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राजनीति

बंदूकें पूरे आवाम पर तन जायें तो भी कश्मीरी हमेशा के लिए चुप नहीं रहेंगे

Prema Negi
5 Sep 2019 3:31 AM GMT
बंदूकें पूरे आवाम पर तन जायें तो भी कश्मीरी हमेशा के लिए चुप नहीं रहेंगे
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कश्मीर में 370 हटने के बाद पुलवामा में आम सहमति है कि नई दिल्ली के कदम ने उन कश्मीरियों को अलग-थलग कर दिया है जिनका भारत के प्रति झुकाव था, न कि उन लोगों को जो भारत से आज़ादी चाहते थे

पुलवामा के अशांत क्षेत्र के निवासी चार सप्ताह से भी ज्यादा समय से बंद हैं, लेकिन वे चाहते हैं कि दुनिया को पता चले कि वह प्रतिरोध करेंगे...

सौम्या शंकर की रिपोर्ट

पुलवामा, जम्मू और कश्मीर - फरवरी में, एक आत्मघाती हमलावर ने कश्मीर के पुलवामा शहर में सेना के एक काफ़िले को विस्फोट से उड़ाया था, जिसमें 40 से अधिक सैन्यकर्मी मारे गए थे। उस हमले ने - जिसपर भारत का आरोप है कि सीमा पार के पाकिस्तानी आतंकवादियों ने किया था - दो परमाणु-सशस्त्र देशों को युद्ध के कगार पर ला दिया था। यह तनाव बाद के महीनों में कुछ घट गया था, लेकिन 5 अगस्त को एक बार फिर हालात ख़राब होने की संभावना दिखाई दी, जब नई दिल्ली ने एकतरफा तौर पर भारतीय-प्रशासित जम्मू और कश्मीर की स्वायत्तता को रद्द करने की घोषणा की - एक ऐसा क़दम जिससे ‌इस मुस्लिम-बहुल क्षेत्र में नस्लीय-संहार की शुरुआत हो सकती है।

16 अगस्त को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने कई दशकों में पहली बार कश्मीर पर चर्चा की। जहाँ एक तरफ इस क्षेत्र का भविष्य वाशिंगटन, लंदन, माॅस्को, बीजिंग और पेरिस - सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों की राजधानियां- में बहस का विषय रहा, उसी दौरान कश्मीरी आवाज़ों को व्यापक रूप से 5 अगस्त के बाद सुरक्षा घेरों और सभी संचार माध्यमों पर प्रतिबंदों के तहत, खामोश कर दिया गया हैं। इस क्षेत्र से बाहर आई कुछ वीडियो रिपोर्टों को नई दिल्ली द्वारा "मनगढ़ंत" कहकर खारिज कर दिया गया था, जैसे कि श्रीनगर में हज़ारों प्रर्दशनकारियों पर पुलिस द्वारा आंसू गैस से हमला किए जाने की बीबीसी की फुटेज।

संचार को बंद करने के अलावा, कश्मीर घाटी से अंदर-बाहर होने वाली सूचनाओं को रोकने के लिए, नई दिल्ली ने मुख्यधारा और अलगाववादी दोनों तरह के राजनेताओं, नागरिक समाज के सदस्यों, वकीलों और व्यवसायियों की सामूहिक गिरफ्तारी की है। लेकिन भारत सरकार बार-बार कह रही है कि राज्य में कानून और व्यवस्था का कोई संकट नहीं है। मैंने ज़मीन पर स्थिति का पता लगाने के लिए पुलवामा के उस तनावग्रस्त क्षेत्र की यात्रा की।

पुलवामा की अर्थव्यवस्था का मुख़्य आधार इसके विशाल सेब के बाग हैं, जो अपने राजमार्ग के चारों ओर जहां तक नज़र जाएं वहां तक फैले हुए दिखते हैं। अगस्त का महीना बागों में काम करने का प्रमुख मौसम है, और सरकार द्वारा लगाए गए कर्फ्यू भी पुलवामा के निवासियों को उनके खेतों से दूर नहीं रख पाए।

मैं भारत के स्वतंत्रता दिवस से एक दिन पहले 14 अगस्त को उस भारी सैन्यीकृत शहर में पहुँची थी, इसलिए स्थानीय लोगों को रिपोर्टर से बात करने को तैयार करने में कुछ समय लगा। एक विशाल निगरानी जेट के शोर के बीच, एक सुनसान गली के पीछे, दो 20 वर्षीय लड़कों ने मुझे बताया कि कैसे उनके दोस्त, मुदसिर हामिद दर को पुलिस ने एक सप्ताह पहले आधी रात के छापे में उठाया था।

परिगाम इलाके में सेना द्वारा छापे में तोड़ी गई खिड़कियाँ और सहर के घर के फर्श पर गोलियों के निशान

न दोनों लड़कों को पुलिस ने कहा था कि अगर वे चुप नहीं रहे तो उनका भी वही हाल होगा। दर मेडिकल के छात्र हैं, जो भारत के अभिजात मेडिकल स्कूलों में प्रवेश के लिए आवश्यक राष्ट्रीय स्तर की 'निट' परीक्षा की तैयारी कर रहा था।

र के दोस्तों में से एक ने कहा, "मुझे अपनी ज़िंदगी के लिए डर है, लेकिन जब आपके अपने लोगों पर बात आती है, तो इंसान सब कुछ दांव पर लगाने के लिए मजबूर हो जाता हैं।" उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र के अधिकांश नौजवानों को पुलिस ने पिछले दो वर्षों में कम से कम एक बार हिरासत में लिया है, क्योंकि वे इलाके में लंबे समय से चल रहे सैनिक मौजूदगी के चलते विरोध जताने के लिए सेना के जवानों पर पत्थर फेंकते थे।

“निर्दोष लड़कों को जब उठाया जाता है और आधारहीन संदेह पर उन पर अत्याचार और टॉर्चर किया जाता है, तो वे प्रतिक्रिया में मिलिटेंसी में शामिल हो जाते हैं। फिर राज्य द्वारा उनको आतंकवादी घोषित करके उनकी हत्या कर दी जाती है," युवा कश्मीरियों में से एक ने बताया।

दूसरे मित्र ने कहा, "अनुच्छेद 370 का रद्द करना गुंडा राज है।" "इन दिनों वे जिसको मर्ज़ी जब चाहें गिरफ्तार कर रहे हैं," मैकेनिकल इंजीनियर बनने की तैयारी कर रहे एक लड़के ने कहा। “धीरे-धीरे, वे कश्मीर के सभी लड़कों को मार देंगे। वे हमें मारना चाहते हैं और हमारी ज़मीन चाहते हैं।”

लोचकों का तर्क है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कश्मीर के विशेष दर्जे को एकतरफा रूप से बदलने का निर्णय - जो उनकी हिंदू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी के लिए एक महत्वपूर्ण चुनाव-अभियान मुद्दा रहा है - जम्मू-कश्मीर राज्य के महत्व को घटाता हैं, और इस सीधे नई दिल्ली के नियंत्रण में ले आता है। गैर-कश्मीरी भारतीय अब राज्य में ज़मीन खरीद सकते हैं, जिससे लोगों के मन में यह डर स्वाभाविक रूप से आ गया है कि क्षेत्र में हिंदू लोगों के बसाए जाने का और मुस्लिम-बहुल राज्य की जनसांख्यिकी को बदलने का प्रयास किया जाएगा।

मुख्य शहर से कुछ मील की दूरी में प्रमुख राजमार्ग पर पुलवामा जेल स्थित है, जहाँ अधिकांश युवा बंदियों को रखा गया हैं। 5 अगस्त की सुबह से, हर दिन‌ अपने लापता बेटों के बारे में पूछताछ करते हुए माता-पिता की भीड़ यहां देखी जा सकती है।

कुछ मीटर की दूरी पर, स्थानीय लोगों के एक समूह से बात हुई। उन्होंने कहा कि कर्फ्यू के तहत ज़िन्दगी बहुत मुश्किल हो गई हैं। 40 साल के मीर वसीम ने कहा, ''भारतीय मीडिया बताता है कि हम सब शांत हैं, हमसे पूछे बिना ही कि हम कैसा महसूस कर रहे हैं।"

पुलवामा के इस इलाके में आम सहमति यह है कि नई दिल्ली के कदम ने उन कश्मीरियों को अलग-थलग कर दिया है जिनका भारत के प्रति झुकाव था, न कि उन लोगों को जो भारत से आज़ादी चाहते थे।

सीम ने कहा, "एक मिलिटेंट जो पहले ही बंदूक उठा चुका है, उसे इस स्थिति में बदलाव से कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा।"

"आप भारत, पाकिस्तान, संयुक्त राज्य अमेरिका, या अफ़ग़ानिस्तान तक का झंडा फहरा सकते हैं, यह सब उसके लिए कोई मायने नहीं रखता, क्योंकि उसे आज़ादी से कम कुछ नहीं चाहिएं। अनुच्छेद 370 के हनन की परवाह करने वाले वही लोग है जो वास्तव में भारतीय संविधान में विश्वास करते हैं - वे जो मानते थे कि वे भारत का हिस्सा हैं।”

सीम की राय उसी बात की पुष्टि कर रही थी जिसे मैंने घाटी के कई अन्य लोगों से सुना था। अनुच्छेद 370 को एकतरफा तरीके से निरस्त करके, भारत ने उस खेमे को भी किनारे पर धकेल दिया जो कश्मीरी राज्यत्व और पहचान के विषय में नई दिल्ली की ओर झुकाव रखते थे।

राजधानी श्रीनगर के विपरीत, जहां 5 अगस्त से कई बड़े विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, कश्मीर के इस हिस्से में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन नहीं हुए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि छापों और गिरफ्तारी के डर ने इस हलचल-भरे क्षेत्र को फटने से रोक रखा है। सवाल यह है कि कश्मीरियों के गुस्से को कब तक समाहित किया जा सकता है। वसीम ने कहा, "(जब तक) अड़चनें हैं, पुलवामा में कोई विरोध प्रदर्शन नहीं होगा।" "यह सोडा की बोतल की तरह है: आपने ढक्कन को कस दिया है और बोतल को हिला दिया है।" दूसरे शब्दों में, प्रतिबंधों में ढिलाई होने के बाद लोगों का गुस्सा फट के बाहर आ सकता हैं।

रीमाबाद पुलवामा में एक छोटा उपग्राम है, जो कश्मीर के सबसे विद्रोही गांवों में से एक रहा हैं। अलगाववादी भावना हमेशा इस इलाके में मज़बूत रही हैं। 2011 की राज्य की जनगणना के अनुसार, करीमाबाद में सिर्फ 3,565 निवासी हैं।

गाँव के कब्रिस्तान को इलाके में "शहीदों का कब्रिस्तान" के नाम से जाना जाता है, जहां 'कश्मीर की आज़ादी' की लड़ाई में मारे गए लोगों को दफ़नाया गया है। इस जगह को एक पवित्र स्थल की तरह माना जाता है। कुछ ही मीटर की दूरी पर संकरी, घुमावदार गलियों वाली एक ईंट और चूने की बस्ती है। यहाँ, 8 अगस्त को रात 3:15 बजे, 26 वर्षीय निलोफर और उसकी माँ रुबीना की नींद सुरक्षा बलों के जूतों की आवाज़ से खुली, जो उनके दो-मंज़िला घर की दीवारों को लांघकर नीलोफर के 19 साल के भाई सहर को उठा कर ले गए। हमने उनकी पहचान की सुरक्षा के लिए उनके उपनामों को गुप्त रखा है।

सहर के परिजन उसकी तस्वीर दिखाते हुए, जिसे 14 अगस्त के छापे में उठा लिए गया

निलोफ़र ने कहा, "जब वे हमारे बरामदे तक पहुँचे, तो उन्होंने ज़ोर से हमारा दरवाज़ा खटखटाया, हमें धमकाया और मेरी माँ से पूछा कि सहर कहाँ है?" माँ ने बताया कि वो अंदर सोया हुआ है। हंगामा सुनकर सहर डर के बिस्तर से उठ गया था। गार्डों ने फिर उसे उसके बालों से पकड़ा और घसीटते हुए घर से बाहर ले गए।

"मैं उन्हें बताती रही, मेरा भाई निर्दोष है, उसने कभी बंदूक नहीं पकड़ी है," निलोफर ने कहा। जाते जाते सुरक्षा बलों ने दो गोलियां चलाई, उसने बताया और बरामदे के फर्श से एक लाल रंग की कालीन हटाकर मुझे गोलियों के निशान दिखाएं। संभावित विरोध प्रदर्शनों को रोकने के लिए उस रात कई अन्य स्थानीय युवकों को भी करीमाबाद से उठाया गया था।

हर गांव में वेल्डर के रूप में काम करता था। नीलोफर अब करीमाबाद में युवा पुरुषों और महिलाओं के लिए कोई भविष्य नहीं देखती है। "मोदी ने हमारा भविष्य बर्बाद कर दिया है", उसने कहा। “हम हर दिन अपने जीवन और सुरक्षा के लिए डरते हैं। क्या मोदी वास्तव में मानते हैं कि वह कश्मीरियों पर शासन कर सकते हैं? हम ऐसा कभी नहीं होने देंगे। हम लड़ते रहेंगे। (जैसे) हमारे भाइयों ने शहादत हासिल की है, हम कश्मीर की लड़कियां भी अपनी जान दे देंगी।"

सोसिएटेड प्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, संकट के दौरान कश्मीर घाटी में कम से कम 2300 लोगों, ज़्यादातर युवा पुरुषों को हिरासत में लिया गया है। नई दिल्ली की एक राजनीतिक कार्यकर्ता और कश्मीर में स्थिति का आकलन करने गई एक टीम की सदस्य रहीं कविता कृष्णन ने राज्य भर में बड़े पैमाने पर गिरफ्तारी की पुष्टि की।

कृष्णन ने कहा, "हमारे पास गिरफ्तारियों की संख्या नहीं है, क्योंकि अधिकांश कैदियों को आधिकारिक हिरासत में नहीं रखा जा रहा है - उनको सेना शिविरों और पुलिस थानों में रखा जा रहा है।" और इस राज्य के इतिहास के कारण, कश्मीरियों की सामूहिक स्मृति बहुत मज़बूत है जिसमें इस तरह उठाए गए नौजवान कभी घर लौटकर नहीं आए - यह एक डर है जो घाटी में अब फिर से सुलगाया गया है।

पुलवामा के पुलिस उपाधीक्षक फारूक अहमद ने कहा कि उनकी टीमें प्रोटोकॉल का पालन कर रही थीं : “स्थिति पूरी तरह से शांतिपूर्ण है। हिंसा की कोई घटना सामने नहीं आई है।... हम हमेशा की तरह लोगों को समझा रहे हैं- इसमें कुछ खास नहीं है। हम लोगों को पहले भी पथराव के आरोप में गिरफ्तार किया करते थे। यह बिल्कुल सामान्य है।”

परिगाम के निवासी पर छापे के दौरान सैनिक यातना के निशान (सभी तस्वीरें फॉरिन पॉलिसी की पत्रकार सौम्या शंकर)

कुछ मील दूर परिगाम नामक इलाका श्रीनगर और दक्षिणी कश्मीर के मैदानी इलाकों के बीच बसा हुआ है। करीमाबाद के विपरीत, परिगाम पिछले 10 वर्षों में काफी हद तक शांत हैं। इस भाग में मिलिटेंट बहुत कम देखने को मिलते हैं।

लेकिन कश्मीर की स्वायत्तता के निरस्त होने के ठीक एक दिन बाद, 6 अगस्त को, सुरक्षा बल परिगाम के निवासियों पर टूट पड़ें। परिगाम निवासियों का कहना है कि अधिकारी उनके घरों से युवकों को घसीट कर बाहर ले गए और परिवारों को घर के अंदर रहने की चेतावनी दी। वहां के एक निवासी ने कहा, "सेना ने हमें 'जय हिंद' और 'वंदे मातरम' बोलने के लिए मजबूर किया।" "जब पुरुषों में से एक ने इसके बजाए 'इस्लामी कलमा' सुनाया, तो सेना ने उनसे सड़क की गंदगी चटवायी।"

ता चला है कि उस रात यातना के लिए इस्तेमाल किए गए उपकरणों में केबल, रॉड और प्लंबिंग के पाइप शामिल थे। एक युवा बढ़ई से मैंने बात की जो बैसाखी के बिना चलने में असमर्थ था। उसके पीठ और पैरों पर टॉर्चर (यातनाओं) के निशान दिख रहे थे। लेकिन सुरक्षाबलों ने कहा: "हमने तुम्हें नहीं मारा, है ना?" गांव वालों ने एकजुट होकर कहा, "नहीं साहब, आपने नहीं मारा।"

(23 अगस्त 2019 को 'फॉरिन पॉलिसी' में छपे सौम्या शंकर की इस रिपोर्ट का अनुवाद 'कश्मीर खबर' के लिए बिदिशा ने किया है।)

मूल रिपोर्ट- Kashmiris Won’t Stay Silent Forever

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