गवर्नेंस

Supreme court ने केंद्र से पूछा : आप ही बताएं मैरिटल रेप क्राइम है या नहीं

Janjwar Desk
17 Sep 2022 4:55 AM GMT
Motor Accident Claim : मृतक की संपत्ति और व्यवसाय मिलने के बाद भी आश्रित आय के नुक्सान के लिए मुआवजे के हकदार हैं - सुप्रीम कोर्ट
x

Motor Accident Claim : मृतक की संपत्ति और व्यवसाय मिलने के बाद भी आश्रित आय के नुक्सान के लिए मुआवजे के हकदार हैं - सुप्रीम कोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा गठित दो जजों की बेंच में मैरिटल रेप ( Marital rape ) अपराध है या नहीं, विषय पर आम राय नहीं बन पाने के कारण यह समला अब सुप्रीम कोर्ट ( Supreme Court ) में विचाराधीन है।

नई दिल्ली। मैरिटल रेप ( marital rape ) क्राइम है या नहीं, यह एक बहस का मुद्दा है। दिल्ली हाईकोर्ट में जजों के बीच इस मसले पर आम राय नहीं बन पाई। एक जज ने माना अपराध तो दूसरे से ऐसा मानने से किया इनकार। इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट ( Supreme Court ) के पास पहुंचा। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस मसले पर 16 सितंबर को सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार ( Central Government ) को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। साथ ही शीर्ष अदालत ने ये भी कहा कि इस मसले पर अगली सुनवाई फरवरी 2023 में होगी।

दरअसल, देश में मैरिटल रेप ( marital rape ) को अपराध मानने की मांग लंबे समय से जारी है। इस मसले में अभी तक आम राय नहीं बन पाई है। यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट ( Supreme Court ) के पास विचाराधीन है। इस मामले में 11 मई को दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान शादी में बलात्कार को गैरकानूनी करार देने की याचिका पर दो जजों की बेंच में आम राय नहीं बन पाई थी। जहां एक जस्टिस ने कहा कि बिना अपनी पत्नी की सहमति के ज़बरदस्ती संबंध बनाना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है तो वहीं दूसरे जस्टिस इस फैसले से सहमत नहीं दिखे। यही वजह है कि याचिकाकर्ता ने सर्वोच्च न्यायालय का रूख किया था। अब सुप्रीम अदालत ने केंद्र सरकार से इस मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट करने को कहा है।

ये है पूरा मामला

भारत में मैरिटल रेप ( marital rape ) अभी तक कानून की नज़र में अपराध नहीं है। आईपीसी की किसी धारा में न तो इसकी परिभाषा है और न ही इसके लिए किसी तरह की सजा का प्रावधान है। दिल्ली हाईकोर्ट में इस मामले में दायर की गई याचिकाओं में धारा 375 के अपवाद 2 की संवैधानिकता को मनमाना, अनुचित और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 का उल्लंघन बताते हुए चुनौती दी गई थी। अब तक इस संबंध में कई अलग-अलग याचिकाएं दाखिल हो चुकी हैं।

2015 में गैर सरकारी संगठन आरटीआई फाउंडेशनए ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक वीमेन्स एसोसिएशन तथा दो महिला और पुरुषों ने दिल्ली हाईकोर्ट में इस मसले को लेकर याचिका दायर की थी। दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र और दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया था। 2016 में केंद्र ने एक हलफनामा दायर किया जिसमें कहा गया था कि मैरिटल रेप को अपराध नहीं बनाया जा सकता। इसका भारतीय समाज पर गलत प्रभाव पड़ेगा। उसके बाद से यह मसला अदालत में पेंडिग रहा। दिसंबर 2021 में सुनवाई फिर से शुरू हुई, जिसके बाद 11 मई 2022 को दिल्ली हाईकोर्ट की बेंच ने खंडित फैसला सुनाया जिसमें दोनों जजों की अलग.अलग राय सामने आई।

दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस राजीव शकधर ने वैवाहिक बलात्कार को अपराध कहते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के अपवाद 2 को असंवैधानिक बताया। जस्टिस शकधर का कहना था कि पत्नी की सहमति के बिना ज़बरदस्ती संबंध बनाना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। दूसरी तरफ जस्टिस सी हरिशंकर ने कहा कि वो इस मामले में जस्टिस शकधर के फैसले से सहमत नहीं दिखे और उन्होंने धारा 376बी और 198बी की वैधता को बरकरार रखने की बात कही थी।

Next Story

विविध