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विमर्श

अखिल भारतीय न्यायिक सेवाओं का गठन करने से क्यों डरती रही है सरकार

Nirmal kant
30 May 2020 1:04 PM GMT
अखिल भारतीय न्यायिक सेवाओं का गठन करने से क्यों डरती रही है सरकार
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अखिल भारतीय न्यायिक सेवाओं के न होने के कारण भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16 के सामाजिक न्याय के उपबंधों का भी ठीक से पालन नहीं हो पाता है, जिसके कारण भी उच्च न्यायपालिका की संविधान सम्मत संरचना और गठन में बहुत बड़ी बाधा बनती है...

इलाहाबाद हाईकोर्ट के वकील राकेश कुमार गुप्त का विश्लेषण

जनज्वार। जैसा कि सर्वविदित है 26 जनवरी सन 1950 को ‘हम भारत के लोग’ ने अंतिम संप्रभु की हैसियत से भारतीय संविधान को स्वयं को ही आत्मार्पित करते हुए लागू कर दिया। हमारे देश में भारत के संविधान की सर्वोच्चता स्वयं सिद्ध है। लोकतंत्र के तीनों स्तंभ विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका इसी से अपनी शक्ति, ऊर्जा एवं दिशा प्राप्त करते हैं।

लोकतंत्र की सभी संस्थाएं और सभी व्यक्ति न सिर्फ संविधान के निर्देशों के अनुरूप कार्य करने के लिए बाध्य हैं बल्कि वह सभी इसके लिए वचनबद्ध भी हैं। भारत के संविधान के अनुच्छेद 312 में सिर्फ तीन ‘अखिल भारतीय सेवाओं’ का जिक्र किया गया है, जिनमें सर्वप्रथम ‘अखिल भारतीय न्यायिक सेवा’ ही है। उसके उपरांत ‘भारतीय प्रशासनिक सेवा’ एवं ‘भारतीय पुलिस सेवा’ का जिक्र अनुच्छेद 312 के उप अनुच्छेद 2 में किया गया है।

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स समय तक भारत सरकार के द्वारा भारतीय प्रशासनिक सेवा एवं भारतीय पुलिस सेवा के अलावा अन्य अनेक अखिल भारतीय सेवाओं का गठन किया जा चुका है, परंतु आज तक अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का गठन नहीं किया गया। क्या यह भारतीय संविधान के निर्देशों की अवहेलना नहीं है?

किसी भी लोकतांत्रिक देश की मजबूती में एक स्वतंत्र, सक्षम एवं निष्पक्ष न्यायपालिका का होना अति आवश्यक होता है। स्वतंत्र एवं सक्षम एवं निष्पक्ष न्यायपालिका हमेशा देश के लोकतांत्रिक हितों के अनुरूप ही कार्य करती है। एक प्रकार से स्वतंत्र, सक्षम एवं निष्पक्ष न्यायपालिका किसी भी देश के लोकतंत्र की रीढ़ की हड्डी के समान होती है।

खिल भारतीय न्यायिक सेवाओं का गठन न होने के कारण क्षेत्रीय और प्रादेशिक स्तर पर ही अधीनस्थ न्यायपालिका की पूरी संरचना की जाती है जिसके कारण स्थानीय दबाव ज्यादे होते हैं और कई बार तो वह मूल रूप से सामंती और जातीय शक्तियों से प्रभावित और अनुप्राणित होती है जिसके कारण न्यायपालिका समग्रतः भारत के ‘संविधान सम्मत लोकतांत्रिक विचार’ के साथ खड़ी नहीं हो पाती है।

ही नहीं उच्च न्यायपालिका के भी गठन का एक बड़ा स्रोत इसी अधीनस्थ न्यायपालिका में होता है और इसी कारण उच्च न्यायपालिका भी उसी अनुपात में संविधान की संगतता में नहीं हो पाती है जिस अनुपात में अधीनस्थ न्यायपालिका संविधान की संगति में नहीं होती है।

इसके साथ ही एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि अखिल भारतीय न्यायिक सेवाओं के न होने के कारण भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16 के सामाजिक न्याय के उपबंधों का भी ठीक से पालन नहीं हो पाता है जिसके कारण भी उच्च न्यायपालिका की संविधान सम्मत संरचना और गठन में बहुत बड़ी बाधा बनती है।

जैसाकि सर्वविदित है लॉ कमीशन ऑफ इंडिया (भारत के विधि आयोग) ने अपनी 116वीं रिपोर्ट में ‘अखिल भारतीय न्यायिक सेवा’ (AIJS) के गठन की सिफारिश की थी जिसे कि सचिवों की समिति के द्वारा नवंबर 2012 में स्वीकृत कर दिया गया था और एक ‘अखिल भारतीय न्यायिक सेवा’ (AIJS) के गठन पर सर्वसम्मति से अपनी सहमति दी थी लेकिन तत्समय मुख्य न्यायमूर्तिओं के सम्मेलन में उस पर सहमति नहीं बन पाई थी इसेलिए वह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ पाया।

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म सभी जानते हैं कि भारत की उच्च एवं सर्वोच्च न्यायपालिका में केवल कुछ परिवारों, कुछ जातियों और सामंती एवं औपनिवेशिक तत्वों का ही बोलबाला है और वे अपने उस वर्चस्व को नहीं छोड़ना चाहते हैं। क्या इसीलिए भारत की न्यायपालिका संविधान के निर्देशों की अवहेलना करने वाली सबसे बड़ी संस्था नहीं बन चुकी है ?

क्या अब इस बात पर गंभीरता से विचार किये जाने की जरुरत नहीं है कि कैसे लोकतंत्र और शासन सत्ता का लाभ सबसे निचले स्तर पर पहुंचाया जाए और लोकतंत्र को सर्वव्यापी बनाया जाए ? क्या भारत में ‘अखिल भारतीय न्यायिक सेवा’ (AIJS) का इस दिशा में एक सार्थक प्रयास नहीं साबित होगा?

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