संस्कृति

मनोज कुमार पांडेय की कहानी 'तितलियां'

Prema Negi
31 March 2019 3:38 PM GMT
मनोज कुमार पांडेय की कहानी तितलियां
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कुछ साल पहले ज्ञानोदय में प्रकाशित 'पानी' कहानी से हिंदी कथा जगत में ध्यान खींचने के बाद मनोज कुमार पाण्डेय एक प्रतिभाशाली कहानीकार के रूप में उभरे हैं। उनके तीन कथा संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं और कई सम्मान भी मिले हैं। उनसे हिंदी कहानी को काफी उम्मीदें हैं। वे फिलहाल महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्विद्यालय में कार्यरत हैं। वे अपने जबरदस्त कथ्य और सुगठित शिल्प से पाठकों को हर बार चकित करते हैं। यहां प्रस्तुत है उनकी चर्चित कहानी 'तितलियां' जिसमें एक फंतासी के साथ यथार्थ का कलात्मक मेल है। यह एक जेबकतरे की दिलचस्प कहानी है, जिसे लेखक ने अपनी शैली और प्रयोग से और दिलचस्प बना दिया है। आइए पढ़ते हैं मनोज कुमार पाण्डेय की कहानी 'तितलियां' —विमल कुमार, वरिष्ठ पत्रकार और कवि

तितलियां

मनोज कुमार पांडेय

उसे याद नहीं है कि उसने पहली पर्स कब उड़ाई था और कब उसका यह हुनर उसकी हाथ की रेखाओं में शामिल हो गया था। सबकुछ इतना अनायास होता कि कई बार तो उसे भी पता न चलता कि कब उसकी आस्तीन से एक तेज ब्लेड नीचे उतरी कब वह उसकी हथेली में जाकर चिपक गई और कब नीचे सरकी। यह सब इतनी तेजी से घटता कि संभव ही नहीं था कि उसके शिकार को खबर लगे कि सतर्क हो जा प्यारे तेरी जेब कटनेवाली है। पर्स हाथ में आने के बाद वह पर्स से मुक्त होने में जरा भी देर नहीं लगाता। रुपए उसकी अपनी जेब में पहुँच जाते और अभी थोड़ी देर पहले उड़ाई हुई पर्स कहीं पड़ी धूल खा रही होती। वह एक बार भी पकड़ा नहीं गया था।

एक बार उसने अपने इस फन को विस्तार देना चाहा। उसने अपने नाखून के नाप की ब्लेडें बनाईंजो नाखून में छुपी रहें और वहीं से अपना काम करें। ब्लेडें शानदार बनीं। उसकी उँगलियों को देखकर कोई नहीं जान सकता था कि यह पतली पतली खूबसूरत उँगलियाँ तेज नश्तर में बदल चुकी हैं। वह अपनी इस नई कलाकारी पर बहुत खुश हुआ, पर बाकायदा कई दिनों के अभ्यास के बाद जब वह अपनी इन खतरनाक उँगलियों के साथ भीड़ में उतरा तो न जाने कैसे अपना वह आत्मविश्वास खो बैठा, जिसकी उसके भीतर पहले कभी कमी नहीं रही थी। ऊपर से कोढ़ में खाज वाली बात यह हुई कि उसे खुजली होने लगी। अपना ही शरीर खुजलाते हुए उसने कई जगह काट लिया। शरीर में जगह जगह पर उभरती खून की बूँदों के बीच वह घर लौट आया।

उस दिन के बाद से उसने ब्लेड से तौबा कर ली। वह अपने को कलाकार मानता था। उसने अपने आप से शर्त बदी कि वह यही काम बिना किसी ब्लेड के कर दिखाएगा। अगले कई दिनों तक उसने अपने आप को दाँव पर लगा दिया। इस बीच हवा के हल्के झोंकों की तरह उसके मन में यह बात कई बार आई कि वह फिर से ब्लेड पकड़ ले। ब्लेड आस्तीन से सरकते हुए हथेली में और हथेली से उँगलियों के बीच जिस तरह से आती थी वह कम कलात्मक नहीं था। रह रहकर ब्लेड उसकी आँखों में चमक उठती। उसे लगता कई बार कि जब इतने अच्छे तरीके से ब्लेड के साथ काम चल रहा था तो उसे बेवजह अपने से ही शर्त बदने की क्या जरूरत थी। पर अब तो शर्त बदी जा चुकी थी। शर्त का उसके अलावा कोई गवाह नहीं था, पर वह अपनी गवाही पर कायम था।

बीच में मुश्किलें आईं। कई बार उसकी हिम्मत टूटी। कई बार पकड़े जाते हुए बचा। इस सबके बावजूद वह अपनी जिद पर कायम रहा। उसके सारे पैसे समाप्त हो गए। भूखे प्यासे रहने की नौबत आ गई पर वह अपने सूखे ओठों के साथ डटा रहा। और आखिरकार वह कामयाब रहा। जिस दिन वह धावे पर निकला, उसने कुल आठ पर्सें उड़ाईं। जब पहली पर्स के लिए उसने हाथ बढ़ाया तो उसके हाथ काँप रहे थे। आठवीं तक आते आते उसके हाथों में अपने आप प्रकट हो जाने वाला कंपन गायब हो गया। वह बहुत खुश था। उसकी जिद जीत गई थी। उसने अपने आप को शाबाशी दी कि अब वह पूरा कलाकार हो चुका था। अपने काम में सिद्धहस्त। उसने तय किया कि आज शाम वह अपने आपको पार्टी देगा।

इसके पहले उसके साथ एक छोटी सी घटना घटी। जब वह आठवीं पर्स के रुपए निकाल कर उसे ठिकाने लगाने ही जा रहा था कि पर्स में से एक आठ-दस साल की बच्ची की तस्वीर नीचे जा गिरी। उसने न जाने क्या सोचते हुए तस्वीर उठा ली। बच्ची बहुत प्यारी लग रही थी और अपनी बड़ी—बड़ी आँखों से उसकी तरफ देख रही थी। पहली बार उसने अपने शिकार के बारे में सोचा। यह बच्ची उसकी क्या लगती होगी? और तभी अनायास ही उसके मन में यह ख्याल उभरा कि वह इस उम्र में कैसा दिखता रहा होगा। वह कुछ देर तक बच्ची का चेहरा देखता रहा। फिर न जाने क्या सोचकर तस्वीर को अपनी पर्स में रख लिया।

घर जाते हुए उसने शराब की एक बोतल खरीदी। एक दोस्त को शाम का न्यौता दिया। रास्ते में खाना पैक कराया और अपने कमरे पर पहुँच गया। वह कमरे में अकेला ही रहता था। उसका घर इस कमरे से बहुत दूर था जिसे वह बहुत पहले छोड़ आया था। वह अक्सर घर के बारे में सोचता पर उसे कुछ भी नहीं याद आता। अब वह घर के सपने देखता है। ऐसा सपना जिसमें किसी स्मृति का साझापन नहीं है, इसलिए यह सपना बिखर बिखर जाता है। यह उसी बिखरे हुए सपने में रहता है जिसके लिए यह एक कमरे की जगह भी कई बार ज्यादा पड़ती है।

घर आकर जब उसने अपनी कमाई गिननी शुरू की तो एक बार फिर से उसकी निगाह उस बच्ची की तसवीर पर अटक गई। वह थोड़ी देर तक उसे देखता रहा फिर उसने वह तसवीर दीवाल पर चिपके हुए एक पोस्टर पर चिपका दी। तसवीर की लड़की खुश होकर मुस्कराने लगी। अचानक उसे लगा कि उसका कमरा उस बच्ची की मुस्कराहट के लिए छोटा है। उसे और बड़ा कमरा लेना चाहिए। इस बात पर वह मुस्कराया और दोस्त के स्वागत के लिए तैयार होने लगा। उसने कपड़े बदले, मुँह धोया, चखना वगैरह बढ़िया तरीके से तैयार किया। उसे पता है कि उसका दोस्त शराब के मामले में बहुत ही लालची और बेसलीका है।

उस दिन दोस्त के जाने के बाद वह कब सो गया, उसे पता ही नहीं चला। सुबह उठा तो सिर भारी भारी सा लग रहा था। उसे याद आया कि रात में उसने तस्वीर वाली लड़की से बात की थी। वह उसे देखकर मुस्करा रही थी। तब उसने लड़की का नाम पूछा था। लड़की ने बताया कि उसका नाम तितली है। उसके पापा उसे यही कहते हैं और यह कहकर वह तितली में बदल गई थी और देर तक कमरे में उड़ती रही थी। यह सब याद आते ही वह मुस्कराया। यह चीजें सच में कैसे संभव हो सकती हैं। जरूर उसने सपना देखा होगा। यह सोचते हुए उसने दीवार पर चिपकी लड़की की तसवीर की तरफ देखा और हाथ हिलाते हुए मुस्कराया। उसे लगा कि जवाब में लड़की भी मुस्कराई है।

वह तैयार हुआ और काम पर निकल गया। जब लौटा तो उसके पास करीब दस जेबों से उड़ाए हुए पैसे थे और साथ में एक खूबसूरत जवान लड़की की तस्वीर थी। इसे भी उसने पहली वाली तस्वीर के बगल में चिपका दिया। जवान लड़की उसे बहुत खूबसूरत लगी। जेबकतरे ने आह भरी और सोचा कि काश उसके पास एक प्रेमिका होती। इसी तस्वीर वाली जवान लड़की की तरह खूबसूरत और दिलफरेब। वह मुस्कराया और उसने तय किया कि वह कोशिश करेगा कि उसके पास भी ऐसी ही एक प्रेमिका हो। इसके बाद वह अपने काम में लग गया। वह शराब पीते हुए अपने लिए भोजन बनाने लगा। अंडा करी और चावल। अंडा करी स्वादिष्ट बनी थी। एक गुनगुने नशे के बीच उसने अंडा करी और चावल खाया और थोड़ी देर बाद सो गया।

अगले दिन सुबह उसने अपने को तरोताजा पाया, पर तुरंत ही उसे यह भी याद आया कि आज रात उसने तस्वीर वाली जवान लड़की से बात की थी। उसे याद आया कि छोटी लड़की और जवान लड़की आपस में बतिया रही थीं। तब उसने जवान लड़की से उसका नाम पूछा था। जवान लड़की ने उसे इठलाते हुए बताया था कि उसका नाम तितली है। उसका प्रेमी उसे यही कहता है। यह सुनते ही छोटी लड़की हँसने लगी थी। इसके बाद दोनों लड़कियाँ एक साथ तितलियों में बदल गई थीं और देर तक कमरे में उड़ती रही थीं।

वह मुस्कराया। एक ही सपना बस थोड़े से अंतर के साथ। बस यह कि पहला सपना भी दूसरे सपने में शामिल हो गया था। वह मुस्कराया और अचानक उसने पाया कि अब वह कमरे में अकेला नहीं है। यहाँ उसके साथ दो लड़कियाँ भी हैं। एक छोटी सी प्यारी बच्ची और दूसरी खूबसूरत जवान लड़की। वे दोनों इस हद तक उसके साथ हैं कि उसके सपनों में भी शामिल हैं। इस एहसास ने उसके व्यवहार को पूरी तरह से बदल दिया। इस सुबह जब वह नहाकर बाथरूम से निकला तो तौलिया लपेटे हुआ था। इसके पहले वह अमूमन नंगा ही कमरे में आ जाया करता था और पंखे के नीचे खड़े होकर बदन का पानी सुखाया करता था।

इसी तरह वह लगातार अपने काम पर निकलता रहा और कुछ रुपयों के साथ रोज एक तस्वीर लेकर आता रहा। इस बीच वह इस बात पर चकित भी होता रहा कि रोज उसे एक ही तस्वीर कैसे मिल पाती है। यह भी तो हो सकता है कि किसी दिन उसे एक भी तस्वीर न मिले। या फिर किसी दिन उड़ाई गई पर्सों में से एक से ज्यादा तस्वीरें निकल आएँ। जो भी हो पर इस बीच उसे इस बात पर अपनी कला जितना ही भरोसा हो चुका था कि उसे रोज एक तस्वीर मिलती रहेगी। न इससे ज्यादा न इससे कम। अपने इसी भरोसे की बिना पर उसने एक बार फिर अपने से शर्त बदी कि जिस दिन इसका उलट होगा उस दिन से वह यह काम हमेशा के लिए छोड़ देगा।

उसे यह नहीं पता था कि आगे वह क्या करेगा। पर वह अपने को इसके लिए भी लगातार तैयार कर रहा था कि मान लो किसी दिन वह शर्त हार ही गया तो। तो इसके लिए उसने पैसे बचाने शुरू कर दिए थे। उसके खाते में इस बीच लगातार पैसे जमा हो रहे थे। वह इस बात के प्रति सतर्क था कि किसी दिन उसे अचानक से यह काम बंद कर देना पड़े तो उसके पास नया काम शुरू करने या ढूँढ़ने का पर्याप्त समय हो। इस बीच में उसे पैसे की तंगी या अन्य किसी वजह से अपनी शर्त तोड़ने के लिए बाध्य न होना पड़े।

इस सबके बावजूद यह बातें उसकी समझ से परे थीं। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि हर नई तस्वीर उसके सपने में कैसे शामिल होती जा रही थी। हर नए सपने में पुरानी तस्वीरें उसे एक साथ इकट्ठा और आपस में बातें करती दिखाई देतीं। तस्वीरें अपना परिवार बना रही थीं। वे आपस में प्रेम और झगड़े कर रही थीं। अपने सुख दुख साझा कर रही थीं। वे हमेशा साथ रहतीं। इतना ही नहीं वे हर नई तस्वीर को पूरी मुहब्बत के साथ अपनातीं। यह अविश्वसनीय था। ऐसे ही यह भी पूरी तरह से अविश्वसनीय था कि उसके सपने में आने वाली हर तसवीर अपना नाम तितली बता रही थी। उन सबके पास ऐसे लोग थे जिन्होंने उन्हें यह नाम दे रखा था। और उन तस्वीरों ने एक मुहब्बत भरी जिद के साथ यह नाम अपना लिया था।

ऐसे ही एक दिन जेबकतरे ने पाया कि उसके घर में तितलियाँ ही तितलियाँ हैं। ये तितलियाँ उसकी अनुपस्थिति में उसके कमरे में चक्कर लगाती रहती हैं। फिर उसे लगता है कि कुछ लोग और हैं जो उसके घर में छुपकर रहते हैं। उन्हें पकड़ने के लिए वह कई बार अचानक से कमरे पर आ धमकता है पर न जाने कैसे उन्हें पता चल जाता है और वे तस्वीरों में लौट जाते हैं। जेबकतरे को उनके हँसने की आवाजें सुनाई पड़ती हैं। और जब तस्वीरों वाले लोग हँसते हैं तो उनकी हँसी से रंग झड़ते हैं। ये रंग उसकी चमड़ी पर जगह जगह चिपक जाते हैं और छुटाए नहीं छूटते। उसके कमरे में, उसके बिस्तर पर, उसके कपड़ों पर तितलियों के पंखों से झरे हुए रंग हैं।

वह बाहर निकलता है तो उसे लगता है कि कुछ लोग हैं जो उसका हमेशा पीछा करते हैं। वह चलता है तो वे चलते हैं, रुकता है तो रुक जाते हैं। अक्सर उसे अपने पीछे तितलियों के उड़ने की आवाज सुनाई देती है। वह परेशान हो जाता है और कमरे पर लौट आता है। ऐसे ही एक दिन अचानक लौटने पर वह एक तितली को तस्वीर में समाने के पहले ही पकड़ लेता है। उसके पकड़ते ही तितली एक जवान लड़की में बदल जाती है। वह लड़की से पूछता है कि कौन हो तुम और मेरे कमरे में क्या कर रही हो? लड़की उसके गालों पर अपने पंख फेरते हुए जवाब देती है कि मैं एक तितली हूँ और तुम्हें भी तितली में बदलने आई हूँ। इस शहर में तितलियाँ वैसे भी बहुत कम हैं। यह कहते हुए वह लड़की उसकी पकड़ से आजाद हो जाती है और तस्वीर में समा जाती है।

जेबकतरा कुछ समझ नहीं पाता। वह पाता है कि उसकी अँगुलियों में रंग लगा हुआ है। ऐसे ही उसकी निगाह सामने आईने में दिख रहे अपने चेहरे पर जाती है। उसने देखा कि उसके गाल नीले रंग की एक पट्टी बन गई है जिसके बीच में पीले और हरे रंग की छींटे हैं। उसने इस पट्टी को हाथों से साफ करना चाहा। तौलिए से रगड़ा, साबुन से धोया पर वह रंगीन पट्टी जस की तस बनी रही। वह डर गया। उसकी ताकत ही यह थी कि वह आम मनुष्यों की तरह दिखता था। अपना काम करके उन्हीं के बीच में गायब हो जाता था। ऐसे तो उसका गायब होना असंभव होता जाएगा। वह तो दूर से ही पहचान लिया जाएगा।

तभी वह पाता है वह इन तस्वीरों के बारे में कुछ ज्यादा ही सोचता रहा है। ठीक इसी क्षण उसे पता चलता है कि इन तस्वीरों में जान उसी ने पैदा की है। उसी ने इन्हें रंग-बिरंगी तितलियों में बदल दिया है। यह बात उसे एक नए तरह से आत्मविश्वास से भर देती है। उसने सोचा कि अगर वह इन तितलियों को पैदा कर सकता है तो मार भी सकता है। उसने तय किया कि वह इन सभी तितलियों को मार देगा। उसने दीवाल में चिपकी हुई सभी तसवीरों को निकाल डाला। उन पर थोड़ी सी शराब डाली और उनमें आग लगा दी। सभी तस्वीरें जलने लगीं। कमरे में धुआँ भर गया। उसे भ्रम हुआ कि तस्वीरें जलते हुए चीख रही हैं। उसने खिड़की खोल दी कि धुएँ के साथ तस्वीरों की चीखें भी कमरे के बाहर निकल जाएँ।

तस्वीरें जला देने के बाद जेबकतरे ने अपने को हल्का और मुक्त महसूस किया। उसके भीतर इस बात की गहरी इच्छा हुई कि वह किसी पार्क में किसी बड़े से पेड़ के नीचे देर तक बैठे। वह बाहर निकल आया। उसके घर के आसपास कोई पार्क नहीं था। वह देर तक पैदल चलता रहा तब जाकर बैठने लायक पार्क में पहुँचा। उसने अपनी चप्पल उतार दी और देर तक नंगे पैर घूमता रहा। नीचे नरम घास थी। उसे अच्छा लग रहा था। फिर उसकी बैठने की इच्छा हुई। वह बैठ गया और थोड़ी देर बाद वह वहीं घास पर लेट गया। जल्दी ही उसकी आँखों में आलस उतर आया। वह देर तक अलसाया हुआ पड़ा रहा।

तभी उसने पाया कि वह लोगों से घिरा हुआ है। लोग मोबाइल से उसकी तस्वीरें उतार रहे हैं। उसकी समझ में कुछ भी नहीं आया। जब तक कि उसकी निगाह अपने आप पर नहीं गई। उसके पूरे शरीर पर तितलियाँ ही तितलियाँ थीं। उसके ऊपर भी तितलियाँ उड़ रही थीं। वह झटके से उठा तो इतनी तितलियाँ उड़ीं कि आसमान में सब तरफ रंग ही रंग बिखर गए। वह तेजी से उठा और खुद को घेरे हुई भीड़ के बीच से रास्ता निकालते हुए बाहर भागा। अचानक उसके दिमाग में खयाल आया कि ये तस्वीरें खींचने वाले वह लोग हैं, जिनकी जेबें उसने काटी हैं। वह तेजी से भागा। उसे लगा कि लोग उसका पीछा कर रहे हैं।

वह देर तक भागता रहा। बहुत देर बाद उसने पलटकर पीछे देखा तो पीछे एक भी आदमी नहीं था। पीछे एक भी तितली नहीं थी। वह हाँफ रहा था। वह दौड़ते हुए थक गया था। वह वहीं बैठ गया और सुस्ताने लगा। तब उसकी निगाह अपने पहनावे पर गई। उस पर रंग ही रंग बिखरे हुए थे। उसने विकल होकर सोचा कि क्या एक दिन सचमुच वह तितली में बदल जाएगा, जैसा कि उस जवान लड़की ने कहा था। क्या एक दिन वह उड़ने भी लगेगा, एक अनजाने भाव के साथ उसने सोचा। उसे उस प्यारी सी बच्ची की शक्ल याद आई जिससे यह सिलसिला शुरू हुआ था। मैंने सारी तस्वीरें जलाकर यह सिलसिला हमेशा के लिए समाप्त कर दिया है, उसने अपने आप से कहा। इसके आगे जो भी है वह सब भ्रम है।

उसने तय किया कि वह आज फिर से अपने दोस्त को बुलाएगा और साथ बैठकर शराब पिएगा। वह दोस्त से कहेगा कि संभव हो तो वह उसके साथ में ही रुक जाय।

दोस्त के अपने लफड़े थे। वह आया तो पर शराब पीकर चलता बना। जेबकतरे को रात भर नींद नहीं आई। उसे रात भर न जाने कैसी कैसी आवाजें सुनाई देती रहीं। फुसफुसाहट की आवाजें, हँसने की आवाजें, कामुक चीखें, बच्चों की किलकारियाँ, बूढ़ों की कराह, नई आवाजें, बहुत पुरानी और फँस फँसकर आती आवाजें। वह रात भर अपने कानों में उँगलियाँ ठूँसे लेटा रहा। रातभर उसे प्यास लगती रही पर उसने पानी की कल कल की आवाजों से काम चलाया। उसके पैरों में इतना जोर नहीं बचा था कि वह उठकर पानी पी सके।

सुबह होते होते सब कुछ शांत हो गया। उसका सिर बोझिल था। रात का नशा उतरने की बजाय पूरे शरीर में बीमार होकर पसरा हुआ था। उसने उठकर गटागट पानी पिया और फिर लेट गया। नींद की एक हल्की सी लहर आई और आकर चली गई। वह दोबारा उठा तो उठकर बाथरूम गया और तब तक नहाता रहा जब तक कि पानी ही नहीं खत्म हो गया। पहले की तरह वह नंगे ही कमरे में आया और देर तक पानी सुखाता रहा।

कपड़े पहनते हुए उसने पुरानी शर्त को संशोधित किया और अपने से एक नई शर्त बदी। उसने अपने आप से कहा कि इस शहर की आखिरी निशानी के बतौर आज वह आखिरी पर्स उड़ाएगा और उसके बाद वह यह काम हमेशा हमेशा के लिए छोड़ देगा। वह उस आखिरी पर्स को फेंकेगा नहीं और उस पर्स के साथ यह शहर हमेशा हमेशा के लिए छोड़ देगा।

रोज की तरह जब वह काम पर निकला तो उसके पैरों में वह पुराना आत्मविश्वास लौट आया था। साथ में वह हल्का सा भावुक हो रहा था कि वह अपना काम हमेशा के लिए छोड़ देने वाला है। न जाने कितनी स्मृतियाँ इस पल उसके साथ थीं। उसकी आँखों में जैसे उसका पूरा जीवन तैर रहा था। वे कितने प्रसंग जिसमें खतरा बस उसे छूकर निकल गया था। वे प्रसंग उसमें भरोसा और ताकत भरते रहे थे। पर उस सबके उलट आज उसने सोचा कि ऐसे किसी मौके पर उसका खेल खत्म हो सकता था। यह सोचते ही वह लड़खड़ाया। उसे लगा कि जैसे नींद का एक झोंका आया और पल भर में गुजर गया।

नींद का यह झोंका दोबारा तब वापस लौटा, जब वह अपने शिकार की जेब में हाथ डाल रहा था। वह अपने शिकार की जेब में हाथ डाले हुए सो गया। जब उसका हाथ पकड़ा गया तब वह सो रहा था। उसके शिकार ने उसे एक झटका दिया। झटके से जब उसकी नींद पल भर के लिए कुनमुनाई तो उसे कुछ खाने की इच्छा हुई। उसे याद आया कि कल शराब पीने के बाद उसने खाना नहीं खाया था। भूख ने उसे जागृत बनाया और वह हाथ छुड़ाकर भागा। जब वह भाग रहा था तो वही हत्यारी नींद फिर से उस पर सवार हो गई। उसी नींद के बीच उसने देखा कि उसका पीछा करने वाला अकेला नहीं है। अब एक पूरा समूह उसका पीछा कर रहा है।

तब नींद के बीच ही पल भर के लिए वह डर प्रकट हुआ जिससे हड्डियों तक में कँपकँपी दौड़ जाती है। यह डर उसके लिए एकदम नया है। पर वह नींद में है इसलिए उसे लगता है कि उसके साथ जो कुछ भी हो रहा है सपने में हो रहा है। सपने में ही वह निश्चिंत हो जाता है। उसे निश्चिंत पाकर पीछा करते हुए लोग भी निश्चिंत हो गए हैं। अब वह धीरे धीरे पीछा कर रहे हैं। जब वे उसे पकड़ लेते हैं तो पाते हैं कि वह अब भी सो रहा है। उसे सोता पाकर उसे पकड़ने वाले लोग भी सो जाते हैं और नींद में ही उसे मारने लगते हैं।

जब वह मार खा रहा होता है तब वह नींद में है, इसलिए उसे खुद को मारते हुए लोग नहीं दिखाई देते हैं जो कि खुद भी सो रहे हैं। उसे अपने ऊपर बहुत सारी तितलियाँ दिखाई देती हैं। असंख्य तितलियाँ। उसे लगता है कि वह उन सब को एक एक कर जानता है। वह उनके रंगों से उनकी गति से और उनकी उड़ने की आवाज से उन्हें पहचान सकता है। तितलियाँ भी उसे पहचानती हैं। इसलिए वे एक एक कर उसके ऊपर बैठने लगती हैं। तितलियाँ हवा से भी हलकी हैं इसलिए उसे उनका भार नहीं महसूस हो रहा है।

उसे मारने वाले लोग जब जी भर के उसे मार चुके होते हैं तब कहीं जाकर उनकी नींद टूटती है। वे जेबकतरे से दूर हटने लगते हैं। तब उन्हें दिखाई देता है कि जेबकतरे के शरीर पर बहुत छोटे छोटे रंग-बिरंगे पंख उग आए हैं। वे उसे अचरज से देर तक देखते रहते हैं। तभी पंखों में हरकत शुरू होती है। वे बढ़ना और फड़फड़ाना शुरू करते हैं। उन पंखों के फड़फड़ाने की आवाज लोगों ने पहले कभी नहीं सुनी है। जब अचरज से उनके कान चौड़े हो रहे होते हैं उसी समय जेबकतरा करवट बदलता है और धीरे धीरे उठकर बैठ जाता है। वह अपने रंगीन पंखों को बहुत हसरत के साथ सहलाता है और उड़ने के लिए तैयार हो जाता है।

जब वह उड़ रहा होता है तो वहां जमा लोग इस हद तक चकित होते हैं कि उनकी पलकें तक झपकना भूल जाती हैं। वे इतना भी नहीं कर पाते कि जेब से मोबाइल निकालें और इस अचरज भरी घटना की तस्वीर उतारें। वे उसे तब तक देखते रहते हैं जब तक कि वह उड़ते उड़ते आसमान में गायब नहीं हो जाता। उसके गायब होने के बाद वह पल आता है जब कि वह एक दूसरे को देख पाएं। वे पाते हैं कि उनमें से कोई भी एक दूसरे को नहीं पहचानता। तब उन्हें लगता है कि जैसे वे सब एक साथ कोई सपना देख रहे हों। सपने की बात सामने आते ही वे निश्चिंत हो जाते हैं और सपना टूटने का इंतजार करने लगते हैं।

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