विमर्श

पूरा दक्षिण एशिया निष्पक्ष पत्रकारों की कब्रगाह, आजतक किसी सरकार पर नहीं चला मुकदमा

Janjwar Desk
4 Jun 2021 8:32 AM GMT
पूरा दक्षिण एशिया निष्पक्ष पत्रकारों की कब्रगाह, आजतक किसी सरकार पर नहीं चला मुकदमा
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(सरकार का अघोषित नारा है – सच को सच और झूठ को झूठ कने वाले पत्रकारों को हम कुचल देंगें और सच को झूठ और झूठ को सच बताने वाले पत्रकारों को पुरस्कृत करेंगे।) 

म्यांमार की सेना लगभग सभी समाचारपत्र और न्यूज़ चैनेल बंद करा चुकी है, अब केवल सरकारी मीडिया देश में काम कर रही है। ब्रौडबैंड है, पर इसपर बहुत सारी पाबंदियां हैं। पिछले 50 स अधिक दिनों से मोबाइल डाटा को काट दिया गया है और अब सैटलाइट डीश पर भी पाबंदी लगा दी गयी है....

वरिष्ठ पत्रकार महेंद्र पाण्डेय का विश्लेषण

हाल में ही विनोद दुआ के मामले में या फिर कोविड 19 के मामले में न्यायालयों की राय, टिप्पणी और आदेश से संभव है, बहुत लोग खुश होंगे और न्यायालयों के निष्पक्षता की दुहाई दे रहे होंगे, एक टिप्पणी थी, हरेक पत्रकार की रक्षा की जायेगी तो दूसरी टिप्पणी थी जब मानवाधिकार या नागरिक अधिकारों का हनन हो रहा हो तब न्यायालय चुप नहीं रह सकता।

आश्चर्य है कि ऐसी टिप्पणियों के बाद भी आज तक किसी सरकार पर आदेश की अवहेलना का मुकदमा नहीं चला, सैकड़ों पत्रकार या सोशल मीडिया पर पोस्ट डालने वाले देश भर की जेलों में बिना किसी सुनवाई के ही बंद हैं और मानवाधिकार का हनन हमारी सरकारें रोजमर्रा का कार्यक्रम बना चुकी हैं।

केरला के पत्रकार कप्पन बिना किसी आरोप के ही जेल में राजद्रोह और राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर बंद हैं, पर न्यायालयों को कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। पत्रकारों को भी न्यायालयों ने ऊंची जात और नीची जात में बाँट डाला है। विनोद दुआ पर तो कुछ ट्वीट का मामला भी था, पर कप्पन तो उस शहर तक भी नहीं पंहुंच पाए, जहां उन्हें जाना था – जाहिर है उन्होंने कोई रिपोर्टिंग उत्तर प्रदेश में की नहीं, पर वे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बना दिए गए और राजद्रोही करार दिए गए।

सरकारों पर न्यायालयों द्वारा पत्रकारों या मानवाधिकारों से सम्बंधित टिप्पणियाँ बस एक नाटक जैसा लगता है। यदि, न्यायपालिका सही में पत्रकारों की सुरक्षा चाहती है तो फिर आरोप गढ़ कर पत्रकारों को फंसाने वाले अधिकारियों या राजनेताओं पर कड़े दंड का प्रावधान करना चाहिए| ऐसा चार-पांच मामलों में कड़ी सजा के बाद स्वतः अधिकारी ऐसा करने से पहले सोचना शुरू करेंगे। इन्ही न्यायालयों को लाखों लोगों के मरने के बाद और अर्थव्यवस्था के गर्त में जाने के बाद भी सेंट्रल विस्टा परियोजना, यानि सरकारी महल परियोजना राष्ट्रीय महत्व की परियोजना लगती है।

संसद के लिए नया भवन एक मजाक है, जिसका देश की जनता से कोई लेनादेना नहीं है। यहाँ देश के चुनिन्दा करोडपति और अपराधी पिकनिक के लिए जाते हैं और पांच वर्षों में ही कई गुना अमीर बनकर निकलते हैं या फिर अपनी अपराध धोकर निकलते हैं। सरकार को देश को यह बताना चाहिए की साल के 365 दिनों में से संसद में कितने दिन काम होता है और जितने दिन काम होता है उसमें से कितने घंटे सदन का बहिष्कार किया जाता है, हंगामा किया जाता है, या फिर सभा स्थगित की जाती है। सरकार को यह भी बताना चाहिए की जितने दिन संसद का सत्र चलता है, उतने दिनों में औसतन कितने सदस्य संसद में मौजूद रहते हैं| हास्यास्पद तो यह है कि नया संसद भवन एक ऐसी सरकार बनवा रही है, जो हमेशा संसदीय प्रणाली और संविधान का दमन करती है।

सरकार का अघोषित नारा है – सच को सच और झूठ को झूठ कने वाले पत्रकारों को हम कुचल देंगें और सच को झूठ और झूठ को सच बताने वाले पत्रकारों को पुरस्कृत करेंगे। न्यायालयों में भी पत्रकारों का विभाजन है – एक तरफ अर्नब गोस्वामी हैं, तो दूसरी तरफ सच बताने वाले जेलों में सड़ते पत्रकार हैं। इन सबके बीच निष्पक्ष पत्रकारों से जुड़ा हरेक अंतरराष्ट्रीय संगठन हमारे देश को मानता है।

वर्ष 2020 में भारत में अपने काम के दौरान तीन पत्रकारों की हत्या कर दी गई, जबकि आतंक के साए से जूझ रहे अफ़ग़ानिस्तान, इराक और नाइजीरिया में भी इतने ही पत्रकार मारे गए| पूरी दुनिया में पिछले वर्ष अपने काम के दौरान कुल 42 पत्रकार मारे गए, जिसमें सर्वाधिक संख्या मेक्सिको के पत्रकारों की है, जहां अब तक 13 पत्रकार मारे जा चुके है। इसके बाद पाकिस्तान का स्थान है, जहां 5 पत्रकार मारे गए। इसके बाद भारत का स्थान है।

इन आंकड़ों को इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स ने अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस यानि 10 अक्टूबर, 2020 को जारी किया था। फेडरेशन के प्रेसिडेंट यूनेस जाहेद के अनुसार अधिकतर देशों ने पत्रकारों की हत्या के बदले बिना किसी आरोप के ही उन्हें जेलों में बंद करना शुरू कर दिया है। इस वर्ष दुनिया में लगभग 235 पत्रकारों को बिना किसी आरोप के ही जेल में डाला गया है। जेल में बंद करने पर ज्यादा हंगामा भी नहीं होता और पत्रकार को शांत कराने का काम भी हो जाता है।

कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स नामक संस्था वर्ष 2008 से लगातार हरेक वर्ष ग्लोबल इम्पुनिटी इंडेक्स प्रकाशित करती है| इसमें पत्रकारों की हत्या या फिर हिंसा से जुड़े मामलों पर कार्यवाही के अनुसार देशों को क्रमवार रखती है। इस इंडेक्स में जो देश पहले स्थान पर रहता है वह अपने यहाँ पत्रकारों की ह्त्या के बाद हत्यारों पर कोई कार्यवाही नहीं करता। ग्लोबल इम्पुनिटी इंडेक्स में भारत का स्थान 12वां था, जबकि 2019 में 13वां और 2018 में 14वां।

इसका सीधा सा मतलब है कि हमारे देश में पत्रकारों की हत्या या उनपर हिंसा के बाद हत्यारों पर सरकार या पुलिस की तरफ से कोई कार्यवाही नहीं की जाती।इन आंकड़ों से यह समझना आसान है कि देश में सरकार और पुलिस की मिलीभगत से पत्रकारों की ह्त्या की जाती है। इस इंडेक्स में सोमालिया, सीरिया और इराक सबसे अग्रणी देश हैं। पाकिस्तान 9वें स्थान पर और बांग्लादेश 10वें स्थान पर है। दुनिया के केवल 7 देश ऐसे हैं जो वर्ष 2008 से लगातार इस इंडेक्स में शामिल किये जा रहे हैं और हमारा देश इसमें एक है। जाहिर है, वर्ष 2008 के बाद से देश में पत्रकारों की स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार अफ़ग़ानिस्तान में वर्ष 2018 के बाद से 30 से अधिक पत्रकारों की ह्त्या की जा चुकी है। हालांकि हरेक ऐसी हत्या को तालिबानी संगठनों से जोड़ दिया जाता है, पर अधिकतर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के अनुसार गृहयुद्ध की विभीषिका झेल रहे देश में खोजी पत्रकारिता से सरकार भी डरती है और ऐसे पत्रकारों को कुचलना चाहती है।

अफ़ग़ानिस्तान जर्नलिस्ट्स सेफ्टी समिति के अनुसार देश में लगभग 10000 पत्रकार हैं और इनमें से 20 प्रतिशत से अधिक महिला पत्रकार है| महिला पत्रकारों पर खतरे अधिक हैं, और पिछले वर्ष मारे गए अधिकतर पत्रकारों में महिलायें थीं। अफ़ग़ानिस्तान जर्नलिस्ट्स सेफ्टी समिति के अध्यक्ष नजीब शरिफी के अनुसार पत्रकारों पह हमले सामान्य हैं, और इन्हें चुनकर मारा जा रहा है।

कुछ पत्रकार ऐसे भी हैं जिन्होंने विवादास्पद समाचार लिखना बंद कर दिया है, पर अधिकतर पत्रकार अपने पेशे में इमानदार हैं और इसका नतीजा उन्हें भुगतना पड़ रहा है। पिछले 6 महीनों में लगभग 18 प्रतिशत महिला पत्रकारों ने पत्रकारिता को अलविदा कह दिया है। इस वर्ष अबतक पत्रकारों को 132 सीधी धमकियां मिल चुकी हैं, यह संख्या पिछले वर्ष की तुलना में 26 प्रतिशत अधिक है।

म्यांमार की सेना लगभग सभी समाचारपत्र और न्यूज़ चैनेल बंद करा चुकी है, अब केवल सरकारी मीडिया देश में काम कर रही है। ब्रौडबैंड है, पर इसपर बहुत सारी पाबंदियां हैं। पिछले 50 स अधिक दिनों से मोबाइल डाटा को काट दिया गया है और अब सैटलाइट डीश पर भी पाबंदी लगा दी गयी है।

सैटलाइट डीश पर पाबंदी का उल्लंघन करने वाले के लिए एक वर्ष जेल या फिर 320 डॉलर के जुर्माना का प्रावधान है| सभी स्वतंत्र मीडिया आउटलेट को प्रतिबंधित करने के बाद से कुछ पत्रकार छिपकर ऑनलाइन समाचार प्रसारित कर रहे थे या फिर केबल टीवी के माध्यम से समाचार भेज रहे थे। सरकारी मीडिया ग्लोबल न्यू लाइट ऑफ़ म्यांमार के अनुसार अब सैटलाइट डीश को प्रतिबंधित कर दिया गया है क्योंकि इससे देश की सुरक्षा और शांति को खतरा था।

एक प्रतिबंधित मीडिया आउटलेट, इरावादी न्यूज़ आउटलेट के अनुसार सेना और पुलिस ने अब तक 80 से अधिक पत्रकारों को जेल में भेज दिया है। इनमें से अधिकतर पर धारा 505 (ए) के तहत कानूनी कार्यवाही की जा रही है, जो डर का माहौल पैदा करने और फेकन्यूज़ फैलाने से सम्बंधित है। इसके तहत दोषी ठहराए जाने पर तीन वर्ष की कैद का प्रावधान है। म्यांमार में हाल में एक लोकप्रिय कवि और स्वतंत्र पत्रकार, खेट थी, की हत्या सेना ने हवालात में कर दी| खेट थी के सबसे लोक्पीय कविता की एक पंक्ति थी, "वे हमारे सर में गोली मारते हैं, कितने नादाँ हैं वे, उन्हें पता ही नहीं हमारा आक्रोश सर में नही बल्कि ह्रदय में है"।

पाकिस्तान के एक प्रमुख पत्रकार हामिद मीर ने हाल में ही एक प्रदर्शन के दौरान कहा था, "हमारे घर में घुस कर हमपर हो रहे हमले को हम बर्दाश्त नहीं करेंगें, हमारे पास बन्दूक या टैंक तो नहीं है, पर हम तुम्हारे घरों के अन्दर क्या चल रहा है, यह जनता को जरूर बता सकते हैं"। यह प्रदर्शन एक दूसरे लोकप्रिय पत्रकार असद अली तूर के घर में घुसकर इन्टर सर्विसेज इंटेलिजेंस एजेंसी के अधिकारियों द्वारा की गयी मारपीट के विरोध में आयोजित की गयी थी। असद अली तूर का कसूर केवल इतना था कि उन्होंने सेना और इमरान सरकार की नीतियों के विरोध में कहा था| हामिद मीर के भी लोकप्रिय कार्यक्रम को जिओन्यूज़ नामक चैनेल ने सरकार विरोधी होने के कारण प्रसारण रोक दिया है।

हामिद मीर का कार्यक्रम पिछले 20 वर्ष से लगातार प्रसारित किया जा रहा था, इसका प्रसारण अंतिम बार 2007 में रोका गया था जब परवेज मुशर्रफ की सरकार ने देश में आपातकाल घोषित किया था| उस समय भी पत्रकारों ने आन्दोलन किया था, और इन आन्दोलनों में आज के प्रधानमंत्री भी शिरकत करते थे, और पत्रकारों से कहते थे की यदि मैं प्रधानमंत्री बन गया तो मीडिया बिलकुल स्वतंत्र होगा।

हामिद मीर के अनुसार हास्यास्पद यह है कि स्वतंत्र मीडिया का दावा करने वाले इमरान खान के शासन में मीडिया पर जितनी पाबंदियां हैं, वैसी किसी दौर में नहीं थीं| इमरान खान ने जब सत्ता संभाली थी तब प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में पाकिस्तान 139वें स्थान पर था, और अब यह 145वें स्थान पर है।

असद अली तूर पर हमले से पहले अप्रैल में पत्रकार अबसर आलम पर गोलियों की बौछार की गयी थी, ज्य्ली 2020 में महिला पत्रकार मतिउल्ला जान को कई दिनों के लिए अपहृत कर लिया गया था। फ्रीडम नेटवर्क पाकिस्तान के अनुसार इस्लामाबाद को भले ही सबसे सुरक्षित शहर माना जाता हो पर पत्रकारों के लिए या सबसे खतरनाक शहर है। वर्ष 2020 में पाकिस्तान में 148 पत्रकारों को या तो धमकाया गया या फिर उनपर हमले किये गए| इनमें से किसी भी मामले में कोई गिरफ्तारी नहीं की गयी, अधिकतर मामलों में उन पत्रकारों को ही अन्य मामलों में फंसा दिया गया।

बांगलादेश में वर्ष 2020 के दौरान कुल 247 पत्रकारों पर हमले किये गए या फिर उन्हें हिरासत में लिया गया। केवल कोविड 19 के मामलों में सरकार की लापरवाही उजागर करने वाले 85 पत्रकारों को गिरफ्तार किया जा चुका है। हाल में ही प्रतिष्ठित महिला पत्रकार रोजीना इस्लाम को स्वास्थ्य विभाग से गोपनीय जानकारी चुराने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। रोजीना इस्लाम लगातार कोविड 19 के आंकड़ों की हेराफेरी से सम्बंधित रिपोर्टिंग करती रही हैं। इसके बाद से अनेक मानवाधिकार संगठनों ने संयुक्त राष्ट्र से इस मामले में हस्तक्षेप करने की गुहार लगाई है।

जाहिर है, बड़े भाई भारत को देखकर अब सभी पड़ोसी देश पत्रकारों के लिए खतरनाक बनते जा रहे हैं। एक अंतर यह जरूर है की खतरनाक होने के बाद भी दूसरे देशों में अधिकतर पत्रकार खतरे से बेपरवाह पत्रकारिता के मौलिक सिद्धांत भूले नहीं हैं, जबकि भारत के पत्रकार तो झूठ, फरेब और फेकन्यूज़ को ही पत्रकारिता मान बैठे हैं।

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