विमर्श

किसी रियलिटी शो से कम नहीं है दिल्ली में वायु प्रदूषण का सालाना जलसा

Janjwar Desk
19 Oct 2020 9:44 AM GMT
किसी रियलिटी शो से कम नहीं है दिल्ली में वायु प्रदूषण का सालाना जलसा
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17 अक्टूबर को दिल्ली समेत कुल 29 शहरों में वायु प्रदूषण का इंडेक्स खराब (poor) श्रेणी में था, इसमें भी दिल्ली से अधिक इंडेक्स 5 शहरों – बुलंदशहर, फरीदाबाद, गाजियाबाद, जींद और मुरादाबाद का था -पर इनकी चर्चा किसी ने नहीं की.....

वरिष्ठ पत्रकार महेंद्र पाण्डेय का विश्लेषण

टेलीविज़न के बहुत सारे चैनलों पर रियलिटी शोज चलते रहते हैं। इनकी लोकप्रियता को देखते हुए हरेक साल इन शोज का एक नया सीजन शुरू हो जाता है। दिल्ली में वायु प्रदूषण भी एक रियलिटी शो की तरह है, जिसका हरेक वर्ष नया सीजन शुरू होता है और अक्टूबर से मार्च तक लगातार चलता रहता है। हरेक वर्ष पूरी सर्दियों में दिल्ली के साथ ही पूरा भारत प्रदूषण से घिर जाता है, जनता को प्रदूषण से मरने के लिए छोड़ दिया जाता है और राज्य सरकारें और केंद्र सरकार एक दूसरे पर आरोप लगाते रहते हैं, न्यायालयों से कुछ आदेश आ जाते हैं, प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की टीमें सड़क छानती हैं, कुछ लोगों/शहरी निकायों/उद्योगों पर जुर्माना लगाया जाता है और फिर गर्मियों की शुरुआत से सबकुछ पहले जैसा सामान्य हो जाता है। सर्दियों में अब तो मीडिया भी जोर-शोर से प्रदूषण के खिलाफ आवाज उठाने लगा है, पर होता कुछ भी नहीं है – बल्कि अगले साल प्रदूषण का स्तर पहले से भी अधिक बढ़ जाता है।

केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की वेबसाइट पर उपलब्ध 17 अक्टूबर के 115 शहरों के एयर क्वालिटी इंडेक्स से वायु प्रदूषण से सम्बंधित सरकारी नाकामी समझ सकते हैं। इस दिन 5 ऐसे शहर थे – भिवंडी, ग्रेटर नॉएडा, कुरुक्षेत्र, मुज़फ्फरनगर और नॉएडा - जहां वायु प्रदूषण बहुत खराब (very poor) स्तर पर था, पर इन शहरों के नाम न तो मीडिया में थे और ना ही सरकारी वक्तव्यों में। उस दिन पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडेकर बता रहे थे कि दिल्ली में कुल वायु प्रदूषण का महज 4 प्रतिशत हिस्सा पंजाब और हरयाणा के खेतों में कृषि अपशिष्ट जलाने के कारण है, और शेष 96 प्रतिशत प्रदूषण दिल्ली के अन्दर का है।

इसी दिन दिल्ली के मुख्यमंत्री केंद्र सरकार पर आरोप लगा रहे थे कि वे कृषि अपशिष्ट को जलाने से होने वाले प्रदूषण को अनदेखा कर रहे हैं। दूसरी तरफ दिल्ली के पर्यावरण मंत्री गोपाल राय अपने ही सरकार के पीडब्लूडी विभाग की किसी परियोजना पर दस लाख रुपये का जुर्माना ठोक रहे थे। मीडिया भी केवल दिल्ली में बढ़ते वायु प्रदूषण की चर्चा करता रहा। जाहिर है कि दिल्ली के अलावा किसी भी शहर के वायु प्रदूषण के स्तर के बारे में ना तो मीडिया की दिलचस्पी है, और ना ही केंद्र सरकार की।

17 अक्टूबर को दिल्ली समेत कुल 29 शहरों में वायु प्रदूषण का इंडेक्स खराब (poor) श्रेणी में था। इसमें भी दिल्ली से अधिक इंडेक्स 5 शहरों – बुलंदशहर, फरीदाबाद, गाजियाबाद, जींद और मुरादाबाद का था – पर इनकी चर्चा किसी ने नहीं की। पर्यावरण मंत्री जब दिल्ली के प्रदूषण का लेखा जोखा रखते है तो फिर उन्हें भाजपा शासित अन्य शहरों के प्रदूषण के स्त्रोत पर भी प्रकाश डालना चाहिए। आखिर अन्य शहरों और गाँव में भी आबादी है और लोगों पर प्रदूषण का वही असर पड़ेगा जो दिल्ली के लोगों पर पड़ता है।

केंद्र सरकार और केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के लिए दिल्ली का प्रदूषण बहुत महत्व रखता है। पहला फायदा तो यह है कि दिल्ली के वायु प्रदूषण की बात करने पर कोई भी पूरे देश में वायु प्रदूषण की चर्चा नहीं करता, इससे पर्यावरण मंत्रालय को राहत मिलती है। दिल्ली के प्रदूषण के सम्बन्ध में आसानी यह है कि समय और परिस्थितियों के अनुसार इसे पंजाब और हरयाणा के खेतों में कृषि अपशिष्ट जलाने, मोटर वाहनों, आस-पास के ताप बिजली घरों और यहाँ तक कि मध्य-पूर्व के रेगिस्तान से आयी रेत पर आसानी से थोपा जा सकता है।

दिल्ली सरकार पिछले कुछ वर्षों से केवल कृषि अपशिष्ट जलाने को की वायु प्रदूषण का मुख्य कारण बताती रही है, वहीं दूसरी तरफ हाल में ही उत्तरी दिल्ली नगर मिगम को एक करोड़ रुपये का जुर्माना भी लगा दिया है। दिल्ली में बड़े निर्माण कार्य रोक दिए जाते हैं, डीजल जेनरेटर सेटों पर पाबंदी लगाईं जाती है और सडकों पर झाड़ू लगाना बंद कर दिया जाता है। यह सब हास्यास्पद इसलिए लगता है क्योंकि यदि प्रदूषण कृषि अपशिष्ट जो पंजाब और हरयाणा में जल रहा है, उसी से हो रहा है तो फिर दिल्ली में पाबंदी क्यों लगती है? प्रदूषण नियंत्रण के नाम पर आजकल भारी-भरकम राशि वसूली जाती है, पर इस राशि को कोई जमा भी करता है या नहीं और यदि जमा करता है तो फिर इस राशि का उपयोग कहाँ किया जाता है, इसे कोई नहीं बताता।

सरकारे और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड वायु प्रदूषण की चर्चा के समय पीएम10 और पीएम2।5 के अतिरिक्त कुछ नहीं बताते। 17 अक्टूबर को कुल 115 शहरों के वायु प्रदूषण इंडेक्स में से 12 शहरों में हवा में ओजोन की समस्या थी और 6 शहरों में कार्बन मोनोऑक्साइड की समस्या थी, पर इनपर कोई चर्चा नहीं करता। यदि इन पैरामीटरों का कोई महत्व ही नहीं है तो फिर इंडेक्स में और वायु गुणवता मानकों में इन पैरामीटरों को रखा ही क्यों गया है? केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी किसी भी सूरत में इन पैरामीटरों की चर्चा नहीं करता। पर्यावरण मंत्री ने भी केवल दिल्ली के पीएम10 की चर्चा की थी। मीडिया भी ऐसे मसलों पर पूरी तरह खामोश रहता है।

कुल मिलाकर वायु प्रदूषण एक ऐसा मसला है, जिसपर खूब राजनीति की जाती है, क्लीन एयर की बात की जाती है, पीएमओ से लेकर राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों में बड़ी-बड़ी बैठकें होती हैं, न्यायालयें सरकारों को लताडती हैं – पर नतीजा शून्य रहता है, जनता इसका खामियाजा वर्षों से भुगत रही है और मर रही है। सरकारी रवैय्ये में कोई अंतर नहीं आता दीख रहा है, इसलिए भविष्य भी ऐसा ही रहेगा – धुंध से भरा। अगले वर्ष फिर से इसका नया सीजन आएगा।

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