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आदिवासी हकों को कुचलने वाले सत्ताधारी किस मुंह से आज कर रहे महानायक बिरसा मुंडा को याद

Janjwar Desk
9 Jun 2021 5:41 AM GMT
आदिवासी हकों को कुचलने वाले सत्ताधारी किस मुंह से आज कर रहे महानायक बिरसा मुंडा को याद
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(छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने आदिवासियों के नायक बिरसा मुंडा को दी श्रद्धांजलि तो उठने लगे सवाल)

भूपेश बघेल हुकूमत की पुलिस ने मारे गए आदिवासियों को नक्सली करार दिया है, जबकि सिलगेर पंचायत के 3 गाँवों के अलावा आसपास के कम से कम 40 गाँवों के लोग सीआरपीएफ़ की 153वीं बटालियन के कैंप के ख़िलाफ़ सड़कों पर हैं...

नवल किशोर कुमार की टिप्पणी

जनज्वार। धरती आबा बिरसा मुंडा की शहादत को आज 9 जून को 121 साल हो गए। उनकी शहादत कई मायनों में खास थी। एक तरफ तो वह साम्राज्यवादी अंग्रेजी हुकूमतों को चुनौती दे रहे थे तो दूसरी ओर दिकुओं यानी सामंती जमींदारों और महाजनों के गंठजोड़ पर सीधा हमला कर रहे थे।

बिरसा की शहादत को इसलिए भी याद किया जाता है क्योंकि उन्होंने जल-जंगल-जमीन को लेकर उलगुलान का आह्वान किया था। उलगुलान के केंद्रीय विषय के रूप में वनाधिकार कानून, 1882 के प्रावधान थे। इस कानून के तहत पहली बार अंग्रेजों ने जंगल पर अपने दावे को कानूनी जामा पहनाया था।

रांची के केंद्रीय कारा में आज के दिन ही बिरसा का निधन महज 25 साल की उम्र में हो गया था। उन्हें आज देशभर के आदिवासी अपना महानायक मानते हैं। देश में आदिवासियों के अलावा अन्य भी हैं जो बिरसा को कृतज्ञतापूर्वक याद करते हैं।

लेकिन बिरसा मुंडा काे राजनीतिक तौर पर याद करने की रस्म चल निकली है। केंद्र में सत्तासीन भाजपा और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के लोग भी बिरसा को याद करते हैं। दोनों के सिर पर आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन पर अतिक्रमण का आरोप है। इस मामले में दोनों की भूमिका पूंजीवादी ताकतों के संरक्षक के रूप में रही है।

ध्यातव्य है कि भारत के आदिवासी क्षेत्रों में इन दिनों हालात उससे भी बदतर हैं जो बिरसा के समय थे। बस्तर हो या केवड़िया, नियमगिरी हो या नेतरहाट। तथाकथित विकास के नाम पर आदिवासी अपनी जमीन से उजाड़े जा रहे हैं। दिकुओं को बसाने के लिए उन्हें नक्सलवादी करार दिया जाकर या तो मुठभेड़ों में मारा जा रहा है अथवा बरसों बिना अदालती कार्रवाई के जेल में सड़ाया जा रहा है।

कांग्रेस और भाजपा के नेता किस रूप में बिरसा को याद करते हैं, इसकी एक बानगी छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल द्वारा आज ट्वीटर पर जारी संदेश है। अपने संदेश में उन्होंने लिखा है, "आदिवासियों के उत्थान के लिए आजीवन संघर्ष करने वाले महान क्रांतिकारी जननायक बिरसा मुण्डा जी को उनकी पुण्यतिथि पर कोटि-कोटि नमन। वे आदिवासी चेतना के प्रणेता थे। उन्होंने आदिवासियों को एकत्र कर जल, जंगल और जमीन के लिए आंदोलन किया। उनकी शौर्य गाथा आज भी लोगों को प्रेरित करती है।"

वहीं झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री व वर्तमान में अनुसूचित मामलों के केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा बिरसा को याद करते हुए ट्वीटर पर लिखते हैं, "देश की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले वीर भगवान बिरसा मुंडा की पुण्यतिथि पर उन्हें शत शत नमन।"

अब इन दोनों के संदेशों से यह स्पष्ट होता है कि बिरसा को लेकर उनके विचार क्या हैं। मतलब यह कि भूपेश बघेल अपने संदेश में बिरसा को आदिवासियों के उत्थान के लिए आजीवन संघर्ष करने वाले महान क्रांतिकारी जननायक करार देते हैं, जिन्होंने जल-जंगल-जमीन के लिए आंदोलन किया। वहीं अर्जुन मुंडा उन्हें आरएसएस की रणनीति के हिसाब से भगवान करार देते हैं और उन्हें देश की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण की आहुति देने वाला बताते हैं।

इन दोनों उदाहरणों के आधार पर एक विचार यह आ सकता है कि भूपेश बघेल बिरसा के मामले में अधिक सच्चे हैं और वे आदिवासियत का सम्मान करते हैं, जबकि अर्जुन मुंडा का संदेश आरएसएस द्वारा सुझाया गया है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल वास्तव में आदिवासियों के हितैषी हैं।

आदिवासियों के हितों के विरूद्ध उनके कई फैसले चर्चा में रहे हैं। एक उदाहरण बस्तर संभाग के सिलेगर का है, जहां आदिवासी अपनी ज़मीन से कैंप हटाए जाने की माँग पर डंटे हुए हैं। बीते दिनों छत्तीसगढ़ पुलिस ने निहत्थे व निर्दोष आदिवासियों पर गोलियां चलायी। इस गोलीबारी में तीन लोगों की मौत हो गई।

हालांकि भूपेश बघेल हुकूमत की पुलिस ने मारे गए आदिवासियों को नक्सली करार दिया है, जबकि सिलगेर पंचायत के तीन गाँवों के अलावा आसपास के कम से कम 40 गाँवों के लोग केंद्रीय रिज़र्व पुलिस फ़ोर्स (सीआरपीएफ़) की 153वीं बटालियन के कैंप के ख़िलाफ़ सड़कों पर हैं।

स्थानीय आदिवासियों का कहना है कि उन्हें पुलिस कैंप की आवश्यकता नहीं है। उन्हें सुविधा के लायक़ सड़क चाहिए, आंगनबाड़ी चाहिए, स्कूल चाहिए, अस्पताल चाहिए, हैंडपंप चाहिए। वे यह सवाल भी उठा रहे हैं कि क्या इन सबके लिए पुलिस कैंप की ज़रुरत होती है?

जाहिर तौर पर सिलेगर में प्रदर्शन कर रहे आदिवासियों का सवाल गैर वाजिब नहीं है।

उन्हें भूपेश बघेल सरकार से अनेक उम्मीदें थीं। यही वजह रही कि सलवा जुडूम का अपराध माफ कर छत्तीसगढ़ के आदिवासियों ने कांग्रेस को अपना समर्थन दिया। वे भूपेश बघेल से पूर्व रमन सिंह की हुकूमत के आदिवासी विरोधी फैसलों से आजिज हो चुके थे।

उन्हें उम्मीद थी कि भूपेश बघेल आदिवासी हितों का ख्याल रखेंगे। खनन संबंधी कानूनों को आदिवासियों के पक्ष में बनाने की पहल करेंगे ताकि आदिवासियों को विस्थापित न होना पड़े। इसके अलावा उन्हें उम्मीद थी कि बड़ी संख्या में ऐसे आदिवासी जो नक्सली के आरोप में छत्तीसगढ़ के जेलों में बंद हैं, भूपेश बघेल की हुकूमत उन्हें रिहा करेगी।

लोगों को उम्मीद इसलिए थी क्योंकि भूपेश बघेल ने ऐसे ही लुभावने वादे किए थे, लेकिन मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने आदिवासियाें को निराश किया है। ऐसे में बिरसा मुंडा को उनके द्वारा दी गयी श्रद्धांजलि महज औपचारिकता है। औपचारिकता इसलिए कि वे एक आदिवासी बहुल राज्य के मुख्यमंत्री हैं।

(नवल किशोर कुमार फारवर्ड प्रेस के हिंदी संपादक हैं।)

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