संस्कृति

युवा कहानीकार विमल चंद्र पाण्डेय की कहानी 'बूमरैंग'

Prema Negi
27 Nov 2019 5:57 PM GMT
युवा कहानीकार विमल चंद्र पाण्डेय की कहानी बूमरैंग
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युवा कहानीकार विमल चन्द्र पाण्डेय गत एक दशक से समकालीन लेखन में सक्रिय हैं। वे कहानी के अलावा कविता तथा उपन्यास लेखन में भी हाथ आजमाते रहे हैं। चर्चित कथाकार चंदन पाण्डेय, मनोज पाण्डेय के साथ विमलचंद्र पाण्डेय की तिकड़ी ने युवा लेखन में विशेष पहचान बनाई है। विमलचंद्र ने बहुत सहज सरल ढंग से कहानियां लिखी हैं। उनमें किसी तरह की कोई बनावट नहीं है। उनकी कविताओं में ऐसा ही आकर्षण है। वे फ़िल्म निर्माण कार्य से भी जुड़े हैं और आजकल मुंबई में रहते हैं। आज पढ़ते हैं उनकी कहानी 'बूमरैंग' जो एक ऐसे आम पात्र की कहानी है, जो एक शक्ति संरचना की अजीब विडंबना बोध की शिकार है। यहां प्रस्तुत है विमलचंद्र पाण्डेय की कहानी : विमल कुमार, वरिष्ठ पत्रकार और कवि

बूमरैंग

विमलचंद्र पाण्डेय

ख़ुद को न समझे जाने का दर्द, वह भी उससे जो आपको सबसे ज़्यादा समझता है, बहुत लम्बे समय तक बना रहता है। यह निहायत ख़तरनाक तरीक़े से दुनिया से विद्रोह करने को और हद पार होने पर क़त्ल या आत्महत्या करने की ओर ले जा सकता है। सभी अपने दुश्मन दिखायी देते हैं। मन करता है किसी को जान से मार डाला जाय या फिर आपको कोई मार-मार कर बुरी तरह लहूलुहान कर दे। मगर रवि के साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ और वह थके कदमों से बाहर निकला।

से लगा जैसे प्रिया ने पीछे से आवाज़ दी है। शायद उसे लग रहा हो कि यह तो कुछ ज़्यादा हो गया। उसने पीछे देखा। वहां कोई नहीं था। प्रिया सोच भी कैसे सकती है उसके बारे में ऐसा? हर बात की एक सीमा होती है। आसमान में चटक धूप खिली हुयी थी और मौसम बिना बात के मेहरबान हुये जा रहा था।

प्रिया की बदतमीज़ी भरी तेज़ आवाज़ और बिना सिर पैर के इल्ज़ामों पर वह बिल्कुल चुप लगा गया था और अब उसे बड़ी शिद्दत से महसूस हो रहा था कि उस वक़्त उसके बकवासों का करारा जवाब दे दिया होता तो शायद आफ़िस जाते वक़्त वह कुछ हल्का महसूस करता। मगर अब क्या किया जा सकता है। उसने सोचा। अगर रात में आफिस से लौटने के बाद भी प्रिया का रवैया वही रहा तो वह भी चिल्ला कर उसका जवाब देगा। जब वह चिल्ला सकती है, वह भी गलत आधार पर तो उसका तो कारण ठोस है।

से वाक़ई आजकल नये आफ़िस के बनने से पहले होने वाली हर मीटिंग में हिस्सा लेना पड़ता है। बाॅस बिना उसको रात के ग्यारह बारह बजे तक आफिस की हर योजना उससे बांट कर उसकी राय नहीं ले लेता, उसे चैन ही नहीं पड़ता। यहां प्रिया का रोना यह है कि उसकी मम्मी की तबियत ख़राब है और वह उसके साथ सोनीपत नहीं जा रहा। उसने कहा कि तुम अकेली जाकर उन्हें देख आओ, लेकिन यह ज़िद्दी औरत! इसका इगो इतना बड़ा है कि...। ऐसे तो पता नहीं कहां-कहां घूमती रहेगी और दिल्ली से सोनीपत जाना है तो मैं भी चलूं। आदमी शादी क्यों करता है। उसे याद आया कि पहले वह कितना ख़ुशगवार इंसान हुआ करता था। उसने गाड़ी का पिछला दरवाज़ा खोलकर ब्रीफ़केस अंदर फेंक दिया।

'रामलाल... रामलाल।’ उसने आवाज़ लगायी।

'आया सर।’ रामलाल एक मुड़ी तुड़ी सफ़ेद कमीज़ और पुरानी चिमुड़ी सी नीली पैंट पहने लगभग दौड़ता हुआ आया और ड्राइविंग सीट का दरवाज़ा खोलने लगा। मगर उसके पहले ही रवि ने उसे खींच कर दरवाज़े से अलग कर दिया।

'क्या हुआ सर?’

'तुझे कितनी बार समझाया है कि वर्दी साफ़ पहना कर ? समझाया है कि नहीं?’ रवि चीखा।

'ज...ज...जी सर।’ रामलाल को अपनी ग़लती सामने दिख रही थी। रवि अक्सर उसे कहा करता था कि उसे साफ़ वर्दी पहननी चाहिये। वह कोशिश करता था लेकिन रवि का शेड्यूल इतना टाइट था कि उसे अपनी वर्दी धोने और इस्तिरी कराने का वक़्त ही नहीं मिलता था।

'सर आपका आजकल बहुत टूर रहता है ना इसलिये टाइम थोड़ा कम मिला इधर।’

रामलाल मुस्कराता बहुत था जिसे वह कहता था कि उसकी मुस्कराहट परिस्थितियों को करारा तमाचा है। उसकी परिस्थितियां जिनसे जीतकर वह एक ड्राइवर होने के बावजूद एक राजा की तरह उभरा था।

'मेरा टूर है ना तेरा तो नहीं? तुझे पता है इन बदबूदार कपड़ों में तेरे पीछे वाली सीट पर बैठना कितनी बड़ी सज़ा होती है मेरे लिये?’ वह चीखा।

'अरे सर मेहनत का तो पसीना भी गुलाब की तरह महकता है, आप ही तो कहते हैं।’

रामलाल ने पूरी ताक़त से साहब का मूड ठीक करने की कोशिश की, जिसमें वह हमेशा कामयाब भी हो जाया करता था पर यह हमेशा वाला मौका नहीं था। यह वह समझ रहा था जब साहब ने उसे तुम की जगह तू पुकारा था तभी से। किसी अनहोनी की आशंका से ग्रस्त रामलाल ने जैसे ही अपना वाक्य ख़त्म कर चेहरे पर ख़ुशामदी मुस्कराहट लेकर दरवाज़ा खोलने की कोशिश की, रवि ने उसका काॅलर पकड़ कर खींच दिया।

'साले बैनचोद... मुझे फिलाॅसफ़ी सिखाता है? हट्ट...।’ उसका खींचना इतना तेज़ था कि रामलाल अचानक पीछे की ओर ज़मीन पर गिर पड़ा। उसने दरवाज़ा खोला और ड्राइविंग सीट पर बैठ गया उसने रामलाल के चेहरे की ओर देखा। उस पचास साला आदमी के चेहरे पर अपने से पंद्रह साल छोटे आदमी से गाली खाने के अपमानबोध से ज़्यादा कोई और ही भाव था जिसको वह पहचान नहीं पाया और गाड़ी स्टार्ट कर दी।

सने आफ़िस पहुंचने में रामलाल की ड्राइविंग की तुलना में काफी कम वक़्त लिया। गाड़ी स्पीड ब्रेकर्स पर भी धीमी नहीं हुयी और कई गाड़ियों को ओवरटेक करती एकाध रेडलाइट क्रास करती जब आफ़िस के सामने रुकी तो उसका गुस्सा काफी हद तक ठंडा हो चुका था। रामलाल को गाली देना और तेज़ गाड़ी चलाने से ऐसा हुआ है, उसने सोचा।

लेकिन सच यह था कि आफिस के पास पहुंचते ही अच्छा मूड और अच्छी शक्ल बनाना उसकी रोज़मर्रा की आदत में शामिल था। पर पहुंचते ही उसने पाया कि सब उसी का इंतज़ार कर रहे हैं। वह आफिस की धुरी है और कंपनी का आरएम उसकी सहमति के बिना कोई बड़ा फ़ैसला नहीं करता, इस कारण उसे भी आफिस से छोटे बाॅस जैसा दर्जा हासिल था, जिसके लिये उसकी पीठ पीछे चमचा और तेलू जैसे सम्मानजनक ओहदों से नवाज़ा जाता था।

ह ऐसे शब्द सुनकर गुस्सा नहीं होता था, बल्कि उसे लगता था कि उसने जिस रणनीति के तहत जिंदगी बिताने का यह तरीक़ा अपनाया है, वह सफ़ल हो रही है। पहले वह एक बहुत स्वाभिमानी और काॅलेज के दिनों में एग्रेसिव छात्रनेता हुआ करता था, मगर ज़िंदगी बिताने के लिये न तो उसका ईमानदार, एग्रेसिव होना काम आया, न ही उसकी प्रथम श्रेणी की डिग्रियां। उसने पाया कि जिंदगी बिताना और सफ़ल होना बहुत आसान चीज़े हैं बशर्ते इंसान ख़ुद को बदल ले। उसने यह विकल्प चुना और आज एक सफ़ल इंसान है या कम से कम उस रास्ते पर है।

'बाॅस ने आपको बुलाया है।’ रज़िया ने मीठी आवाज़ में आकर उससे कहा तो उसके विचारों की लड़ियां टूटीं। वह उठा और बाॅस के केबिन की ओर चल पड़ा। उसके दिमाग में आया कि रात को आफ़िस आवर के बाद जब वह बाॅस के साथ बैठकर ड्रिंक कर रहा होगा और नये आफिस के बारे में डिस्कस कर रहा होगा, उन्हें अपनी समस्या से अवगत करायेगा और प्रिया के साथ कहीं बाहर घूमने जाने के लिये एक हफ्ते की छुट्टी की बात करेगा।

'मे आय कम इन सर?’

सके यह पूछने पर जब बाॅस ने सिर्फ़ हाथ से इशारा भर किया तो अचानक उसेलगा कि कुछ गड़बड़ हो गयी है। क्या हो सकता है। वह बाॅस के करीबी कर्मचारी कम दोस्त से एक नौकर बन गया और चुपचाप जाकर उनकी मेज के सामने खड़ा हो गया।

'व्हाट द हेल हैव यू डन ?’ बाॅस ने हाथ में ली हुयी फाइल मेज़ पर पटक दी। वह समझ गया कि कुछ गड़बड़ हो गयी है। बाॅस अंग्रेजी का इतना क्रूर प्रयोग सिर्फ़ हद से नाराज़ या हद से ज़्यादा ख़ुश होता है।

'व्हाट हैपेन्ड सर...?’ उसने सहमते हुए पूछा।

दले में बाॅस ने उससे जो कुछ कहा और जिस लहजे में कहा, वह उसकी अंदरूनी कोमल सतहों को छील गया। बाॅस इज़ आलवेज़ राइट और कुछ बार हंस कर बात कर लेने का अधिकार पा लेने से वह बाॅस से गालियां खाने की अपनी नियति को नहीं बदल सकता।

शाम के पांच बजते ही वह चुपचाप अपनी सीट से उठा और बिना किसी की ओर देखे बाहर निकल गया। किसी ने उसे बाय नहीं कहा और न ही उसने चपरासी को मुस्करा कर कहा- 'और लम्बू जी, चला जाय ?’ और न ही चपरासी ने सकुचा कर हाथ जोड़े- 'सर, जी न कहा करें।’

गाड़ी का रुख घर से विपरीत दिशा की ओर डाल दिया। घर पर जाना भी एक हिम्मत का काम है। प्रिया से उसकी शादी ज़िंदगी का सबसे ग़लत फैसला हो गया। अब क्या करे? उसका मन बहुत भारी हो गया और उसने यूं ही अपनी पुरानी प्रेमिका जाह्नवी को फोन लगा दिया।

'हैलो।’

'हैलो।’ उधर से आवाज़ आयी।

'कैसी हो जाह्नवी?’ उसने ऐसी आवाज़ में पूछा जो रोने के किनारे पर अटकी हुयी थी और किसी का एक प्यार भरा बोल उसके आंसू निकाल सकता था।

'ओ रवि, मैं कैसी हो सकती हूं...।’ उसने दर्द भरी आवाज़ में कहा। वह जानता था कि जाह्नवी अपनी शादीशुदा ज़िंदगी से ख़ासी ख़ुश है लेकिन उसके सामने वह ये ख़ुशी कभी ज़ाहिर नहीं करती। ताकि वह महसूस कर सके कि वह लड़की उससे कितना प्यार करती थी और यह सोचकर वह हमेशा उसके लिये दुखी रहे।

'मैं तुमसे मिलना...।’ अभी उसकी बात पूरी नहीं हुयी थी कि अचानक किसी ने जाह्नवी को पीछे से पकड़ लिया और शायद गुदगुदाने लगा, क्योंकि जाह्नवी अचानक बुरी तरह हंसने लगी।

'छोड़ो छोड़ो मुझे, देखते नहीं फोन...।’ उसकी बहुत सारी हंसी में थोड़ी सी आवाज़ थी।

'अरे कौन है फोन पर... कहीं तुम्हारे पुराने वाले रवि साहब तो नहीं...?’ एकमर्दाना आवाज़ भी उस हंसी में जो अब बहुत तेज़ हो गयी थी, शामिल हो गयी। उसने झट फोन काट दिया।

'मुझसे बहस करता है बैनचोद। कंपनी का एक्सपेंशन मैं करवा रहा हूं या तू ?’ उसके दिमाग में फिर से बाॅस ने कब्ज़ा कर लिया। वह कई घंटों तक गाड़ी सड़क के किनारे लगाकर पता नहीं क्या सोचता रहा। बीच में प्रिया का फोन आया तो उसने झल्लाहट में फोन काट कर स्विच आफ कर दिया। फिर गाड़ी एक अंजान सड़क पर दौड़ा दी और खिड़की के बाहर नजऱ रख कोई बार ढूंढ़ने लगा। जितने भी बार मिले, सब बंद थे। वह उलझन में पड़ गया। सारे बार बंद?

ख़िर उसने एक पतली सड़क पर कार रोकी और अंडे के ठेले वाले से पूछा, 'यार इधर कोई बार है क्या?’

'हां है तो ज़रूर साहब पर आज तो बंद होगा न?’

'क्यों?’

'अरे साहब आज ड्राई डे है न।’

से अचानक याद आया कि आज ड्राई डे है और उसका मूड और ख़राब होने लगा। असहायता की स्थिति में उसकी आंखें भरने लगीं और किसी अंजान व्यक्ति को उसने मन में एक भद्दी सी गाली दी और कार का दरवाज़ा खोलकर बैठने लगा कि अंडे वाले ने उसे टोका।

'साहब गाली देने का कउन जरूरत है। आपको पीना है तो बताइये, हम इंतजाम तक ले चलते हैं, लेकिन उहां अंगरेजी बहुत कम्मे ब्रांड मिलता है, जादा से जादा बैगपाइपर टाइप का मिलेगा। चलेगा?’

राॅयल चैलेंज की इच्छा होने के बावजूद बैगपाइपर का नाम सुनकर भी उसने फैसला लेने में एक पल नहीं लगाया। 'चलो।’ उसने गाड़ी के दरवाजे़ लाॅक कर दिये।

'साहब लेकिन अंडा हमारे दुकान से लेना पड़ेगा।’ दुकानदार ने धीमी आवाज़ में शर्त रखी। वह मुस्कराया। शायद दिन में पहली बार।

'यार अंडे तो मैं कम ही खाता हूं। तुम वैसे क्या बना सकते हो?’

'जो कहें साहब, ब्वायल, आमलेट, भुर्जी।’

'ठीक है, भुर्जी बना देना, अब चलो।’

'साहब वहां बैठ लेंगे? जगह थोड़ी गंदी है।’

'यार तुम चलो तो।’ उसने अंडे वाले को धकेला।

क छोटा सा काउंटर था और हर ओर घुप्प अंधेरा था। उस अंधेरे में थोड़ी देर रह लेने पर आंखों को अच्छा ख़ासा दिखायी देने लगता था और अपने सामने बैठे व्यक्ति का चेहरा पता चल जाता था। उसने एक छोटी मेज के सामने आसन जमाया और कांउटर की ओर देखा। काउंटर वाला आदमी पूरी दुनिया देखे हुये संत की तरह लगता था। उसने एक लड़के को इशारा किया और थोड़ी देर में उसके सामने बैगपाइपर का एक अद्धा, पानी औ कुछ नमकीन रख गया।

सने लड़के को पैग बनाने से मना किया और ख़ुद पैग बना दस मिनट में तीन पैग लगा गया। चौथे पैग के अंदर जाने के बाद वह थोड़ा सामान्य हुआ। उसने कुछ पुराने दोस्तों से बात करने के लिये फोन स्विच आन किया और फिर स्विच आफ कर दिया।

कांउटर वाला व्यक्ति संत की तरह दुनिया से निर्लिप्त बैठा था। ऐसा लगता था किइसकी दुकान में कोई सारी बोतले तोड़ने-फोड़ने लगे तो भी यह ऐसे ही बैठा रहेगा। अचानक उसकी कानों में एक परिचित सी आवाज़ पड़ी तो वह चौंक गया। उसकी मेज़ से दो मेज़ की दूरी पर दो व्यक्ति आमने—सामने बैठे पी रहे थे और बातें कर रहे थे। जिस व्यक्ति की पीठ उसकी तरफ थी, उसने मुड़ी तुड़ी सफेद कमीज़ और नीली सी दिखती पैंट पहन रखी थी। वह अपने सामने वाले से कुछ कह रहा था। कुछ अस्पष्ट पंक्तियां उसके कानों में पड़ीं।

'मुझे इस बात का गम नहीं है कि साहब ने मुझे गाली दी बिज्जू। डर इस बात का लग रहा है कि उनका मूड बहुत ख़राब था और वह गाड़ी बहुत तेज़ चलाते हैं। कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाये।’

गले ने उसे सांत्वना दी और अगला पैग बनाया। सफेद कमीज़ वाला बोल रहा था, 'साहब बहुत अच्छे हैं यार। आज तक इस तरह कभी मुझसे बात नहीं की। मैं उनका ड्राइवर हूं, लेकिन कभी इस बात को जताते नहीं। इंसान ही हैं कभी-कभी मूड खराब हो जाता है सबका...।’

सकी आंखें भरने लगीं। काउंटर वाला उसकी ओर देख रहा था। उसने अंतिम पैग ख़त्म किया और धीरे से अपनी जगह से उठा। धीरे-धीरे लड़खड़ाता हुआ वह उन दोनों के पास जाकर खड़ा हो गया।

'रामलाल...?’ उसने सफेद शर्ट वाले के कंधे पर हाथ रखा। वह पलटा और उसकी ओर देखा।

'जी...?’

'रामलाल... आय’म साॅरी।’’ उसने भरी आंखों से उससे कहा।

'जी सर मैं रामलाल नहीं हूं। मेरा नाम तो रवि है।’

'रवि...? रवि तो मैं हूं। तुम मेरे ड्राइवर हो रामलाल...।’ उसकी जुबान अत्यधिक नशे के कारण लड़खड़ा रही थी।

'सर मैं रवि हूं। फरीदाबाद में ड्राइवर हूं बत्रा इंडस्ट्रीज का... आपका ड्राइवर नहीं।’ वह उठकर खड़ा हो गया था। सूट-बूट पहने एक सभ्रांत दिखते आदमी को वह यहां पाकर हैरान था।

'नहीं... तुम रामलाल हो....।’ उसने टूटी फूटी आवाज़ में कहा और काउंटर की ओर देखा।

'अरे वो रवि है साहब, यहां अक्सर आता है। वो रामलाल नहीं है।’ काउंटर वाले ने उंची आवाज़ में कहा।

सने अपने सामने खड़े उस आदमी को देखा। उसकी मूंछें नहीं थीं, पर उसके और रामलाल में बहुत सी समानताएं थीं। उसने उसका हाथ पकड़ा और लगभग रोता हुआ बोला।

'कोई बात नहीं अगर तुम रामलाल नहीं हो। तुम्हारे साथ तुम्हारे मालिक ने बुरा व्यवहार किया है, मैं उसके लिये तुमसे हाथ जोड़कर माफ़ी मांगता हूूं।’ उसने उसकी हथेलियों में अपना चेहरा छिपाया और फूट फूट कर रो पड़ा।

'अरे सर...।’ सफेद शर्ट वाला हड़बड़ा गया।

'बोलो तुमने मुझे माफ किया। अब मैं आइंदा अपने उपर नियंत्रण रखूंगा दोस्त।’

'मगर मैं रामलाल नहीं।’

'तो बोलो कि तुमने अपने मालिक को माफ किया या नहीं मैं उनकी ओर से तुमसे माफी मांग रहा हूं।’ उसने सामने पड़ी मेज़ पर बैठते हुये उसी तरह रोते हुये कहा। आसपास के शराबी उसे देख रहे थे। अच्छा-ख़ासा तमाशा हो रहा था और कोई इसे छोड़ना नहीं चाहता था।

'हां सर, किया...।’ सफेद शर्ट वाले ने पीछा छुड़ाने की गरज से कहा।

से अच्छा लगा। उसका मन कुछ हल्का हो गया। वह धीरे से उठा और जेब से मोबाइल निकाल कर स्विच आन कर दिया। एक बार सफेद शर्ट वाले के कंधे थपथपाए और लड़खड़ाती चाल में बाहर निकल गया। बाहर जाते समय उसने देखा प्रिया के सात मैसेज आये हुये थे। सबमें लिखा था, 'आयम साॅरी रवि। कहां हो, प्लीज़ कॉन्टैक्ट मी। तुम्हारा फोन नहीं लग रहा। आय लव यू। आयम साॅरी जान।’ उसने प्रिया को फोन लगाया और अपनी कार की ओर बढ़ने लगा। अंडे वाले ने आकर उसे सहारा दिया। उसे उससे पैसे लेने थे।

सके बाहर निकलते ही सफेद शर्ट वाली आदमी काउंटर की ओर बढ़ा और उसे पैसे देने लगा।

'कौन थे यह भाई साहब?’ उसने नोट गिनते हुये काउंटर वाले से पूछा।

'होगा कोई। पीने के बाद साधु बन जाते हैं सब। कल सुबह से साला फिर वही हो जायेगा जो रोज़ होता है।' काउंटर वाले संत ने कहा।

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