Bombay High Court : अनाथ शब्द कलंक नहीं, न ही इसे बदलने की जरूरत, PIL खारिज

बिना किसी सबूत के पति को 'शराबी' या 'औरतबाज' जैसे शब्दों से बदनाम करना क्रूरता - बॉम्बे हाई कोर्ट
Bombay High Court : बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक गैर सरकारी संगठन स्वनाथ फाउंडेशन द्वारा अनाथ ( Orphan ) शब्द बदलने को लेकर दायर जनहित याचिका ( PIL ) को खारिज करते हुए कहा कि इस शब्द के साथ कोई सामाजिक कलंक नहीं जुड़ा है। न ही बदले जाने की कोई जरूरत नहीं है। इसी के साथ हाईकोर्ट ने 15 जुलाई को दिए अपने फैसले में कहा कि सरकारी रिकॉर्ड में अनाथ शब्द की जगह स्वनाथ या सेल्फमेड करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी।
जस्टिस दिपंकर दत्ता और जस्टिस माधव जामदार की बेंच ने कहा कि कोर्ट को लक्ष्मण रेखा के लिए जीवित होना चाहिए, जिसमें रहकर उन्हें काम करना चाहिए। कोर्ट ने इस बात पर हैरानी जाहिर की कि क्या इस शब्द से कोई कलंक जुड़ा है। अदालत Bombay High Court ने याचिकाकर्ता को नाम बदलने के बजाय अन्य उपायों को अपनाने का सुझाव दिया।
अनाथ से स्वनाथ करने का कोई औचित्य नहीं
बॉम्बे हाईकोर्ट Bombay High Court की बेंच ने कहा कि उन्हें इस याचिका पर विचार करने का कोई औचित्य नहीं दिखाई देता हैं यह अंग्रेजी शब्द ऑर्फन का मराठी, हिंदी और बंगाली पर्यायवाची शब्द अनाथ है। अनाथ शब्द का इस्तेमाल सदियों से होता आ रहा है। इतना ही नहीं ऑर्फनेज को अनाथाश्रम कहा जाता है। इसमें गलत क्या है।
याचिका मोटिवेटेड है
हाईकोर्ट की बेंच ने याचिका को मोटिवेटेड पाया। याचिकाकर्ता से कहा कि चूंकि आपकी संस्था का नाम स्वनाथ है, इसलिए आप चाहते हैं कि अनाथ के बदले लोग स्वनाथ कहें। स्वनाथ फाउंडेशन के एडवोकेट उदय वरुंजीकर ने कहा कि अनाथ शब्द बच्चे की कमजोरियों को दर्शाता है और उनकी गरिमा पर चोट पहुंचाता है। इसका अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार है। अनाथ शब्द एक जरूरतमंद, असहाय और वंचित को दर्शाता है। हालांकि, स्वनाथ शब्द आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी है।
हमें भी लक्ष्मण रेखा के दायरे में काम करना होता है
इसके जवाब में बेंच ने यह युगों से चलता आया है। सार्वभौमिक रूप से स्वीकृत है। सामाजिक कलंक क्या है, नाम बदलने से मदद नहीं मिलती। यह नाम केवल एक कैटेगरी के वर्णन के लिए है। हम कानून नहीं बनाते हैं और न ही इस तरह से परमादेश जारी कर सकते हैं। अदालत ने याची से कहा कि उस लक्ष्मण रेखा से अवगत होना चाहिए जिसके भीतर रहकर हमें कार्य करना चाहिए। यह ऐसा मामला नहीं है जहां कोर्ट खुद लक्ष्मण रेखा की अंतिम पंक्ति तक धकेल दे।











