भारत में भेदभाव सिर्फ दलितों, आदिवासियों, महिलाओं, दिव्यांगजनों और अल्पसंख्यकों तक नहीं सीमित, यूजीसी चेयरमैन को AIPF का पत्र

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UGC : आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट की राष्ट्रीय कार्य समिति के राष्ट्रीय महासचिव डॉक्टर राहुल दास द्वारा चेयरमैन, यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन को एक पत्र भेजा गया है। यह पत्र उच्च शिक्षा में उपचारात्मक कार्रवाई के लिए यूजीसी दिशा निर्देशों में वंश-आधारित भेदभाव (Descent-Based Discrimination – DBD) ढांचे को अपनाए जाने के संबंध में लिखा गया है।
पत्र में लिखा गया है, हाल ही में यूजीसी द्वारा कॉलेजों एवं विश्वविद्यालयों के स्तर पर अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, महिलाएं, दिव्यांगजन तथा अल्पसंख्यक समुदायों से संबंधित विद्यार्थियों के विरुद्ध होने वाले भेदभावजन्य कदाचारों को रोकने के लिए जारी उपचारात्मक दिशा-निर्देशों की ओर आकृष्ट करना चाहते हैं। इन दिशा-निर्देशों के पीछे की मंशा स्वागतयोग्य एवं सराहनीय है। उपर्युक्त सभी प्रकार के भेदभाव एक व्यापक एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त मानवाधिकार श्रेणी के अंतर्गत आते हैं, जिसे वंश-आधारित भेदभाव (Descent-Based Discrimination – DBD) कहा जाता है।
प्रसिद्ध दलित विद्वान एवं डॉ. आंबेडकर के शोध सहयोगी, स्वर्गीय भगवान दास जी को जिनेवा (स्विट्ज़रलैंड) तथा डरबन (दक्षिण अफ्रीका) में संयुक्त राष्ट्र के मंचों पर इस विषय को उठाने का अवसर मिला। उन्होंने भारत, नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश, जापान (बुराकू समुदाय के विरुद्ध) तथा कोरिया (पैकचोंग समुदाय के विरुद्ध) प्रचलित जाति एवं वंश-आधारित भेदभाव के बारे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय को अवगत कराया। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप संयुक्त राष्ट्र ने वंश-आधारित भेदभाव को अपने मानवाधिकार ढांचे में शामिल किया।
भारत में भेदभाव केवल दलितों, आदिवासियों, अन्य पिछड़ा वर्ग, महिलाओं, दिव्यांगजनों और अल्पसंख्यकों तक सीमित नहीं है। किन्नर (ट्रांसजेंडर एवं इंटरसेक्स व्यक्ति), जिन्हें सामान्यतः हिजड़ा कहा जाता है, भी अपनी पहचान और शारीरिक बनावट के कारण अपमान, उपहास और बहिष्कार का सामना करते हैं। उनमें से अनेक को सभी नागरिकों के लिए बने शैक्षणिक संस्थानों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित कर दिया जाता है।
इसके अतिरिक्त, भेदभाव केवल विभिन्न जाति समूहों के बीच ही नहीं बल्कि उनके भीतर भी मौजूद है। तथाकथित प्रभुत्वशाली जातियों जैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और कायस्थ के भीतर भी उपजातीय पदानुक्रम हैं तथा दलित समुदायों में भी—जैसे चमार समुदाय की अनेक उपजातियों एवं सफाई कर्मियों के विभिन्न समुदायों के बीच। ये विभाजन रोजमर्रा की सामाजिक प्रथाओं में दिखाई देते हैं, जैसे अंतर्जातीय विवाह निषेध तथा प्रमुख समाचारपत्रों में प्रकाशित जाति-आधारित वैवाहिक विज्ञापन।
दुर्भाग्यवश, जाति व्यवस्था राज्य से भी अधिक संप्रभु बन चुकी है। अनेक व्यावसायिक, सामाजिक और राजनीतिक लेन-देन जातिगत नेटवर्कों के माध्यम से संचालित होते हैं, जिससे प्रभुत्वशाली समूह असमान रूप से शक्ति बनाए रखते हैं और हाशिए के समुदायों को केवल “सहन” करते हैं।
हमारा विनम्र निवेदन है कि यदि यूजीसी अपने दिशा-निर्देशों को वंश-आधारित भेदभाव (DBD) के व्यापक ढांचे के अंतर्गत तैयार करे—जो उन सभी व्यक्तियों और समुदायों को सम्मिलित करता है जो उत्पीड़न, दुर्व्यवहार, अपमान, बहिष्कार और अवसरों के निषेध का सामना करते हैं— तो इन दिशानिर्देशों के उद्देश्य और अधिक सशक्त होंगे तथा वर्तमान अस्पष्टताओं और विवादों से भी बचा जा सकेगा।
इस संदर्भ में, हम कुछ दीर्घकालिक संरचनात्मक उपाय भी आपके समक्ष रखना चाहते हैं, जो शैक्षणिक परिसरों में जातिवाद को कम करने में सहायक हो सकते हैं :
• जाति सूचक उपनामों (सरनेम) को कानूनी रूप से प्रतिबंधित किया जाए।
• जब तक ऐसा कानून न बने, तब तक जाति सूचक उपनामों के प्रयोग को हतोत्साहित किया जाए या संक्षिप्त किया जाए।
• लिखित एवं मौखिक परीक्षा में अभ्यर्थियों की पहचान केवल रोल नंबर से हो, नाम से नहीं।
• जाति आधारित वैवाहिक वर्गीकृत विज्ञापनों को कानून द्वारा प्रतिबंधित किया जाए।
ये कदम भले ही छोटे प्रतीत हों, किंतु जाति-भेद को सामान्य बनाने वाली दैनिक प्रथाओं को समाप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
पत्र में आगे लिखा गया है, इस पत्र के माध्यम से हम आपको अवगत कराना चाहेंगे कि एआईपीएफ किसी एक जाति का प्रतिनिधित्व नहीं करता, बल्कि लोकतंत्र, सामाजिक अधिकारों और मानव गरिमा की पुनर्स्थापना के लिए संघर्षरत है। अतः आपसे विनम्र अनुरोध है कि यूजीसी इन सुझावों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करते हुए अपने उपचारात्मक दिशा—निर्देशों को सुदृढ़ करे।











