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जनज्वार विशेष

गांधी जी की विरासत के साथ विश्वासघात

Prema Negi
2 Oct 2019 9:16 AM GMT
गांधी जी की विरासत के साथ विश्वासघात
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गांधी जी की 150वीं जयंती पर विशेष

गांधी जी के पोते ने लिखा कई हजार कश्मीरी या तो कैद में हैं या फिर नजरबन्द, इसमें बड़ी संख्या में युवा भी हैं। अनेक कश्मीरी देश के दूसरे हिस्से की जेलों में भी बंद हैं। कुछ ही शवों की तस्वीरें आयीं हैं, मगर भारत सरकार लगातार यह दावा कर रही है कि सबकुछ सामान्य है और कश्मीरियों ने इस कदम का किया है स्वागत...

महेंद्र पाण्डेय का विश्लेषण

न दिनों कश्मीर के बारे में कश्मीर को छोड़कर हरेक जगह चर्चा की जा रही है। कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया गया, पर कश्मीर को छोड़कर पूरे देश और दुनिया को बताया जा रहा है कि ऐसा क्यों किया गया। दूसरी तरफ देश और दुनिया को लगातार बताया जा रहा है कि कश्मीर में सबकुछ सामान्य है, कहीं कोई पाबंदी नहीं है, पर आश्चर्य यह है कि कश्मीरियों को यह नहीं पता।

श्मीर की स्थिति पर दुनियाभर के बुद्धिजीवी अपनी चिंता जता चुके हैं। हाल में जब बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन ने प्रधानमंत्री मोदी को स्वच्छता के लिए पुरस्कार दिया था तब भी कश्मीर में मानवाधिकार हनन का मुद्दा उठाकर लाखों बुद्धिजीवियों ने मोदी जी को पुरस्कार नहीं देने का अनुरोध किया था।

मेरिका के प्रतिष्ठित साप्ताहिक समाचारपत्र न्यूज़वीक में राजमोहन गांधी और सलमान अहमद ने संयुक्त तौर पर एक लेख लिखा है, 'मोदी द्वारा गांधी की विरासत से विश्वासघात – पर कश्मीरी शांतिपूर्ण विरोध से इसे सुधार सकते हैं।' राजमोहन गांधी, गांधी जी के पौत्र और सी राजगोपालाचारी के नाती हैं, इतिहासकार हैं और वर्तमान में अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ़ इलेनोईस में रिसर्च प्रोफ़ेसर हैं। सलमान अहमद अमेरिका में बसे चिकित्सक हैं और पल्स पोलियो के ब्रैंड एम्बेसेडर हैं। पर, दुनियाभर में इनकी ख्याति लोकप्रिय म्यूजिकल बैंड “जुनून” के संस्थापक के तौर पर है।

राजमोहन गांधी और सलमान अहमद ने लिखा है, “आज का कश्मीर कैद है और दुनिया से पूरी तरह कटा भी, पर मई 2008 में एक दिन ऐसा नहीं था जब नैसर्गिक डल झील के किनारे “जूनून” बैंड ने अपना कार्यक्रम किया था। कश्मीर से होते हुए यह बैंड लाहौर, कोलकाता, न्यू यॉर्क और टोरंटो तक गया और हरेक जगह एकता, आजादी और प्यार की भाषा मिली।

2008 के उस दिन गिटार की धुनों ने बंदूकों को खामोश कर दिया था। वर्ष 1947 से चले आ रहे कश्मीर के संघर्ष में एक नया मोड़ 5 अगस्त को आया जब भारत सरकार ने अचानक, संभवतः गैर-संवैधानिक तरीके से और निश्चित तौर पर लोकतांत्रिक परंपरा के विपरीत कश्मीर के विशेष दर्जा को हटा दिया। अनुच्छेद 370, जिससे कश्मीर को विशेष दर्जा मिलता था और जिसके तहत कश्मीर के लोकप्रिय नेता केंद्र में मंत्री भी बने, को एकाएक ख़त्म करने के पहले एक भी कश्मीरी से कोई मशवरा नहीं किया गया। यह विशेष दर्जा गैर-कश्मीरियों को कश्मीर में जायदाद खरीदने की इजाजत नहीं देता था और ना ही इन्हें मतदान का अधिकार देता था। देश के अकेले मुस्लिम-बहुल राज्य में अनुच्छेद 370 के कारण ही जनसंख्या में व्यापक बदलाव कभी नहीं आया।”

“रातोंरात कश्मीर से केवल विशेष दर्जा ही नहीं छीना गया, बल्कि भारत के नक़्शे से जम्मू और कश्मीर राज्य को ही हटा दिया गया और इसके बदले दो केंद्रशासित प्रदेश आ गए। इसकी सीमा के बाद ही पिछले 70 वर्षों से पाकिस्तान के अधीन रहे कश्मीर का हिस्सा है। लगातार इन्टरनेट और मोबाइल के उपयोग पर पाबंदी के साथ ही संयुक्त राष्ट्र के किसी दल या दूसरे देशों के पत्रकारों पर भारत सरकार की पाबंदी का सीधा अर्थ है कि पूरी दुनिया लगभग एक करोड़ 30 लाख कश्मीरियों के हालात से अनजान है।

नुमान है कि कई हजार कश्मीरी या तो कैद में हैं या फिर नजरबन्द हैं। इसमें बड़ी संख्या में युवा भी हैं। अनेक कश्मीरी देश के दूसरे हिस्से की जेलों में भी बंद हैं। कुछ ही शवों की तस्वीरें आयीं हैं इसलिए भारत सरकार लगातार यह दावा कर रही है कि सबकुछ सामान्य है और कश्मीरियों ने इस कदम का स्वागत किया है। हम सरकार से मांग करते हैं कि कश्मीर में अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों और पत्रकारों को जाने की अनुमति दी जाए जिससे दुनिया यह जान सके कि वहां के हालात कैसे हैं।”

“कश्मीर को तो खामोश कर दिया गया, पर देश के दूसरे हिस्सों से इस कदम के विरूद्ध आवाज उठ रही है, पर इस कदम के समर्थकों की संख्या अधिक है इसलिए विरोध की आवाज को दबाना आसान है। यह एक कड़वा सत्य है, जिसे कश्मीरियों को स्वीकार करना पड़ेगा। अपने आप को जनतंत्र कहने वाला भारत महात्मा गांधी की 150वीं जयन्ती मना रहा है और इनके चित्र अपनी मुद्रा पर प्रकाशित करता है। इसी आयोजन के बीच लाखों कश्मीरियों का विशेष दर्जा समाप्त कर सरकार और उसके समर्थक अति-उत्साहित हैं।

ब्रिटिश राज में तीस वर्ष से लम्बे समय तक आजादी के लिए अहिंसक आन्दोलन की अगुवाई करने वाले महात्मा गांधी ने विचारों और विश्वास की आजादी के लिए भी संघर्ष किया था। महात्मा गांधी के लिए सामने वाले की भाषा, वर्ण, सम्प्रदाय या धर्म का कोई महत्त्व नहीं था और यही एक बड़ा कारण था जिसके चलते वर्ष 1948 में हिन्दू अतिवादियों ने उनकी ह्त्या की।”

“14 अगस्त को “द गांधियन फ्रेटरनिटी” के तत्वावधान में अनेक प्रबुद्ध भारतीयों ने कश्मीर की स्थिति पर कदा विरोध प्रदर्शित किया था। पर ये आवाजें सरकार और उसके समर्थकों की आवाजों में दब जाती हैं। अगस्त में पूरे कश्मीर को कैद करने से पहले हजारों भारतीय सैनिकों को कश्मीर में भेजा गया। भारत सरकार कोई आंकड़ा नहीं देती, पर अनुमान है कि कश्मीर में इस समय सेना और अर्धसैनिक बालों के 5 लाख से भी अधिक जवान तैनात हैं। सरकार कहती है कि यह सब आतंकवाद और विद्रोह से निपटने के लिए किया गया है। वर्तमान में दुनिया के किसी भी क्षेत्र की तुलना में जनता के अनुपात में कश्मीर में सुरक्षा बालों की संख्या सर्वाधिक है।”

“हम भारत-पाकिस्तान उपमहाद्वीप की जनता और सरकार से अनुरोध करते हैं कि इस समस्या के समाधान के लिए जनतांत्रिक और शांतिपूर्ण पहल करें और साथ ही अमेरिका की जनता और सरकार से भी आग्रह करते हैं कि ऐसी समस्या की अनदेखी ना करें। एक ऐसे दौर में जब अमेरिका समेत लगभग सभी देशों में लोकलुभावन, संकीर्ण छद्म राष्ट्रवादी और बहुसंख्यकों की सरकारें हैं, परमाणु बम वाले देशों भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव खतरनाक है। इस समय भारत में सरकार हिन्दू कट्टरपंथियों की है जिनकी नजर में मुस्लिम, क्रिश्चियन और दूसरे अल्पसंख्यक निकृष्ट और देशद्रोही हैं जिन्हें किसी संरक्षण की जरूरत नहीं है।”

“कश्मीरियों से हमें सहानभूति है पर उन्हें अपनी आवाज उठाने के लिए महात्मा गांधी और डॉ मार्टिन लूथर किंग (जूनियर) के रास्ते को अपनाना चाहिए। गुस्से और हिंसा की तुलना में भारत सरकार से अहिंसक असहयोग ज्यादा अच्छा और प्रभावी विकल्प हो सकता है।”

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