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Delhi Crackers Ban : पटाखों पर बिक्री पर पाबंदी से दुकानदारों की आजीविका पर संकट, लाखों रुपये के कर्ज में डूबे

Janjwar Desk
6 Oct 2021 9:25 AM GMT
Delhi Crackers Ban : पटाखों पर बिक्री पर पाबंदी से दुकानदारों की आजीविका पर संकट, लाखों रुपये के कर्ज में डूबे
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(पटाखों पर पाबंदी के आदेश के बाद दुकान में मूर्तियां व अन्य सामग्री बेचते दुकानदार अंकित)

Delhi Crackers Ban : दिल्ली सरकार के पटाखों पर पाबंदी के आदेश से विक्रेताओं पर आया रोजगार का संकट।

आदित्य प्रताप सिंह की रिपोर्ट

Delhi Crackers Banदिल्ली अथॉरिटी ने बीते 15 सितम्बर को एक आदेश जारी किया था कि दिवाली त्योहार (Diwali Festivel) के समय वायु प्रदूषण (Air Pollution) पर अंकुश लगाने के लिए राजधानी में पटाखों की बिक्री और भण्डारण दोनों पर बैन रहेगा। जो हर साल हजारो लोगों के मौत का कारण बनता है। हालांकि अथॉरिटी ने पटाखों से मौत का कोई आंकड़ा पेश नहीं किया। सवाल यह है कि अगर वायु प्रदूषण से मौतें हर साल होती हैं तो फिर इससे पहले अथॉरिटी क्या कर रही थी? दिल्ली के प्रमुख पटाखा बाजार चांदनी चौक, सदर बाजार,पहाड़गंज में हैं। इनमें सबसे बड़ा मार्केट चांदनी चौक स्थित पालीवाल गली है जो जामा मस्जिद के पास है। दिवाली के दौरान यहां 10 बड़े स्थायी लाइसेंस की दुकानें और 40 तात्कालिक लाइसेंस की दुकानें होती हैं।

अगर पटाखा जलाने से लोगों के स्वास्थ्य पर असर होता है तो पाबंदी लगाने से बहुत से लोगों के रोजगार (Employement) पर भी असर पड़ सकता है। ये अजित फायरक्रेकर के सेल्समैन कमल बताते हैं, "पिछले साल का माल अभी भी गोदाम में ब्लॉक ही है। चूंकि हमारे दुकान का लाइसेंस है तो इस साल भी जो माल खरीदा गया था वो भी ब्लॉक हो गया। ऐसे समय में बस दुकानदरों को दिक़्क़त ही दिक्कत है। भाई साहब नुक़सान तो बहुत है आकड़ों में क्या बताये लाखों करोड़ो का नुकसान झेलना पड़ा है। सब चीज़ की दिक्क्त हमारी रक़म भी ब्लॉक हो गयी जो माल ख़रीदा था,सोचा की उससे कुछ पैसा आएगा वो भी ब्लाक ही है। दिल्ली में ही पटाखों पर पाबंदी क्यों लगती है? पटाखा तो कई सालो से फूट रहे हैं, क्या बस 3- 4 साल से हीदिल्ली में पटाखे फूट रहे हैं?"

कमल आगे कहते हैं, ''सरकार से तो कोई खास उम्मीद नहीं है लेकिन दिल्ली सरकार से यही कहना चाहेंगे कि जब ग्रीन पटाखा अप्रूवल है तो इसे बेचने में क्या दिक्क्त है। इसे बेचने की इजाजत मिलनी चाहिये। ग्रीन पटाखों में दिक्कत क्या है ये तो बताते नहीं है ? जुलाई -अगस्त से पटाखों की खरीदारी शुरू हो जाती है और जिनके पास लाइसेंस है उन्हें तो पहले ही माल बुक कराना पड़ता है। सबके माल गोदाम में भरे पड़े हैं, लाखों - करोड़ो का माल फंसा है। इस लाइन में 20- 25 दुकानें लगती थीं। एक एक दुकान से कम से कम 5- 5 छोटे-छोटे डीलर जुड़े रहते थे। अब उन 20-25 दुकानदारों का नुकसान और उनके यहां काम करने वाले मजदूरों का नुकसान अलग से है। जो लोगों कहते है कि देश में बेरोजगारी (Unemployement) बढ़ रही है तो इसकी जिम्मेदार तो खुद सरकार है।

(अजित फायरक्रेकर्स के सेल्समैन कमल। चांदनी चौक)

पटाखा बैन से पिछले साल दिल्ली के पटाखा बाजार को करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ है। पटाखों पर कार्रवाई से पूरे देश में 10,000 करोड़ का नुकसान का अनुमान था, वहीं दिवाली सेल पर पटाखों की बिक्री से 72,000 करोड़ के टर्नओवर का अनुमान था। कनफेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया (CAIT) ने देश के 20 शहरों से आंकड़े निकाले थे। लेकिन इस बार ग्रीन पटाखा बैन से दिल्ली के पटाखा मार्केट को भारी नुकसान होगा। जिसका असर बाजार में साफ दिख रहा है। पटाखा बाजार में काम करने वाले मजदूरों पर भी इस पाबंदी का असर है। कमल बताते हैं कि हमारी दुकान पर इस वक्त 8 से 10 मजदूर रहते थे। अभी बस 2 -3 मजदूर ही दुकान पर हैं। अधिकतर मजदूर यूपी और बिहार से आते थे।

रोजगार की समस्या

रोजगार की तलाश में यूपी के प्रतापगढ़ से आए श्रीराम बताते हैं कि पहले मैं गारमेंट इंडस्ट्री में काम करता था। कोरोनाकाल में कपड़ा मंडी में बेरोजगारी की वजह से बहुत लोगों को हटा दिया गया, उसमे मेरी भी नौकरी चली गयी। मेरे जैसे मजदूर दिवाली के समय दिल्ली ये सोचकर आए थे कि सीजन में रोजगार मिलेगा। पटाखा बैन होने से सब कुछ खत्म होगा। अब आगे क्या होगा कुछ पता नहीं ? पहले मैं कपड़ा लाइन में था। 4 से 5 महीने पहले पटाखा लाइन में काम करने के लिए आया था। लेकिन पटाखा बैन की वजह से अब तो वापस फिर घर ही जाना पड़ेगा। मेरे पास कोई रोजगार नहीं है। कोई आमदनी नहीं है। घर का किराया भरने में दिक्क्त आ रही है। 3200 रुपये का महीना किराया चार महीने से नहीं भरा है। कमरे का किराया और दवाओं के लिए पैसा चाहिये। रोजगार नहीं होगा तो हमारा परिवार कैसे चलेगा, मैं उनका पेट कैसे भरुंगा। अरविन्द केजरीवाल प्रदूषण पर ध्यान दे रहे हैं लेकिन इन्हें लोगो के रोजगार पर भी ध्यान देना चाहिए।

भारत के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस.ए. बोबड़े (CJI S.A. Bobde) ने साल 2019 में पटाखों पर पाबंदी की याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा था कि हम किसी का रोजगार नहीं छीन सकते हैं। अकेले शिवकाशी में एक लाख से अधिक लोगों को पटाखा फैक्टरी से रोजगार मिलता है। दिल्ली के चांदनी चौक में एक छोटे से पटाखा बाजार में 1 से 2 हजार लोगों को रोजगार मिलता है।

'जनज्वार' ने जब एक फायर मैजेस्टिक दुकान मालिक से पटाखों पर पाबंदी को लेकर पूछा तो उन्होंने दूर से ही हाथ जोड़ लिए और बोले कि मुझे मीडिया से कोई बात नहीं करनी है। आपसे बात करके हमें क्या फायदा? क्या आप सरकार से बोलकर पाबंदी हटवा सकते हैं। लेकिन उन्हीं के भाई ने बताया कि साल 2016 से ही पटाखा बाजार की स्थिति खराब है। इस बार तो हालात और भी ज्यादा खराब हैं। मेरा खुद का फायरक्रेक का फैक्ट्री भी है जिसका सारा माल ऐसे ही गोदाम में पड़ा है। आप खुद देख लें इतनी बड़ी दुकान खाली है।

मैजेस्टिक फायर दुकान के मालिक ने यहां तक कह दिया कि आप सवाल पूछकर हमारे पुराने घाव को मत कुरेदो। हम पहले ही बर्बाद हो चुके हैं, अब हम बात नहीं करना चाहते हैं। दुकान पर सभी स्टाफ को मीडिया से बात करने की मनाही थी। 'जनज्वार' ने जिन भी दुकानदारों से बात करने की कोशिश की सभी का जवाब ऐसा ही था।

चांदनी चौक (Chandni Chowk) के पटाखा बाजार में कई ऐसी दुकानें हैं जो 70 साल अधिक से पुरानी हैं। एक तरह से इनकी पुस्तैनी दुकानें हैं। इनके दादा-परदादा के समय से ही पटाखों का कारोबार चला आ रहा है। चांदनी चौक के जामा मस्जिद रोड की तरफ संजय कुमार की फायरक्रैकर की दुकान है। संजय ने बताया कि ये दुकान 75 साल पुरानी है। जामा मस्जिद दुकान नंबर 6 में आती है। देखिये ये सरकार ने जो पटाखों पर पाबंदी लगाने का फैसला लिया है इससे बहुत लोगों की रोजी-रोटी चली गयी है। जैसे रिक्शा वाले, ठेले वाले, दुकान पर काम करने वाले लड़के सबका नुकसान हुआ है। मेरी दुकान पर 4 से 5 लड़के काम करते थे। लेकिन आज मेरे घर का ही एक लड़का है।

(चांदनी चौक के जामा मस्जिद रोड की तरफ संजय कुमार की फायरक्रैकर की 70 साल से पुरानी दुकान है)

संजय आगे कहते हैं, "जब आमदनी ही नहीं है तो लड़कों को पैसा कहां से देंगे। पहले इतनी अच्छी बिक्री हो जाती थी कि सबका घर चल जाता था। हमारे साथ एक नहीं बल्कि बहुत से आदमी जुड़े होते थे। पटाखों पर पाबंदी के बाद अब हमारे यहां कुछ बिक्री नहीं है। अब तो बस यहां एक ड्यूटी निभाने आते हैं। जबसे माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आप ग्रीन पटाखे (Firecrackers) बनाएं और बेचें। तबसे ग्रीन पटाखा ही बेच रहे हैं। लेकिन दिल्ली सरकार ने इन्हें भी बंद कर दिया। यह सुप्रीम कोर्ट के आदेश अवहेलना है। सारे दुकानदार डूब गए हैं, अब बचा ही क्या है, रोजी- रोटी की मुसीबत आ गयी है।

कुछ ही दूरी पर अंकित की पुश्तैनी पटाख़ा की दुकान है। अंकित बताते हैं कि मेरी दादी ने 1974 से दुकान लगाना शुरू किया था। मेरी दुकान का नाम प्रेम है, पटाखों का मेरा पुस्तैनी काम है। जब 11 साल का था तभी से दुकान चला रहा हूं, आज 36 साल उम्र हो गयी है। पटाखा बैन होने से हम पिछले 4 सालो से नुकसान झेल रहे है। 2016 में पटाखों पर पाबंदी लग गई थी। तबसे हमें लगातार आर्थिक नुकसान हुआ है। पैसों की सेविंग भी नहीं हो पा रही है। कोविड के दौरान हालात और भी बतर थे। लोगों को कोविड की एक मार पड़ी थी और हम कोविड की चार मार झेल रहे हैं।

अंकित आगे बताते हैं कि पहला, फाइनेंस की समस्या है। कोविड के बाद भी कोई ठोस आमदनी नहीं हुई। पिछले साल भी पटाखों पर बैन ही था। उधार का माल लिया उसका पैसा अभी तक नहीं दे पाया हूं। दूसरा, आमदनी न होने से जितनी सेविंग थी उससे ही अपनी दैनिक जरूरत पूरा कर रहे हैं। मेरी पूरी सेविंग कोविड के दौरान चली गई है। अब दूध खरीदते वक्त भी कई बार सोचना पड़ता है। मेरे खुद के आठ से दस लाख रुपये डूब गए हैं।

अंकित बताते हैं कि बीते 4 साल से मूर्ति का काम शुरू किया है लेकिन ऐसी कुछ खास आमदनी नहीं है। 2016 से पहले दिवाली के सीजन में इतनी फुर्सत नहीं होती थी कि कुछ खाना खा लें या आराम कर लें। ग्राहक की 11 बजे रात तक भीड़ रहती थी। मेरे 300 -400 रोज कस्टमर आते थे, आज मुश्किल से मूर्ति खरीदने 10 कस्टमर भी नहीं आ रहे हैं। आप मेरे हालात का अंदाजा खुद लगा लें कि हम किस दौर से गुजर रहे हैं।


अस्थायी पटाखा का दुकान

एक अस्थायी पटाखों की दुकान चलाने वाले अनिल बताते हैं कि हर दिवाली के सीजन में रोज का 8 -10 हजार कमा लेते थे, अब मुश्किल से महीने 15 रुपया भी नहीं कमा पाते हैं। 1980 से पटाखे की दुकान लगा रहा हूं। अब इस 60 साल की उम्र कोई दूसरा रोजगार भी नहीं कर सकता। क्या गाड़ी, फैक्टरी और भी चीजों से प्रदूषण नहीं फैलता है। बस पटाखों से ही प्रदूषण फैलता है।

40 साल से पटाखा बाजार में काम रहा हूं लेकिन अब कोई काम नहीं

बहराइच के रहने वाले नहकउ चांदनी चौक के पटाखा बाजार में 1980 से काम कर रहे हैं। वह बताते हैं कि पहले तो बहुत काम चलता था लेकिन पिछले 4 साल से कुछ काम ही नहीं है, लोग भूखे मर रहे हैं। कई मजदूर वापस घर चले गये हैं। पहले दिवाली के सीजन में रोजाना 800 से 900 रूपया कमा लेता था, लेकिन अब कहीं जाकर दिन के 100 -200 रुपये का काम मुश्किल से मिलता है जिससे रोटी का खर्चा ही निकल पाता है। किसी दिन तो कोई काम नहीं मिलता। परिवार में 8 -10 लोग हैं बस जैसे-तैसे चल रहा है। जब आमदनी नहीं हो रही है तो कैसे बताएं दें कि घर कैसे चल रहा है। पहले रात में 11 बजे तक काम मिल जाता था, रात तक माल ढोने का काम करता था।अब तो कुछ काम ही नहीं है।

सरकार का पक्ष

दिल्ली के मुखयमंत्री अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) का आदेश हैं की ग्रीन पटाख़ों पर 30 नवम्बर तक बैन रहेगा। उन्होंने व्यापारियों से अपील की कि पटाखों का स्टॉक न करें। पर्यावरण मंत्री गोपल राय ने कहा कि ग्रीन ट्रिब्युनल ने उन जगहों पर पटाखों पर पाबंदी की है जहां महामारी में वायु का प्रदूषण का स्तर सबसे खराब रहता है। इसको देखते हुए एक पूरे तरीके से 7 नवंबर से लेकर 30 नवम्बर तक पटाखों पर पांदी रहेगी।

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