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विमर्श

क्या दो पंखों के बगैर, केवल दाएं से या केवल बाएं से, उड़ना संभव है?

Nirmal kant
30 May 2020 9:32 AM GMT
क्या दो पंखों के बगैर, केवल दाएं से या केवल बाएं से, उड़ना संभव है?
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वैज्ञानिकता के साथ यही दिक्कत है। उसे जब लगता है कि मामला दृष्टि का है, उस वक्त मामला दरअसल पंख का होता है। उसे आप यह अहसास दिलाने चलें कि नहीं, तुम्हारा निष्कर्ष गलत है, तो वह अपने निष्कर्ष को उन्हीं विधियों से दोबारा पुष्ट कर लेगी लेकिन अपनी प्रविधि पर आंच नहीं आने देगी....

पढ़िये वरिष्ठ पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव का साप्ताहिक कॉलम ‘कातते-बीनते’

क बार कुछ वैज्ञानिक प्रयोगशाला में एक पक्षी पर रिसर्च कर रहे थे। उनकी जिज्ञासा के केंद्र में यह सवाल था कि पक्षी उड़ते कैसे हैं। उन्होंने धीरे-धीरे कर के एक तरफ से उसके पंख नोचना शुरू किया। हर बार कुछ पंख नोच के वैज्ञानिक चिल्लाते, 'चिड़िया उड़'! चिड़िया हर बार उड़ती, लेकिन हर अगली बार उसकी उड़ान कम होती जाती। पंख नोचते-नोचते एक स्थिति ऐसी आ गयी जब एक ओर के पंख सफ़ा हो गये और दूसरी ओर के बच गये (इसमें से किसी को भी आप दायां या बायां हिस्सा मान लें, प्रयोग पर फ़र्क नहीं पड़ेगा)। एक ओर से पंख साफ़ होने के बाद भी पक्षी ने अथक कोशिश की और उठान भरी। वह थोड़ा हिला-डुला ही होगा, गुलटिया खाया होगा, लेकिन उड़ न सका।

चिड़िया उड़ नहीं पायी थी, लेकिन उसकी उठान कायम थी। विज्ञान कहता है कि दूरी आपने चाहे कितनी ही नापी हो, विस्थापन नहीं हुआ तो काम शून्य है। विस्थापन बुनियादी चीज़ है, वेक्टर है। दिशा को दिखाता है। पक्षी अभी तक अपने मूल से विस्थापित हो रहा था। लिहाजा, वैज्ञानिकों की जिज्ञासा अभी शांत नहीं हुई थी और दूसरी ओर के पंख नोचने की प्रक्रिया चालू रही। इसी बीच प्रयोगशाला के प्रभारी गुरु का दिमाग कौंधा।

सने टीम से कहा- 'ज़रा इसकी आंखें फोड़ कर तो देखो, क्या होता है'। गुरुमुखी शिष्यों ने वैसा ही किया। आंख फोड़ने तक सारे पंख एक-एक कर के खत्म हो चुके थे। फिर सब ने समवेत् स्वर में कहा, "चिड़िया उड़"! चिड़िया को नहीं उड़ना था, सो नहीं उड़ी। हिली-डुली भी नहीं। गुरु वैज्ञानिक के भीतर सदियों से चिपटी आर्किमिडीज़ की रूह ने जोर से दहाड़ा, 'यूरेका यूरेका'!गुरुमुखी शिष्यों ने निष्कर्ष निकाला कि चिड़िया की आंख फोड़ दो तो वह उड़ना भूल जाती है।

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वैज्ञानिकता के साथ यही दिक्कत है। उसे जब लगता है कि मामला दृष्टि का है, उस वक्त मामला दरअसल पंख का होता है। उसे आप यह अहसास दिलाने चलें कि नहीं, तुम्हारा निष्कर्ष गलत है, तो वह अपने निष्कर्ष को उन्हीं विधियों से दोबारा पुष्ट कर लेगी लेकिन अपनी प्रविधि पर आंच नहीं आने देगी। विज्ञान के नाम पर यह दरअसल विज्ञानवाद है, एक किस्म की रूढ़ि है, जिसे पिछली डेढ़ सदी में विज्ञान ने आत्मसात कर लिया है। तर्कशक्ति के नाम पर दरअसल यह अपनी पूर्व-धारणा को ही पुष्ट करने की थेथरई है, जिसने रेशनलिटी का भट्ठा बैठा दिया है। समाज विज्ञान की कुछ मोनोलिथिक (एकाश्म) धाराएं इसी विज्ञानवाद की रूढ़ि में आनंद लेती हैं और पक्षी को उड़ने के लिए मुक्त करने के नाम पर उसे पिंजरे में कैद कर के मार देती हैं।

जिस उदारवाद ने विज्ञान को इतनी सहूलियत दी कि उसने चिड़िया की तर्ज़ पर हवाई जहाज बना लिया, उसी उदारवाद के पिता जॉन लॉक की बात को विज्ञान ने तीन सौ साल में भुला दिया। जॉन लॉक ने कहा थाः 'मैं चाहे जो भी लिखूं, मुझे जैसे ही पता लगेगा कि वह सत्य नहीं है, उसे आग में फेंक देने की सबसे पहली कार्रवाईखुद मेरे हाथ करेंगे।'

प्राप्त सच को अनुभव से परखना, भोगे हुए की सान पर कसना, थोड़ा मुश्किल तो है लेकिन इतना भी नहीं कि थियरी 2020 में पहुंच जाये और प्रयोग साठ के दशक की प्रयोगशालाओं में चूहे मारता फिरे। यह संकट केवल विज्ञान के साथ नहीं, सामाजिक विज्ञान के साथ भी घटा है। विचारधाराएं, स्थापनाएं, धारणाएं, निष्कर्ष, विश्लेषण, सब कुछ बहुत आगे जा चुके हैं लेकिन ज़मीनी अनुभव से उन्हें अभिपुष्ट करना आज तक बाकी है।

सी अंतर का नतीजा है कि दुनिया भर के समाज धीरे-धीरे उसी बात में भरोसा करने लगे हैं जिसे वे प्रत्यक्ष देख पाते हैं। उसमें नहीं जो दिखता ही नहीं, भविष्य के किसी कोने में अजन्मा है। दरअसल, इस समाज ने जिन्हें प्रयोग करने का जिम्मा सौंपा था, उन्होंने गलत तरीके से गलत प्रयोग किये। लिहाजा, लोग खुद प्रयोग करने लगे और यह दुनिया लोकप्रियतावादी भस्मासुरों के चंगुल में फंस गयी।

हीं पर याद आते हैं राजे बाबू। रजत कपूर की फिल्म 'आंखों देखी' में संजय मिश्रा ने राजे बाबू उर्फ बाऊजी का खूबसूरत किरदार निभाया है। एक दिन एक निजी घटना के बहाने बाऊजी को ज्ञान होता है कि प्रत्यक्ष इंद्रियजन्य अनुभव सबसे प्राथमिक चीज़ है। अब से वे वो ही बात मानेंगे जिसका खुद अनुभव करेंगे। अगले दिन से उनकी जिंदगी दूभर हो जाती है। नौकरी चली जाती है। परिवार टूट जाता है। गली-मोहल्ले के लोग उन्हें पागल समझने लगते हैं।

राजे बाबू अपने संकल्प पर अड़िग रहते हैं। वे पचास साल की उम्र तक एक आम आदमी की तरह जीते रहे। अब अचानक एक नॉन-बिलीवर बन गये। फिर कुछ दिन के लिए उन्होंने मौन धारण कर लिया। फिर एक दिन प्रयोगवश वे तीन पत्ती खेलने लगे। उसी से कमाये पैसे से बिटिया की शादी की, उसकी ही पसंद से। बोझ थोड़ा हलका हुआ, तो 28 साल के वैवाहिक जीवन में तीसरी बार अपनी धर्मपत्नी को लेकर पहाड़ पर घूमने निकल गये।

क पगडंडी पर चलते हुए बाऊजी ने पत्नी से कहा कि वे बहुत हलका महसूस कर रहे हैं। 'मैं हमेशा सपने में देखता था कि मैं उड़ रहा हूं। आज मुझे ऐसा ही लग रहा है। जैसे मैं हवा में पक्षी की तरह उड़ रहा हूं'! यह सुनते ही पत्नी बेतरह हंसने लगी। बाऊजी ने कहा, 'सच, मैं मजाक नहीं कर रहा।' पत्नी ने उनके इद्रियानुभववाद पर चुटकी लेते हुए कहा, 'आप तो कहते हैं कि आप वही मानते हैं जो खुद अनुभव किया हो। आपको कैसे पता चला कि उड़ना क्या होता है। फिर कैसे आप कह सकते हैं कि आप उड़ रहे हैं?'

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राजे बाबू चुप हो जाते हैं। आधी रात चुपके से वे कोट पहन कर निकल लेते हैं। एक पहाड़ी के मुहाने पर जाकर थोड़ी देर स्थिर खड़े रहते हैं, कुछ सोचते हैं, फिर पक्षियों की तरह दोनों हाथ फैलाकर गहरी घाटी में छलांग मार देते हैं। छलांग के बाद कुछ देर तक तो वे चिल्लाते हैं। गोया गुरुत्वाकर्षण से मुक्त होकर गिरे जा रहे हों। फिर उन्हें चेतना आती है। अपने परों को वे तौलते हैं। थोड़ा नियंत्रण पाते हैं। फिर वे उड़ने लग जाते हैं। हवा में तैरने लग जाते हैं।

सोचिए, राजे बाबू ऐसा कैसे कर पाये?

न्होंने एक पंख पर आधी जिंदगी काट दी। फिर दूसरे पंख से बाकी जिंदगी। जिस दिन वे कूदे, उनके पास दोनों पंख थे। धारणा भी थी, प्रत्यक्ष अनुभव भी था। सिद्धान्त भी था, व्यवहार भी। दुनियादारी भी थी, दर्शन भी था। आस्था भी, तो अनास्था भी थी। वे मरने से पहले चिड़िया बन गये थे। मुक्ताकाश में दोनों पर तौल रहे थे। दायां भी, बायां भी। और उनकी आंखें बंद थीं। उन्हें दृष्टि की ज़रूरत अब नहीं रह गयी थी।

ब वापस प्रयोगशाला पर लौटते हैं। उसके वैज्ञानिक विचारों व निष्कर्षों पर दोबारा सोच कर खुद से एक सवाल पूछिए, कि क्या उड़ने के लिए केवल दृष्टि चाहिए, पंख नहीं? और क्या दो पंखों के बगैर, यानी केवल एक ओर के पंख से, केवल दायें से या बायें से, उड़ना संभव है?

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