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Kerala High Court तलाक पर SC के फैसले से असहमत, कहा - मुस्लिमों को 1 से ज्यादा शादी करने और तलाक देने से रोकना गलत

Janjwar Desk
25 Aug 2022 8:11 AM IST
Kerala High Court तलाक पर SC के फैसले से असहमत, कहा - मुस्लिमों को 1 से ज्यादा शादी करने और तलाक देने से रोकना गलत
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file photo

केरल हाईकोर्ट ( Kerala High Court ) ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 25 किसी भी शख्स को अपने धर्म की मान्यता के हिसाब से काम करने की इजाजत देता है।

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ( Supreme court ) ने पांच साल पहले तीन तलाक को गैरकानूनी करार देते हुए बैन लगा दिया था, लेकिन केरल हाईकोर्ट ( Kerala High Court ) ने इस मसले पर अब अलग रुख अपनाया है। केरल हाईकोर्ट ने ताजा फैसले में कहा कि अदालत न तो किसी मुस्लिम शख्स को तलाक ( Talaq ) देने से रोक सकती है और न ही 1 से ज्यादा शादी करने से। मुस्लिम पर्सनल लॉ उन्हें ऐसा करने की इजाजत देता है। कोर्ट उनके निजी मामलों में तब तक दखल नहीं दे सकती जब तक कि उसके सामने कोई दूसरा व्यक्ति इस तरह के मामले को चुनौती न दे।

केरल हाईकोर्ट ( Kerala High Court ) ने यह फैसला अवरुदीन बनाम सबीना केस में सुनवाई के बाद दिया है। हालांकि, केरल हाईकोर्ट ने पीड़ित महिला को तलाक ( Divorce ) के खिलाफ अदालत में याचिका दाखिल करने की इजाजत भी दी है, जो कि अपने आप में विरोधभासी है।

अदालत को नहीं है हस्तक्षेप का अधिकार

दरअसल, केरल हाईकोर्ट ( Kerala High Court ) के जस्टिस ए मुहम्मद मुश्ताक और सोफी थॉमस की बेंच ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 25 किसी भी शख्स को अपने धर्म की मान्यता के हिसाब से काम करने की इजाजत देता है। अगर अदालत के किसी आदेश से इसका उल्लंघन होता है तो ये संविधान की अवज्ञा होगी। हाईकोर्ट का कहना है कि इस तरह के मामलों में कोर्ट का अधिकार क्षेत्र सीमित है। फैमिली कोर्ट भी किसी शख्स को उसके पर्सनल लॉ के हिसाब से काम करने से नहीं रोक सकती। ऐसा कुछ भी करना पूरी तरह से गलत होगा।

फैमिली कोर्ट के आदेश पर रोक

इससे पहले फैमिली कोर्ट ने एक व्यक्ति को अपनी पत्नी को तलाक ( Divorce ) देने से रोका था। निचली अदालत ने शख्स की पत्नी की याचिका को भी स्वीकार करते हुए उसे दूसरी शादी करने से भी रोकने को लेकर आदेश दिया था। इसके उलट हाईकोर्ट ने कहा कि मुस्लिम शख्स ने जो कुछ भी किया वो अपने पर्सनल लॉ के हिसाब से किया। यानि डबल बेंच ने फैमिली कोर्ट के आदेश को खारिज कर दिया। दूसरी तरफ डबल बेंच का कहना था कि पीड़ित महिला अपनी व्यथा को लेकर याचिका दाखिल कर सकती है।

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