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जनज्वार विशेष

उत्तराखंड : बाजार में प्लास्टिक की दैनिक वस्तुओं की भरमार, हस्तशिल्पकारों पर दो जून की रोटी का संकट

Janjwar Desk
23 Oct 2020 12:53 PM GMT
उत्तराखंड : बाजार में प्लास्टिक की दैनिक वस्तुओं की भरमार, हस्तशिल्पकारों पर दो जून की रोटी का संकट
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आज बाजार लोगों को रिंगाल से बनी वस्तुओं का विकल्प प्लास्टिक की वस्तुएं दे रहा है, बाजार में प्लास्टिक की दैनिक वस्तुओं की भरमार है जो सस्ती तो होती हैं लेकिन वह पर्यावरण और शरीर के लिए भी बहुत हानिकारक हैं, रिंगाल से बनी वस्तुएं न तो पर्यावरण को नुकसान करती हैं और न ही लोगों के जीवन को.....

हल्द्वानी से बबीता उप्रेती की रिपोर्ट

उत्तराखण्ड जितना प्राकृतिक सुन्दरता के लिए जाना जाता है उतना ही अपनी हस्तकलाओं के लिए भी यह प्रदेश प्रसिद्ध है। यह हस्तकलाएं यहां की सांस्कृतिक विरासत की पहचान हैं। दस्तकारी समूचे उत्तराखण्ड में अपनी कला के लिए जानी जाती है। उत्तराखण्ड के कुमाऊ क्षेत्र में स्थित पिथौरागढ जिला है और इसी जिला मुख्यालय में स्थित मुनस्यारी तहसील है जो एक खूबसूरत पर्वतीय स्थल भी है। पिथौरागढ़ से लगभग 109 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक गांव गॉधीनगर है जो कि मुनस्यारी तहसील के अंतर्गत आता है। यह पूरा गांव रोजगार के लिए पूरी तरह रिंगाल के उत्पाद पर निर्भर है। रिंगाल उत्तराखण्ड के जंगलों में पाया जाने वाला झाडीनुमा पौधा है। इसकी लम्बाई केवल 7-8 मीटर ही होती है। रिंगाल बांस की एक प्रजाति है। बांस की अपेक्षा छोटे व मुलायम होते है। यह ऊंचाई वाली जगहों पर ही पाया जाता है।

पहाड़ के लोग बचपन से ही रिंगाल से बनी चीजों का उपयोग करते हुए बड़े होते हैं जिसमें रिंगाल से बनी कलम, सूपा, डलिया, घर की झाडू, घर की छत आदि चीजें बनी होती हैं पर अब यही रिंगाल घर, गावों से निकालकर बाज़ार को आकर्षित कर रहा है और इससे बनी चीजें कुर्सिया, फूलदान, टोकरियां, सोफे और भी लोगों को लुभा रहें हैं।


आज इस गांव (गांधीनगर) का हर परिवार रिंगाल के बने उत्पाद से जुडा हुआ है और यही इनके रोजगार का मुख्य साधन भी है। यह गांव सन् 1944-1945 का बसा हुआ है। उस वक़्त गांव के सामने मुख्य समस्या रोजगार की थी और एक ख़ास तबका ही इस व्यवसाय को करता था जो अनुसूचित जाति में बारूड़ी, बजेला और पार्की थे। रिंगाल को रोजगार का विकल्प बनाने के लिए प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी (इस गांव से तीन स्वतंत्रता सेनानी हुवे हैं) नरी राम ने अपने दामाद बारुड़ी परिवार को गांधीनगर में आकर बसने की पेशकश की थी। उन्होंने ही गाँव वालों को रिंगाल से बने उत्पादों को बनाना सिखाया और तभी से गाँव वालों का यह मुख्य कार्य बन गया। सभी जातियों के लोग इस काम से जुड़े हुवे हैं और लोगों के सामने रोजगार का एक नया रास्ता भी खुल गया। शुरुवाती दौर में गांव में 15 परिवार थे और आज गांव में 130 परिवार हैं और प्रत्येक परिवार से महिला-पुरूष रिंगाल के काम से जुडे हुवे हैं।

युवा वकील देवेन्द्र कुमार विश्वकर्मा जो इसी गांव के रहने वाले हैं और खुद भी इस काम में काफी रूचि रखते हैं और वो चाहते हैं कि रिंगाल से बनी हुवे उत्पाद केवल उत्तराखण्ड में ही नहीं बल्कि देश दुनिया के अलग-अलग कोनों में भी जाने चाहिए और इस हस्तकला को एक पहचान भी मिलनी चाहिए। उनकी चिन्ता इस बात पर ज्यादा है कि उनके गांव के लोग मेहनत तो बहुत करते हैं लेकिन अभी यह उद्योग मार्केट का रूप नहीं धारण कर पाया है। वो चाहते हैं कि चीजें बाजार और लोगों की पसंद के अनुसार बनायी जाए।

रिंगाल से बनाये जाने वाले मुख्य उत्पादों में प्याटिर (रिंगाल से बना बक्सा) था इसका उपयोग लोग लत्ते-कपडे रखने के लिए करते थे लेकिन वर्तमान में इसका निर्माण ना के बराबर होता है क्योकि इसका स्थान टिन के बक्सों ने ले लिया है। वहीं ठ्वौर-ड्वाक (पीठ पर बोकने वाला डोका) का उपयोग सामानों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिए किया जाता था। यह उस समय के लोगों का बैग/झोला हुआ करता था पर अब इसका स्थान आधुनिक बैग ने ले लिया है। त्यौर्छ-ड्वाक (बच्चों को सुलाने का डोका) इसका उपयोग बच्चों को सुलाने के लिए किया जाता था पर अब इसका स्थान बच्चों के पालने/झूले ने ले लिया है। दुदखौर/पुत्कु (दूध या अनाज रखने का बक्सा) इसका उपयोग दूध की ठेकी व अनाज रखने के लिए किया जाता था पर अब इसका स्थान स्टील आदि के बर्तनों ने ले लिया है। मौन् (रिंगाल से बना छाता) इसका उपयोग छाते के रूप में किया जाता था यह आकार में सूपे की तरह होता था खासकर महिलाएं खेतों में गुडाई के समय बारिश से बचने के लिए इसको ओडती थी पर अब इसका निर्माण नहीं होता है।

आज भले ही रिंगाल से बनी अधिकतर पुरानी चीजें कम दिखाई देती हैं पर आज भी कुछ चीजों का उपयोग गाँव के लोग करते हैं जिसमें डोका भी एक है। इसका उपयोग अनाज की बालियों को चुनकर रखने व घास लाने के लिए किया जाता है। राब्यो और केन का उपयोग भी डोका की तरह किया जाता है। मोस्टा (रिंगाल से बनी चटाई) यह रिंगाल की चटाई है इसका उपयोग अनाजों को सुखाने के लिए किया जाता है। भरमोट का उपयोग आज भी मोस्टे की तरह किया जाता है लेकिन अब इसका स्थान प्लास्टिक की चटाईयां ले रहीं हैं। सूपा इसका उपयोग धान, गेहू जैसे छिलके वाले अनाजों को साफ करने/बिनने के लिए किया जाता है। टोकरी इसका उपयोग रोटी रखने व हरेला बोने के लिए तथा बडी टोकरियों का उपयोग ऊन के धागे रखने के लिए आज भी किया जाता है। उत्तराखण्ड के गांवों में आज भी गोबर उठाने के लिए बडी टोकरियों का उपयोग करते हैं लेकिन अब वहीं टोकरी का स्थान प्लास्टिक के बर्तन ले रहे है।


आज बाजार लोगों को रिंगाल से बनी वस्तुओं का विकल्प प्लास्टिक की वस्तुएं दे रहा है। बाजार में प्लास्टिक की दैनिक वस्तुओं की भरमार है जो सस्ती तो होती हैं लेकिन वहीं वह पर्यावरण और शरीर के लिए भी बहुत हानिकारक हैं। रिंगाल से बनी वस्तुएं न तो पर्यावरण को नुकसान करती हैं और न ही लोगों के जीवन को।

लेकिन वहीं रिंगाल के उत्पादन से जुडे लोगों की कमाई के बारे में बात करेंगे तो निराशा ही हाथ लगेगी। शुरूआत में लोग रिंगाल के उत्पादों को अनाजों के साथ अदला-बदली किया करते थे, जिससे लोग साल में इतना कमा लेते थे कि 4-5 महीनों के लिए खाने की व्यवस्था हो जाती थी। लेकिन आज स्थितियां बिलकुल बदली हुयी हैं। अगर आज एक व्यक्ति एक दिन रिंगाल लाने जंगल जाता है तो वह लगभग 200 रिंगाल की डनडियॉ ला सकता है और उन से 40 टोकरियां बनाई जा सकती है। टोकरियों की बंधाई के लिए पतली लकड़ियों की आवश्यक्ता होती है जिसको लाने के लिए 1 दिन का समय लगता है और 40 टोकरियों की बंधाई के लिए 2 दिन का समय लगता है। कुल मिलाकर 40 टोकरियों को बनाने में 9 दिन का पूरा समय लग जाता है। 1 टोकरी का ठेकेदार 40 रूपये देता है। इससे काश्तकार 9 दिन में 1600 रूपये कमा लेता है। इसी रूपये से उसे अपना जीवन चलाना होता है। यद्यपि इस कमाई से एक काश्तकार सरकार की नजरों में गरीबी रेखा के दायरे से बाहर हो जाता है और प्रतिदिन 167 रूपये कमाने से उसके लिए परिवार चलाना बहुत मुश्किल हो जाता है। एक काश्तकार रात-दिन जितनी मेहनत करता हैं उस हिसाब से रिंगाल के उत्पादन में उसे कोई संतोषजनक कीमत नहीं मिल पाती है।

देवेन्द्र मानते हैं कि एक काश्तकार रिंगाल की काश्तकारी से बहुत अच्छी आमदनी कर सकता है परन्तु इसके लिए कुछ चीजों का होना अति आवश्यक है। अच्छे टूलकिट, अच्छा बाजार, सामान का प्रचार-प्रसार करने कि ओर अगर सरकार ईमानदारी से ध्यान दे तो रोजगार का इससे बेहतर विकल्प उत्तराखंड में कुछ नहीं हो सकता हैं इससे युवाओं का अधिक संख्या मेँ पलायन भी रुकेगा। मुझे जब भी समय मिलता है मैं रिंगाल के उत्पादों को बनाता हूँ और मैंने उनको सामान्य कीमत से अधिक 3 से 4 गुना कीमतों पर बेचा भी है। हालांकी मेरा इस काम से जुडना केवल आमदनी करना ही नहीं है मैं चाहता हूँ कि मैं काश्तकार को कुछ नया सिखाऊं जिसे वह बाजार कि प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बन सकें और अपना जीवन कुछ बेहतर कर सके।

काश्तकार इस बात को बख़ूबी समझ रहा है कि अगर बाजार में अपना स्थान बनाना है तो उसे अपने उत्पादों को लोगों की रुचि और पसंद के हिसाब से डिजाईन करना पड़ेगा इसलिए उसने बाजार के हिसाब से अपने उत्पाद बनाके बेचने भी शुरू कर दिये हैं जिनमें रिंगाल से बने हॉट केस, पेन स्टैंड, गुलदस्ते, हैंगर, टैबल लैंप, डस्टबिन, लेडिज पर्स। इनके अलावा राखी और कानों के झुमके भी रिंगाल से बनाये जा रहे हैं।


बाजार लोगों की रुचि को अपने हिसाब से बदलता जा रहा है इसलिए लोगों की पसंद गुणवत्ता से ज्यादा आकर्षक चीजों को खरीदने की हो गयी है ऐसे में रिंगाल से बनी चीजें गुणवत्ता से पूर्ण तो होती है लेकिन कम आकर्षक होती हैं इसलिए लोगों की पंसद भी नहीं बन पाती है। इन उत्पादों को बेचने के लिए सरकार को समय समय पर हाट/मेलों का आयोजन कराये जिसमें काश्तकार रिंगाल से बने उत्पादों के साथ-साथ अपने अन्य उत्पादों की भी प्रदर्शनी लगा सके। जैसे ऊन से बने वस्त्र, लोहे के उत्पाद आदि। इससे कास्तकारों को अच्छी कीमत मिलेगी और उनके कार्यो को प्रोत्साहन भी मिलेगा। आज ऑनलाईन का जामाना है इसलिए बिक्री को ऑनलाईन करनी की जरूरत है ताकि लोग घर बैठे ही इन उत्पादों को मंगा सकें।

वहीं 80 साल के लाली राम पार्की कहते हैं कि मेरा परिवार इस गांव मे तब आया जब में 5-6 साल का था। तब से ही मैं रिंगाल के इस काम में लगा हूं। यह हमारा पैत्रिक और जातिगत काम है और यही हमारा व्यवसाय भी है। इस काम के अलावा हमारे पास कोई विकल्प नहीं है। इस काम से केवल दो वक्त की रोटी मिल सकती है और कुछ नहीं। मेरे दो बेटे भी इस काम से जुड़े हुए हैं। मैं ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं हूं इसलिए सरकारी योजनाओं के बारे में ज्यादा नहीं जानता हूं। रिंगाल से जो उत्पाद हमने बनाये थे लॉकडाउन के समय वो घर में ही डम्प होकर रह गए। आगे कैसे चलेगा ये रामभरोसे ही है।

वहीं देबुली देवी जिनकी उम्र लगभग 62 वर्ष हैं वो भी इसी काम से जुड़ी हैं वो बताती हैं कि जीवन भर मेहनत करके भी हमें क्या मिला। हम रात-दिन मेहनत करते है उसके बाद भी मेरे परिवार की छोटी से छोटी आवश्यकताएं पूरी नहीं हो हैं। सरकारी योजनाओं कहां हमारे समझ में आएंगी। अगर सरकार हमारे लिए कुछ योजनाएं बना रही है तो वह किसी ऐसे पढ़े-लिखे को नियुक्त करे जो इन योजनाओं के लाभ के बारे में हमें इमानदारी से बतायें। वो उदास आंखों से अपने काम में लग जाती हैं।

लक्ष्मण राम पार्की युवा हैं और वह बताते हैं कि इस काम में हमारे गांव के बड़े-बुजुर्गो के जो हालात रहे हैं वह आजादी के इतने लंबे अतंराल भी बदले नहीं है। आज भी हमारे गांव में रोड तक नहीं है फिर हम कैसे उम्मीद करें कि हमारे बच्चों का जीवन बेहतर होगा। गांव के विकास के लिए सड़क का होना बहुत जरूरी है। विकास की पहली शर्त ही सड़क है। सड़क होगी तो हम शहरों में आसानी आ जा सकते हैं और अपने सामान को खुद बेच सकते हैं। कक्षा 5 के बाद मैंने पढ़ाई छोड़ दी थी क्योंकि घर की आर्थिक हालात ठीक नहीं थी। पढ़ाई में मेरी रूचि थी पर घर के हालात इतने खराब थे कि मुझे स्कूल की पढ़ाई छोड़नी पड़ी और इस काम में लग गया।

'मैंने वर्ष 2010 में रिंगाल के काम कि ट्रेनिंग ली थी जिसमें हमें 300 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से राजिया भी दिया गया और मुझे वर्ष 2016 में 4 महीने के लिए उद्योग विभाग द्वारा ट्रेनर के तौर पर रखा भी गया। जिसके लिए मुझे प्रतिमाह 25 हजार रुपये मिले। इस काम ने मेरी आर्थिक स्थिति को बदला। इस बीच मुझे विभाग के द्वारा देहरादून व दिल्ली जाने का मौका मिला उसका खर्चा विभाग ने ही उठाया। लेकिन अब स्थिति पहले जैसी ही हो गयी है। सरकार हमें यदि रिंगाल के काम के लिए सहायता प्रदान करेगी तो हमारी आर्थिक स्थिति जरूर बदलेगी। वकील देवेन्द्र जी ने हमें नये-नये डिजाईन बताये हैं ताकि हम उनकी बना सकें और मैंने बनाये भी हैं लेकिन समस्या यह है कि इस उत्पाद को हम बेचे कहाँ? गांव घर वाले इन फैंसी आइटम को खरीदते नहीं हैं क्योकि उनके पास इतना पैसा नहीं है कि व इन उत्पादों को खरीद सकें।'


वही प्रहलाद राम लोहिया जिनकी उम्र 48 साल है बताते हैं कि मैं 15 साल से इस रिंगाल के काम से जुड़ा हूं। 2018 में मैंने रिंगाल के काम की ट्रेनिग ली इसके बाद ही मैं कुछ आधुनिक डिजाईनों को बना रहा हूं। इस काम से मुझे इतनी कमाई नहीं होती है की में परिवार चला सकू इसलिए मैं और कुछ काम भी करता हूं। इस काम में मेहनत बहुत ज्यादा है लेकिन पैसा बहुत कम। मुझे सरकारी मदद के तौर पर टेनिग के दौरान 60 दिन का 11500 रू. मिला और साथ ही टूलबाक्स।

हालांकि सरकार की तरफ से रिंगाल के काम को बढ़ावा देने के लिए 500000 रूपये तक की राशि दी जाती है जिसमें अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के लिए 35 प्रतिशत सब्सीडी रहती है। लेकिन तब भी लोगों का जीवन इस रोजगार से खुशहाल नहीं हो पा रहा है।

सरकार ने कास्तकारों को कुटीर उद्योगो से रोजगार व लाभ पहुचाने के लिए कई योजनाओं को लागू किया है जिसके तहत कास्तकारों को ट्रेनिंग भी दी जी रही है और टूल किट्स भी उपलब्ध कराये जा रहे है साथ ही कुछ मानदेय भी दिया जा रहा है। यह पहल तो अच्छी है परन्तु इस पहल से 100 में से 5 प्रतिशत ही लोग लाभांवित हो रहे हैं। सरकारी योजनाएं तो आती है लेकिन इसका ज्यादा फायदा चापलूस लोग ही उठाते हैं।

देवेन्द्र कहते हैं कि सरकार को केवल ट्रेनिंग देने भर से व टूल बाक्स बांट देने से इन लोगों की कमाई में कोई इजाफा नहीं होगा। सरकार जब भी कास्तकारों के लिए कोई योजना बनाती है तो उसमें कास्तकारों की राय जरूर ली जानी चाहिए। सरकार की इन योजनाओं के तरीके से ऐसा लगता है कि मानो सरकार केवल सरकारी पैसों को ही खपाना चाहती है ना कि कास्तकारों की कमाई में इजाफा करना चाहती है। क्योंकि मैने देखा है कि एक ही व्यक्ति हर बार ट्रेनिंग करा रहा है और एक ही व्यक्ति हर बार ट्रेनिंग ले रहा है। इससे अन्य कास्तकारों को कोई लाभ नहीं हो रहा है। कम से कम ट्रेनिंग लेने वाले तो हर बार नये होने चाहिये जिससे सभी को लाभ मिल सके।

इस गांव से जो 20 लोग रोजगार करने बाहर गये थे वो कोरोना के लाकडाउन की वजह से गांव में आ गये हैं। इसमें से 5 को छोड़कर लगभग सभी रिंगाल के काम में लग गए हैं। और जो बच्चे पढ़ने भी बाहर गये थे वो भी इस काम में लग गए है। वो लोग मजबूरी में ही यह काम कर रहे हैं। अगर इस काम में वो इतना कमा पाते कि अपने परिवार का पेट अच्छी तरह से पाल सकते तो निश्चय ही 7-8 हजार की नौकरी के लिए बाहर नहीं जाते। लॉकडाउन के समय अगर फ्री सरकारी अनाज नहीं मिलता तो न जाने गांव की स्थिति क्या होती। अब आगे इन काश्तकारों का क्या होगा शायद ये भी नहीं जानते हैं।

राज्य सरकार को कोई नयी योजना खोलने की जरूरत नहीं है बल्कि जो योजनाएं धरातल पर हैं उन्हीं को अगर ईमानदारी से लागू करे तो निश्चत ही इन युवाओं को रोजगार मिलेगा और आने वाले समय ये और भी उत्साहित होकर रचनात्मक तरिके से इसे करते हुए आगे बढ़ेगे जिसमें सरकार की कमाई भी होगी, और देश-दुनिया में हमारे राज्य की एक पहचान भी बनेगी।

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