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विमर्श

लोकतंत्र के इस महापर्व में है 'लोकतंत्र' मात्र एक तिहाई

Prema Negi
29 April 2019 4:53 AM GMT
लोकतंत्र के इस महापर्व में है लोकतंत्र मात्र एक तिहाई
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जब तक जनता को विधायिका की तरह कार्यपालिका और न्यायपालिका के चुनाव का अधिकार नहीं मिल जाता, तब तक लोकतंत्र एक तिहाई मात्र है...

अभिषेक आजाद

आम लोकसभा चुनाव 2019 अपने तीन चरण पूरे कर चुका है। आज 29 अप्रैल को इसके चौथे चरण के लिए मतदान हो रहा है। चुनाव आयोग मतदान में ज्यादा से ज्यादा लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए प्रचार अभियान चला रहा है। लोकतंत्र के इस महापर्व को पूरे देश में बड़ी धूमधाम से मनाया जा रहा है। लोग बढ़—चढ़कर मतदान में हिस्सा ले रहे हैं।

चुनाव के वक्त चुनावी सुधारों की बात स्वाभाविक है, किन्तु चुनाव सुधारों को लेकर होने वाली बहसों का दायरा अक्सर बहुत सीमित होता है। ये चर्चाएँ अक्सर आदर्श चुनाव संहिता के पालन, चुनाव का निरपराधीकरण, चुनाव में पैसे के प्रभाव को कम करना, अनिवार्य मतदान, स्वतंत्र और निष्पक्ष मतदान आदि तक सीमित होती है। चुनाव सुधारों की इस बहस को और आगे बढ़ाकर इसके दायरे को विस्तृत किया जा सकता है।

राज्य के तीन अंग होते हैं विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका। विधायिका जिसे हम संसद के नाम से जानते हैं, इसका काम पूरे देश के लिए कानून बनाना है। कार्यपालिका का काम संसद द्वारा बनाये कानून को लागू करना है। कार्यपालिका के एक बड़े भाग नौकरशाही से हम अपनी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में मुखातिब होते हैं। न्यायपालिका का काम कानून की व्याख्या करना और उसके आधार पर केस का फैसला करना है।

वर्तमान व्यवस्था के अंतर्गत हम केवल विधायिका के सदस्यों का चुनाव करते हैं। राज्य के शेष दो अंगों कार्यपालिका और न्यायपालिका का कोई चुनाव नहीं होता। राज्य का मात्र एक तिहाई भाग का निर्वाचित होता है। हम अपने सांसद का चुनाव कर सकते हैं, किन्तु हमें पुलिस अधीक्षक, मजिस्ट्रेट या जज चुनने का अधिकार नहीं है। वर्तमान लोकतंत्र का महापर्व मात्र एक तिहाई लोकतंत्र का पर्व है।

लोकतंत्र को यथार्थ और वास्तविक स्वरूप प्रदान करने के लिए राज्य के सभी अंगों का निर्वाचित होना आवश्यक है। जब तक जनता को विधायिका की तरह कार्यपालिका और न्यायपालिका के चुनाव का अधिकार नहीं मिल जाता, तब तक लोकतंत्र एक तिहाई मात्र है।

जनता को अपने सांसद की तरह अपना पुलिस अधीक्षक, मजिस्ट्रेट और जज चुनने का भी अधिकार होना चाहिए। कई देशों में जनता को न सिर्फ विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के सदस्यों को चुनने, अपितु उन्हें वापस बुलाने का भी अधिकार प्राप्त रहा है।

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