ञान के विकास के साथ उचित व्यवहार की समझ विकसित कर सकें।

निःसंदेह इक्कीसवीं सदी विघटन एवं विमूल्यन का काल है। निजीकरण, वैश्वीकरण, उदारीकरण ने सामाजिक विघटन एवं नैतिक, मानवीय मूल्यों में विखंडन की गति को तीव्रतर कर दिया है। उपभोक्तावादी प्रवृत्तियों के कारण ही व्यक्तियों की अन्तःक्रियाओं एवं सामाजिक संरचना में अभूतपूर्व परिवर्तन आया है, जिसके प्रभाव स्वरूप शिक्षकों में अपनी प्रस्थिति से जुड़े आधुनिक अधिकारों के प्रति तो बहुत सजगता है पर कर्तव्यों के प्रति नितान्त उदासीनता है। ऐसे शिक्षक अपनी प्रस्थिति से संबंधित भूमिका को सही तरह से संपन्न नहीं करवा पाते हैं।

हालाँकि परिस्थिति व्यक्तिवादी नहीं होती बावजूद इसके व्यक्ति के व्यवहारों एवं क्रियाओं के माध्यम से ही परिस्थिति अपनी विशेषताओं की अभिव्यक्ति करती है। परंतु बाज़ारवादी उपभोक्ताकरण ने जिस तरह से समाज के बरक्श व्यक्तिवाद को खड़ा किया है उससे सामाजिक प्रस्थितियाँ गौण हो गई, व्यक्ति प्रधान हो गया। शिक्षक के पद की गरिमा लगातार अधोपतित हुई है।

शिक्षकों में चारित्रिक पतन, भ्रष्टाचार, कदाचार एवं सत्ताकांक्षा परिलाक्षित होने लगी है। विखंडित सामाजिक मूल्यों के कारण शिक्षक अपनी प्रस्थिति के सापेक्ष्य भूमिका का समुचित निर्वाहन नहीं कर रहे। वो सरकारी शिक्षक की नौकरी के आकांक्षी तो हैं पर शिक्षा के लिए सरकारी विद्यालयों को अपने बच्चों के अनुकूल नहीं मानते। ये हास्यास्पद है, विडंबनात्मक भी। सत्ता एवं व्यवस्था द्वारा शैक्षणिक प्रतिस्पर्धा को गुणवत्ता का मानक मानकर शिक्षा के निजीकरण को बढ़ावा दिया गया।

सरकारी विद्यालयों की तुलना में निजी विद्यालयों की शैक्षिक गुणवत्ता का डंका बजाया जा रहा है, पर निजी विद्यालयों के बरक्श ट्युशन एवं कोचिंग संस्थानों की बढ़ती आवश्यकता तथा संख्या निजी शैक्षणिक संस्थानों एवं इनके शिक्षकों की भूमिका को प्रश्नचिन्हित करती है। निःसंदेह व्यवस्था दोषी है, पर आधुनिक तकनीकी शिक्षक, चिकित्सा गुरु, प्रबंधन गुरु, कोचिंग गुरु, खेल गुरु, धर्म, योग व अध्यात्म आदि के गुरुओं ने भी शिक्षा का गुरुघंटाल कर रखा है।

शिक्षा की सार्थकता एवं चेतनाबोध भाषा में निहित होती है। भाषा के बगैर क्या शिक्षा एवं विचार का कोई औचित्य है? हमारी भाषा को दरकिनार करती चलती ये उत्तर-आधुनिक वैश्विक शिक्षा व्यवस्था, विचार, तर्क एवं संस्कृति को पीछे छोड़ती चलती है। शिक्षण की सार्थकता, सांस्कृतिक विरासत एवं जीवन का अर्थ प्राप्त करने में छात्रों की सहायता करने में है। क्या गैर भाषा में ये सब कुछ संभव है? अपनी भाषा के प्रति जुड़ाव एवं विषय के प्रति जिज्ञासा पैदा करना भी शिक्षक का ही उत्तरदायित्व है। मौजूदा संन्दर्भों में शिक्षकों ने इन उत्तरदायित्वों को कितना निभाया है?

पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में भाग्यवादिता, व्यक्तिवादिता, धार्मिक अंधविश्वास, आर्थिक वर्गभेद एवं संघर्ष की धारणा बलवान होती है। वैश्वीकरण के बरक्श सामाजिक एवं वैयक्तिक विघटन से प्रत्येक व्यक्ति, घटना, क्रिया, विचार को अर्थ एवं सार्थकता प्रदान करने वाले जीवन मूल्य संकट में हैं। मौजूदा परिवर्तित परिस्थितयों में शिक्षक का कर्तव्यबोध एवं कार्यभार और अधिक बढ़ जाता है।

शिक्षण एक सामाजिक क्रिया है और शिक्षक को किसी भी परिस्थिति में शिक्षण के मायने नहीं बदलने देने चाहिए। मौजूदा परिस्थितियों में शिक्षक का कार्य, छात्र में तर्क क्षमता एवं विवेक का विकास करना है जिससे नये मूल्यों के उदय होने के साथ नये विचारों एवं अभौतिक संस्कृति के बीच बढ़ते संघर्ष की स्थिति में वो वैचारिक संतुलन स्थापित कर सकें।

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