आंदोलन

आदिवासी युवक की हत्या के बाद लोगों ने किया लातेहार में प्रदर्शन, सरकार पर लगाये गंभीर आरोप

Janjwar Desk
1 Sep 2021 12:24 PM GMT
आदिवासी युवक की हत्या के बाद लोगों ने किया लातेहार में प्रदर्शन, सरकार पर लगाये गंभीर आरोप
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सुरक्षाबलों के हाथों मारे गये ब्रह्मदेव की पत्नी अपने मासूम बच्चे के साथ पति को न्याय दिलाने के लिए प्रदर्शन में हिस्सेदारी करती हुई

ब्रम्हदेव की पत्नी जीरामनी देवी व ग्रामीणों ने कई बार स्थानीय प्रशासन व पुलिस को आवेदन देकर ब्रम्हदेव की हत्या के लिए ज़िम्मेवार सुरक्षा बलों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज करने की मांग की है, लेकिन 3 महीने के बाद भी प्राथमिकी दर्ज नहीं की गयी....

विशद कुमार की रिपोर्ट

जनज्वार। झारखंड (Jharkhand) के लातेहार (Latehar) जिला के गारू थाना अंतर्गत पिरी गाँव के आदिवासी 12 जून 2021 को हर साल की तरह, गाँव के नेम सरहुल पर्व के लिए पारंपरिक शिकार करने के लिए घर से निकले थे कि सुरक्षाबलों द्वारा उन पर गोलीबारी की गई, जिसमें ब्रम्हदेव सिंह नाम के युवक की मौत हो गई। इसे नक्सल मुठभेड़ बताया गया।

इस घटना के बाद बाद गठित फैक्ट फाइन्डिग रिपोर्ट में साफ हो गया कि सुरक्षा बलों ने जान-बूझकर ब्रम्हदेव सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी थी। इसके बादवजूद सरकार व प्रशासन द्वारा इस हत्याकांड पर दोषियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई, इसलिए सरकार की निष्क्रियता के खिलाफ 31 अगस्त को पिरी व आसपास के गावों के सैंकड़ों ग्रामीणों व विभिन्न जन संगठनों के प्रतिनिधियों ने लातेहार ज़िला मुख्यालय में विरोध प्रदर्शन किया। धरने का आयोजन पिरी ग्राम सभा व निम्न संगठनों द्वारा किया गया था, जिसमेें अखिल भारतीय आदिवासी महासभा, अखिल झारखंड खरवार जनजाति विकास परिषद, झारखंड जनाधिकार महासभा व संयुक्त ग्राम सभा (लातेहार, पलामू, गढ़वा)। इसमें कई जन संगठनों व राजनीतिक दल के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

घटनाक्रम के मुताबिक 12 जून 2021 को पिरी के ब्रम्हदेव सिंह (Brahmdev Singh) समेत कई आदिवासी पुरुष नेम सरहुल मनाने की तैयारी के अंतर्गत शिकार के लिए गाँव से निकले ही थे कि उन पर जंगल किनारे से सुरक्षा बलों ने गोली चलानी शुरू कर दी। चे चिल्लाये कि वे आम जनता हैं, माओवादी नहीं हैं और गोली न चलाने का अनुरोध किया। युवकों के पास पारंपरिक भरटुआ बंदूक थी, जिसका इस्तेमाल ग्रामीण छोटे जानवरों के शिकार के लिए करते हैं, लेकिन ग्रामीणों ने अभी तक गोली नहीं चलायी थी।

ग्रामीणों की गुहार के बावजूद सुरक्षा बलों की ओर से गोलियां चलती रहीं, ऐसे में दिनानाथ सिंह के हाथ में गोली लगी और ब्रम्हदेव सिंह की गोली लगने से मौत हो गयी। इस घटना का दुखद पहलू यह है कि पहली गोली लगने के बाद ब्रम्हदेव को सुरक्षा बलों द्वारा थोड़ी दूर ले जाकर फिर से गोली मारने का आरोप है। दूसरी तरफ दोषियों के विरुद्ध कार्यवाई करने के बजाय पुलिस ने मृत ब्रम्हदेव समेत 6 युवकों पर ही विभिन्न धाराओं के अंतर्गत प्राथमिकी दर्ज कर दी है। साथ ही प्राथमिकी में पुलिस ने घटना की गलत जानकारी लिखी है।

ब्रम्हदेव की पत्नी जीरामनी देवी व ग्रामीणों ने कई बार स्थानीय प्रशासन व पुलिस को आवेदन देकर ब्रम्हदेव की हत्या के लिए ज़िम्मेवार सुरक्षा बलों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज करने की मांग की है, लेकिन आज तक प्राथमिकी दर्ज नहीं की गयी। धरना कार्यक्रम की शुरुआत में लोगों ने मृतक ब्रम्हदेव सिंह को याद करते हुए एक मिनट का मौन रखा। धरने को अनेक लोगों ने संबोधित किया। धरने के दौरान लोगों ने नारे लगाए और ब्रम्हदेव के परिवार को इन्साफ दिलाने के संकल्प सहित इस संघर्ष को मंज़िल तक पहुंचाने का संकल्प लिया गया।


धरने के अंत में लोगों ने मुख्यमंत्री को संबोधित संलग्न मांग पत्र को उपायुक्त लातेहार को दिया, जिसमें कई मांगें रखी गयीं। ग्रामीणों ने मांग की कि ब्रम्हदेव सिंह की हत्या के लिए ज़िम्मेवार सुरक्षा बल के जवानों व पदाधिकारियों के विरुद्ध जीरामनी देवी के आवेदन पर प्राथमिकी दर्ज की जाए एवं दोषियों पर दंडात्मक कार्यवाई की जाए।

पुलिस द्वारा ब्रम्हदेव समेत 6 आदिवासियों पर दर्ज प्राथमिकी को रद्द किया जाए। गलत बयान व प्राथमिकी दर्ज करने के लिए स्थानीय पुलिस व वरीय पदाधिकारियों पर प्रशासनिक कार्यवाई की जाए।ब्रह्मदेव की पत्नी जीरामनी देवी को कम-से-कम 10 लाख रुपए का मुआवज़ा व सरकारी नौकरी दी जाए एवं सरकार उनके 2 साल के बच्चे की पढ़ाई और परवरिश की जिम्मेवारी लें। अन्य पाँचों पीड़ितों को पुलिस द्वारा की गई प्रताड़ना का मुआवज़ा मिले।

नक्सल विरोधी अभियानों की आड़ में सुरक्षा बलों द्वारा लोगों को परेशान न किया जाए। किसी भी गाँव के सीमा में सर्च अभियान चलाने से पहले पांचवी अनुसूची क्षेत्र ग्राम सभा व पारंपरिक ग्राम प्रधानों की सहमती ली जाए। स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा बलों को आदिवासी भाषा, रीति-रिवाज, संस्कृति और उनके जीवन-मूल्यों के बारे में प्रशिक्षित किया जाय और संवेदनशील बनाया जाय।

गौरतलब है कि 12 जून 2021 को कई मीडिया माध्यमों में यह खबर छपी थी कि लातेहार के गारू थाना अंतर्गत कुकू-पिरी जंगल में सुरक्षा बलों और माओवादियों में मुठभेड़ हुई, जिसमें एक नक्सली मारा गया और कई बंदूकें बरामद हुईं। दूसरे दिन 13 जून 2021 को कई स्थानीय अख़बारों में यह खबर छपी कि सरहुल पर्व के पहले जंगल में शिकार करने निकले पिरी गाँव के आदिवासी युवकों में 24 वर्षीय ब्रम्हदेव सिंह की सुरक्षा बलों की जवाबी फायरिंग में गोली लगने मृत्यु हुई है।

इस मामले की जांच झारखंड जनाधिकार महासभा की ओर से विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधि, पत्रकार, वकील व सामाजिक कार्यकर्ताओं के तथ्यान्वेषण दल द्वारा की गई। महासभा द्वारा गठित दल में कई सामाजिक व मीडिया संगठन, आदिवासी अधिकार मंच, आदिवासी विमेंस नेटवर्क, ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क, द ग्रामसभा शामिल थे।

दल ने 17 जून को गांव का दौरा किया और ग्रामीणों व पीड़ितों से मुलाकात की एवं स्थानीय प्रशासन व पुलिस की प्रतिक्रिया, दर्ज प्राथमिकी और स्थानीय मीडिया द्वारा की गई रिपोर्टों का भी विश्लेषण किया।

जांच दल ने पाया कि 12 जून की घटना किसी भी प्रकार से "मुठभेड़" नहीं थी। सुरक्षा बलों द्वारा निर्दोष ग्रामीणों पर गोली चलयी गयी। घटना से सम्बंधित ब्रम्हदेव समेत छह ग्रामीण, हर साल की तरह, गाँव के नेम सरहुल पर्व के लिए पारंपरिक शिकार करने के लिए घर से निकले ही थे। उनके पास भरटुआ बंदूक थी जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी इनके परिवारों में रही है। इस बंदूक से सिंगल फायर होता है और इसका इस्तेमाल छोटे जानवर – जैसे खरगोश, मुर्गी, सूअर आदि के शिकार एवं फसल को जानवरों से बचाने के लिए होता है।

फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट के मुताबिक यह समूह जंगल की ओर थोड़ी दूर (लगभग 50 फीट) बढ़ा था, तब समूह के एक सदस्य को जंगल किनारे सुरक्षा बल के जवान दिखे। उसने दो कदम पीछे लिए और अपने अन्य साथियों को पीछे जाने को बोला। पीछे के लोग दौड़ने लगे। इतने में दूसरी तरफ से सुरक्षा बल ने गोली चलानी शुरू कर दी। जबकि ग्रामीणों के द्वारा उनके भरटुआ बंदूक से फायरिंग नहीं की गयी थी। उन्होंने पुलिस को देखते ही हाथ उठा दिया और चिल्लाया कि वे आम जनता हैं, माओवादी (पार्टी) नहीं हैं, और गोली न चलाने का अनुरोध किया। फिर भी पुलिस द्वारा लगातार गोली चलायी गयी, जिसमें दिनानाथ के हाथ में गोली लगी और ब्रम्हदेव के शरीर में।

इसके बाद सुरक्षा बल द्वारा ब्रम्हदेव को जंगल किनारे ले जाकर फिर से गोली मारी गयी और उनकी मौत सुनिश्चित की गयी। ग्रामीणों के अनुसार आधे घंटे तक पुलिस की ओर से फायरिंग की गयी। तथ्यान्वेषण दल को ग्रामीणों ने यह भी कहा कि सभी छः पीड़ितों का माओवादी संगठन से किसी प्रकार का रिश्ता नहीं है।

पुलिस द्वारा दर्ज प्राथमिकी से यह स्पष्ट है कि वे सच्चाई को छुपाना चाह रही है। प्राथमिकी में ब्रम्हदेव की पुलिस की गोली द्वारा हत्या का कहीं ज़िक्र नहीं है। इस कार्यवाई को मुठभेड़ कहा गया है और यह लिखा गया है कि हथियार बंद लोगों द्वारा पहले फायरिंग की गई और कुछ लोग जंगल में भाग गए। साथ ही मृतक ब्रम्हदेव का शव जंगल किनारे मिला। यह तो तथ्यों से विपरीत है। ब्रम्हदेव समेत 6 आदिवासियों पर आर्म्स एक्ट समेत विभिन्न धाराओं अंतर्गत केस दर्ज करना भी पुलिस की मंशा को बेनकाब करता है। वे ग्रामीणों पर दबाव बनाकर रखना चाहते हैं, ताकि पुलिस द्वारा गोलीबारी और हत्या पर ग्रामीण सवाल न उठाए। थाने में उन लोगों से कई कागजों (कुछ सादे व कुछ लिखित) पर हस्ताक्षर करवाया गया (या अंगूठे का निशान लगवाया गया)। लेकिन किसी को भी कागज़ में लिखी बातों को पढ़ कर नहीं सुनाया गया।

ऐसी घटनाएं राज्य में लगातार घटित हो रही हैं। उदाहरण के लिए, जून 2020 में पश्चिमी सिंहभूम के चिरियाबेड़ा गाँव के आदिवासियों की सीआरपीएफ द्वारा सर्च अभियान के दौरान बेरहमी से पिटाई की गयी थी। हालाँकि चाईबासा के अधीक्षक ने हिंसा में सीआरपीएफ की भूमिका को माना था, लेकिन पुलिस द्वारा दर्ज प्राथमिकी में हिंसा के लिए ज़िम्मेवार सीआरपीएफ शब्द तक का ज़िक्र नहीं है। आज तक न पीड़ितों को मुआवज़ा मिला और न ही ज़िम्मेवार सीआरपीएफ सैनिकों पर कार्यवाई हुई है।

पिछली भाजपा सरकार की दमनकारी और जन विरोधी नीतियों एवं आदिवासियों पर हो रहे लगातार हमले के परिणामस्वरूप ही हेमंत सोरेन के नेतृत्व में महागठबंधन को स्पष्ट जनादेश मिला। लेकिन यह अत्यंत दुःख की बात है कि अभी भी मानवाधिकार उल्लंघन की घटनाएं एवं आदिवासियों पर प्रशासनिक हिंसा व पुलिसिया दमन थमा नहीं है।

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