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पुलिस हिरासत में 60 प्रतिशत से अधिक मौतें गिरफ्तारी के 24 घंटों के अंदर

Janjwar Desk
26 Oct 2020 2:14 PM GMT
पुलिस हिरासत में 60 प्रतिशत से अधिक मौतें गिरफ्तारी के 24 घंटों के अंदर
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2018 व 2019 में आश्चर्यजनक रूप से उत्तरप्रदेश में पुलिस हिरासत में मौत का एक भी मामला सरकारी आंकड़ों में दर्ज नहीं हुआ है... पढें यह विशेष आलेख...

राजा बग्गा का विशेष लेख

19 जून 2020 को व्यापारी पी जयराज और उनके बेटे जे बेनिक्स को तमिलनाडु के थूथुकुडी जिले में सथानकुलम पुलिस ने कोविड19 लाॅकडाउन के नियमों के उल्लंघन के आरोप में गिरफ्तार किया और उसी थाने में उन्हें हिरासत में रखा। इसके तीन दिन बाद बेनिक्स की अस्पताल में मौत हो गई और उसके अगले दिन जयराज की मौत हो गई। थाने में उन्होंने घंटों पुलिस की यातना सही और पुलिस ने उनकी पिटाई की। इस मामले में 26 सितंबर को सीबीआइ ने आरोप पत्र दाखिल किया जिसमें तमिलनाडु पुलिस के नौ लोगों पर जयराज और बेनिक्स की हत्या का आरोप लगाया गया।

यह पुलिस हिरासत में व्यक्ति के खिलाफ हिंसा के स्थानीय पैटर्न का एक उदाहरण है जिसे राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (National Human Rights Commission-NHRC) ने अपने दस्तावेज मे उल्लेखित किया है। एनएचआरसी के आंकड़ों के आधार पर जुलाई 2020 में इंडियास्पेंड ने यह रिपोर्ट की कि इस साल जुलाई 2020 तक सात महीने में पुलिस हिरासत में 51 से अधिक लोगों की मौत हो गई। 12 अक्टूबर तक एनएचआरसी में 16 अन्य मामले दर्ज किए गए। पुलिस हिरासत में व्यक्तियों का उत्पीड़न और हत्या के खिलाफ अपर्याप्त कानून और मौजूदा कानूनों के तहत पुलिस पर मुकदमा चलाने के पूर्व सरकार की मंजूरी की जरूरत ने न्याय प्राप्त करने में बाधा उत्पन्न की है।

यह आलेख राष्ट्रीय अपराध नियंत्रण ब्यूरो (National Crime Record Bureau-NCRB) के भारत में वार्षिक अपराध की रिपोर्ट के पिछले एक दशक के भारत में पुलिस हिरासत में हुई मौतों के आंकड़ों का विश्लेषण करने वाली दो श्रृंखलाओं में से एक है।

पिछले दस सालों में पुलिस हिरासत में देश में हुई कुल मौतों की लगभग आधी संख्या अकेले केवल तीन राज्यों महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश व गुजरात को मिलाकर हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि ऐसी सभी मौतों को न दर्ज किया जा सकता है और न ही उसकी एनसीआरबी को रिपोर्टिंग हो सकती है।

नेशनल कैंपन अगेंस्ट टाॅर्चर (National Campaign Against Torture - NCAT) द्वारा दर्ज किए गए ऐसे मामले राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से एनएचआरसी को प्राप्त हुए मामलों से भी अधिक थे। मीडिया रिपोर्टाें की बारीकी से जांच से यह पता चलता है कि हिरासत में मौत की वास्तविक संख्या दर्ज संख्या सेे अधिक हैं, जो एनसीआरबी के आंकड़ों में कुछ राज्यों की रिपोर्टिंग नहीं होने से दिखाई नहीं पड़ते हैं। आंकड़ों के अनुसार, 2018 एवं 2019 में उत्तरप्रदेश में पुलिस हिरासत में कोई मौत नहीं हुई, जबकि मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इस अवधि में कम से कम 19 ऐसे मामले सामने आए हैं। एनसीएटी ने अकेले 2019 में 14 ऐसे मामलों के दस्तावेज तैयार किए।

आंकड़े यह भी बताते हैं कि पुलिस हिरासत में 63 प्रतिशत मौतें पुलिस ज्यादातियों से बचाने के लिए संवैधानिक बाध्यता के तहत मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए जाने से पहले गिरफ्तारी के 24 घंटे के अंदर होती हैं।

पुलिस हिरासत में मौतों की कम रिपोर्टिंग

सीआइआइ (Crime in India - CII) की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 10 सालों में पुलिस हिरासत में 1000 से अधिक लोगों की मौत हुई है। इनमें से करीब 21..5 प्रतिशत से अधिक मौतें महाराष्ट्र में हुईं, उसके बाद आंध्रप्रदेश में 13 प्रतिशत और गुजरात में 11.5 प्रतिशत मौतें हुईं। इन तीनों राज्यों ने पिछले एक दशक में पुलिस हिरासत में हुई कुल मौतों में से लगभग आधा (1004 में 460 ) की रिपोर्ट की है।

पुलिस हिरासत में सबसे अधिक मौतें दर्ज करने वाले राज्यों में से उत्तरप्रदेश और महाराष्ट्र में दशक के उत्तरार्ध में आंकड़ों में भारी गिरावट देखी गई। इन दोनों राज्यों में पुलिस हिरासत में दर्ज 298 मामलों में दो तिहाई से अधिक करीब 70 प्रतिशत 209 मौतें पहले पांच साल में दर्ज की गईं। 2918 व 2019 के सीआइआइ रिपोर्ट के अनुसार, उत्तरप्रदेश में पुलिस हिरासत में कोई मौत नहीं हुई। जबकि मीडिया रिपोर्ट में यह उल्लेख किया गया है कि कम से कम 10 लोगों की इस अवधि में उत्तरप्रदेश में पुलिस हिरासत में मौत हुई है।

इनमें अप्रैल 2018 में उन्नाव रेप पीड़िता के पिता, सितंबर 2018 में सीतापुर के गोविंद, नवंबर 2018 में कानपुर में पवन तिवारी, दिसंबर 2018 में अमरोहा में बालकिशन, मई 2019 में कन्नौज में रवींद्र कुमार, जुलाई 2019 में मैनपुरी में छोटू उर्फ विनय, अगस्त 2019 में सोनभद्र में शिवम और अमेठी में राम अवतार, अमेठी में ही सत्यप्रकाश शुक्ला, हापुड़ में प्रदीप तोमर और अक्टूबर 2019 में प्रयागराज में दीपक मिश्रा की मौतें शामिल हैं। एनएचआरसी ने इन मामलों में उत्तरप्रदेश के डीजीपी को नोटिस भी जारी किया था। मीडिया रिपोर्ट का अधिक विस्तृत विश्लेषण व जांच इन आंकड़ों को और बढा सकता है।

एनसीएटी ने उत्पीड़न को लेकर तैयार किए गए 2019 की वार्षिक रिपोर्ट में उत्तरप्रदेश में ऐसे 14 मामलों का दस्तावेजीकरण किया। यह आंकड़ा सभी राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों से अधिक है। हालांकि एनसीआरबी को राज्य से उपलब्ध कराए गए आंकड़ों में इसमें एक भी मौत को पुलिस हिरासत में मौत का मामला नहीं मानता है।

एनसीआरबी के आंकड़े में 18 राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों में 10 सालों में 10 या उससे कम मौतों को दर्शाया गया है। अंडमान निकोबार में पुलिस हिरासत में केवल एक मौत हुई है, जबकि सिक्किम, चंडीगढ, दादर और नागर हवेली, दमन और दीव व लक्षद्वीप में पिछले एक दशक में ऐस कोई मौत नहीं हुई है। ये भारत के छह सबसे कम आबादी वाले राज्य और केंद्र शासित प्रदेश हैं। एनसीएटी द्वारा 2019 में छह में किसी भी मामले का दस्तावेजीकरण नहीं किया गया था।

उच्च जनसंख्या वाले दो राज्य पिछले एक दशक में एनसीआरबी में पुलिस हिरासत में 10 या उससे कम मौतों की रिपोर्ट करने वाले राज्यों में शामिल हैं। जनसंख्या की दृष्टि से दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शहर दिल्ली में पिछले एक दशक में चार मौतें हुई जो देश की कुल संख्या का 0.4 प्रतिशत हैं। यह संख्या गोवा, मेघालय और नागालैंड से कम है, जहां कुल पांच मामले दर्ज हुए और वह कुल संख्या का 0.5 प्रतिशत है। हालांकि 2019 में इन राज्यों ने दिल्ली की तुलना में पुलिस हिरासत में बहुम कम व्यक्तियों की मौत को दिखाया।

सीसीआइ 2019 की रिपोर्ट के अनुसार, गोवा में 4038, मेघायल में 4477 और नागालैंड में 1972 की गिरफ्तारी हुई। दिल्ली में इन तीनों राज्यों से 11 गुना अधिक 126,138 गिरफ्तारियां दर्ज हुईं। मीडिया रिपोर्टाें का विश्लेषण करने से 2019 में अकेले दिल्ली में चार मौतों का पता चलता है। इनमें मई में बलराज सिंह, जून में गोविंदा यादव और विपिन उर्फ सुमित मैसी अैर जुलाई में मुकेश कुमार की मौत शामिल हैं। बलराज सिंह के मामले में भी एनएचआरसी ने दिल्ली पुलिस आयुक्त को नोटिस जारी किया था। एनसीएटी ने 2019 में दिल्ली में पुलिस हिरासत में सात मौतों का उल्लेख किया है जबकि गोवा में एक भी मौत का जिक्र नहीं है।

बिहार जनसंख्या के हिसाब से भारत का तीसरा सबसे बड़ा राज्य है, वहां पिछले एक दशक में 10 मौतें दर्ज हुई हैं जो इस मामले में 11 दर्ज मामले वाले हिमाचल प्रदेश से पीछे है। बिहार में 2019 में हिमाचल प्रदेश में हुई कुल गिरफ्तारियों 18805 से 13 गुना अधिक 255797 गिरफ्तारियां हुईं। बिहार में वर्ष 2019 में पुलिस हिरासत में एक मौत दर्ज हुई। हालांकि प्रेस ट्रस्ट आॅफ इंडिया के एक दस्तावेज में ही अकेले तीन ऐसे मामले बिहार में पाए गए, जिनमें मार्च में सीतामढी में दो और अगस्त में रोहतास में एक मामला शामिल है। वहीं, जुलाई 2019 में नालंदा में पुलिस हिरासत में एक स्थानीय राजनेता की मौत के बाद एनएचआरसी ने बिहार के डीजीपी को नोटिस जारी किया था। एनसीएटी ने 2019 में अकेले बिहार में पुलिस हिरासत में मौत के नौ मामलों का दस्तावेजीकरण किया गया। यह संख्या केवल उत्तरप्रदेश, पंजाब 11 व तमिलनाडु 11 व हिमाचल प्रदेश से केवल एक कम है।

पुलिस कस्टडी में 24 घंटे के अंदर अधिक मौतें

28 सितंबर को मध्यप्रदेश के सतना जिले के सिंहपुर पुलिस स्टेशन में 45 वर्षीय राजपति कुशवाहा की मौत एक पुलिस इंसपेक्टर के सर्विस रिवाल्वर की गोली चलने से हो गई। चोरी की घटना को लेकर पिछली ही रात पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया था।

प्रत्येक गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के अंदर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए जाने का संवैधानिक अधिकार है, जैसा की ऊपर उल्लेख किया गया है। हालांकि पिछले एक दशक में अधिकतर मौतें कुशवाहा की तरह ही हुईं है।

सीआइआइ की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 10 वर्षाें में पुलिस हिरासत में 10004 मौतें हुई थीं, जिसमें अधिकांश व्यक्तियों 63 प्रतिशत की पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए जाने के 24 घंटे के भीतर हुई थी। 633 लोगों की मौत अदालत में मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए जाने से पहले हो गई।

गुजरात, उत्तरप्रदेश, तमिलनाडु, पंजाब व महाराष्ट्र में पुलिस हिरासत में तीन चौथाई से अधिक मौतें गिरफ्तारी के 24 घंटे के अंदर हुईं। गिरफ्तारी के 24 घंटे के अंदर गुजरात में इस तरह की 87 प्रतिशत मौतें हुईं। तमिलनाडु में इस तरह की घटनाओं में वृद्धि हुई। बीते छह सालों 2014-2019 के बीच तमिलनाडु में पुलिस हिरासत में मरने वाले 46 में 44 यानी 96 प्रतिशत की मौत गिरफ्तारी के 24 घंटे के अंदर हुई।

2019 में पिछले दशक के पैटर्न के अनुसार, पुलिस हिरासत में मरने वाले 62 प्रतिशत लोगों की मौत 24 घंटे के भीतर हो गई। 2013 में यह आंकड़ा 73 प्रतिशत था, जो दशक में सबसे अधिक था। सीआरपीसी की धारा 167 के अनुसार अदालतों के सामने पेश होने के बाद पुलिस हिरासत में मारे गए लोगों की संख्या एक तिहाई से भी कम है।

2010-2013 में 66 मौतें न्यायिक प्रक्रिया के लिए अदालत ले जाने के दौरान हुई थीं। इन मौतों में से लगभग 86 प्रतिशत यानी 57 पांच राज्यों आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, मध्य्रप्रदेश व उत्तर प्रदेश में हुईं।

2013 के बाद एनसीआरबी ने पुलिस हिरासत में अदालत में पेशी, कार्यवाही के समय, जांच से जुड़ी यात्रा में होने वाली मौतों की रिपोर्टिंग बंद कर दी। इससे उस प्रकार का डेटा विश्लेषण का आधार ही समाप्त हो गया, जिससे यह पता चलता कि पुलिस द्वारा अदालत और जांच के लिए ले जाने के दौरान कितने गिरफ्तार व्यक्ति मारे गए।

10 जुलाई 2020 को यूपी पुलिस की हिरासत में कानपुर के गैंगस्टर विकास दुबे की मौत हुई, जबकि छह दिसंबर 2019 को तेलंगाना के हैदाराबाद में बलात्कार के चार आरोपियों की मौत हुई। ये ऐसे मामलों के उदाहरण हैं जिसकी गणना अब जारी नहीं रखी गई है।

एनएचआरसी का डेटा सिविल सोसाइटी के डेटा से नहीं खाता मेल

एनसीआरबी की सीआइआइ रिपोर्ट पूरे भारत में पुलिस हिरासत में यातना के हद का संकेत दे सकती हैं यदि राज्य और केंद्र शासित प्रदेश पूरा आंकड़ा पेश करें तो। उदाहरण के लिए पश्चिम बंगाल ने 2019 के लिए अपना डेटा समय पर जमा नहीं किया, जिसके कारण एनसीआबी ने अपनी रिपोर्ट में 2018 के डेटा को 2019 का बता कर दोहरा दिया, ऐसा सीआइआइ 2019 की रिपोर्ट में कहा गया है।

एनसीआरबी डाटा संग्रह के लिए राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों पर निर्भर करता है कि वे पुलिस हिरासत में मौतों को रिपोर्ट करें, जो नहीं किया जाता। विश्लेषण में पुलिस हिरासत में मौतों में एनएचआरसी और एनसीआरबी के डेटा में अंतर दिखाई पड़ता है।

एनएचआरसी के दिशा निर्देशों के अनुसार, पुलिस हिरासत में मौत की सूचना जिला मजिस्ट्रेट एवं एसपी को 24 घंटे के अंदर एनएचआरसी के महासचिव को देनी होती हैै। एनएचआरसी पुलिस हिरासत में होने वाली मौतों के आंकड़ों को प्रकाशित करता है, जो राज्यों की रिपोर्टिंग और सीधे एनएचआरसी को की गई शिकायतों के आधार पर होती हैं।

एनसीआरबी ने 2019 में पुलिस हिरासत में मौत के 85 मामले दर्ज किए। एनएचआरसी ने वहीं इसी वर्ष पुलिस हिरासत में मौत के 117 मामले दर्ज किए जो 38 प्रतिशत अधिक हैं। गृह मंत्रालय ने संसद को बताया कि एनएचआरसी ने पाया कि उसके डेटा और एनसीआरबी के डेटा में कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं है। यह भी कहा गया कि एनएचआरसी ने पाया कि हरियाणा व मध्यप्रदेश से अंडररिपोर्टिंग हुई है और इस मामले को राज्यों के साथ सुलझाने के लिए उठाया गया है। साल 2018 में ओडिशा के मुख्य सचिव को भी एनसीआरबी ने पत्र लिख कर राज्य द्वारा एनसीआरबी को पुलिस हिरासत में मौत के आंकड़ों की अंडर रिपोर्टिंग के लिए स्पष्टीकरण मांगा।

अंडर रिपोर्टिंग के लिए राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों को जिम्मेवार ठहराया जा सकता है और इसके अलावा पुलिस हिरासत में मौतों के मामलों की मानक परिभाषाओं के नहीं होने को भी इसकी वजह माना जा सकता है, लेकिन पुलिस हिरासत में हिंसा की वजह से ही ऐसा होता है।

सिविल सोसाइटी ऐसे मामलों के आंकड़ों को और अधिक बताते हैं। नेशनल कैंपन अगेंस्ट टार्चर यानी एनसीएटी की 2019 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, 124 लोगों की हिरासत में मौत हुई। इनमें तीन चौथाई मौतें पुलिस के नियम विरुद्ध तरीकों के कारण हुईं, ऐसा आरोप मृतकों के रिश्तेदारों व स्थानीय लोगों ने लगाया।

अस्पष्ट वर्गीकरण एवं परिभाषाएं

सीआइआइ की रिपोर्ट यह नहीं बताती है कि पुलिस हिरासत में मौत में किस प्रकार से हुई मौतें शामिल हैं।

सर्वोच्च न्यायालय ने यह परिभाषित किया है कि पुलिस अभिरक्षा में होने का क्या मतलब है, इसे किसी पुलिस स्टेशन की सीमा या वाहन से विस्तारित किया गया है, जिसमें पुलिस के द्वारा व्यक्ति का प्रेरित या बाध्य की गई गतिविधि भी शामिल है। जैसे विभिन्न स्थानों पर व्यक्ति को पुलिस अभिरक्षा में जांच के लिए ले जाना आदि। सीआइआइ की रिपोर्ट में रिमांड में व्यक्ति की मौत के मामलों में वे लोग शामिल हो सकते हैं जिनकी न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के तुरंत बाद मौत हुई हो या जिनकी मौत जेल ले जाने के दौरान हुई हो। पर, 2014 के बाद के वर्गीकरण में इसकी स्पष्टता नहीं है।

पुलिस हिरासत के पूरा होने के तुरंत बाद किसी व्यक्ति की मौत के वर्गीकरण के बारे में स्पष्टता की कमी है। हिरासत के बाद की परिस्थिति में तुरंत होने वाली मौत को परिभाषित किए जाने की तत्काल आवश्यकता है। सक्षम प्राधिकारियों द्वारा इसे परिभाषित नहीं किए जाने की स्थिति में गिरफ्तार व्यक्तियों की मौतों की जिम्मेवारी तय करने को लेकर अस्पष्टता बनी रहेगी। अन्य देशों ने इसे स्पष्ट रूप से इंगित करने को लेकर एक रूपरेखा तैयार की है कि कौन-सी मौतें इसमें शामिल की जाएंगी और कौन-सी नहीं। उदाहरण के लिए इंग्लैंड के इंडिपेंडेंट ऑफिस फॉर पुलिस कंडक्ट ने 2018 मे इसके लिए विवरण जारी किया है और विभिन्न परिस्थितियों को क्यों परिभाषित किया है, इसे तार्किक ढंग से समझाया है।

(राजा बग्गा का यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में इंडिया स्पेंड में प्रकाशित)

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