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आयुष्मान भारत योजना की असलियत : देश के 90 फीसदी गरीबों के पास नहीं कोई स्वास्थ्य बीमा

Nirmal kant
8 Dec 2019 4:08 AM GMT
आयुष्मान भारत योजना की असलियत : देश के 90 फीसदी गरीबों के पास नहीं कोई स्वास्थ्य बीमा
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भारत में जितने लोग स्वास्थ्य समस्या के कारण गरीबी रेखा से नीचे चले गये, वह संख्या साउथ कोरिया की कुल आबादी के बराबर है, लोगों को 38 मिलियन रुपया सिर्फ दवाओं पर खर्च करना पड़ता है....

जनज्वार। भारत के 90% गरीबों के पास कोई स्वास्थ्य बीमा नहीं है। सामाजिक उपभोग पर भारत के सबसे बड़े राष्ट्रीय सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि देश के सबसे गरीब लोगों में से केवल 10.2 प्रतिशत ग्रामीण और 9.8% शहरी गरीबों के पास ही स्वास्थ्य बीमा था। यह सर्वेक्षण जुलाई 2017 से जून 2018 के बीच किया गया था।

हेल्थ चेक वेबसाइट में प्रका​शित एक रिपोर्ट के मुताबिक विशेषज्ञों के मुताबिक गरीबों की अधिकांश बचत उधार चुकाने में खर्च होती है। उन्हें बीमारी का इलाज देरी से या फिर बहुत खराब मिलता है या कहें कि वे खराब स्वास्थ्य सुविधाओं को भुगतने के लिए बाध्य हैं।

सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के राष्ट्रीय सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसओ) की रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण इलाकों में 14.1 फीसदी और शहरी इलाकों में 19.1% गरीबों का स्वास्थ्य कवर नहीं किया गया है। इस सर्वेक्षण में राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना भी शामिल थी।

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गौरतलब है कि केंद्र सरकार द्वारा प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (पीएमजेएवाई) के तहत सरकारी कर्मचारियों के लिए कर्मचारी राज्य बीमा योजना और राज्य सरकारों के स्वास्थ्य सुरक्षा कार्यक्रमों को लागू किया है।

से जुड़ी समस्याएं गरीबों को गरीब बना रही है और उन्हें रेखा से और नीचे धकेल रही है। 2011-12 में किए गए सर्वेक्षण के अनुसार 55 मिलियन भारतीय स्वास्थ्य समस्या के कारण ही गरीबी रेखा के नीचे चले गये। इंडिया स्पेंड 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक जितने लोग स्वास्थ्य समस्या के कारण गरीबी रेखा से नीचे चले गये, वह संख्या साउथ कोरिया की कुल आबादी के बराबर है। भारत में लोगों को 38 मिलियन रुपया सिर्फ दवाओं पर खर्च करना पड़ता है।

नएसओ की रिपोर्ट में बताया गया है कि केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना लॉन्च होने से पहले ग्रामीण क्षेत्रों के 12.9 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 8.9 प्रतिशत लोगों के पास केंद्र सरकार की योजना के तहत बीमा सुरक्षा थी। सर्वेक्षण में यह भी पाया गया कि ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 9.9 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 7.5% गरीब लोगों के पास कोई भी सरकारी प्रायोजित स्वास्थ्य बीमा सुरक्षा नहीं थी।

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ब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया में हेल्थ इकनॉमिक्स, फाइनेंसिंग और पॉलिसी के डायरेक्टर शक्तिवेल सेल्वराज ने कहा कि प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना लॉन्च होने से पहले बीमा कवरेज कम थी, क्योंकि राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत सेवाओं और कवरेज का प्रदर्शन खराब था। प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना को सितंबर 2019 में लॉन्च किया गया था जो करीब 10 करोड़ लोगों को बीमा सुरक्षा प्रदान करता है।

प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक, 1 दिसंबर 2019 तक करीब 6 करोड़ 7 लाख लोगों को ई कार्ड दिया गया। यह ई-कार्ड जरुरतमंद लोगों को मुफ्त इलाज का अवसर देता है। प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना की चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर इंदू भूषण ने बताती हैं कि अब गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले 40 प्रतिशत लोगों के पास स्वास्थ्य बीमा है। यह यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज के क्षेत्र में बड़ी छलांग है।

सेल्वराज ने कहा कि अगला एनएसओ दिखाएगा कि प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना ने स्वास्थ्य पर खर्च को किस हद तक कम किया है। उन्होंने कहा कि बीमा कवरेज बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है क्योंकि जो लोग नामांकित हैं, उन्हें योजना या इसके लाभों के बारे में पता है। लेकिन सभी गरीबों को बीमा कवर नहीं दिया गया है और सभी के पास स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच नहीं है।

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स्वास्थ्य उपभोक्ता सर्वेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक 2014 के बाद से ग्रामीण क्षेत्रों के सबसे गरीबों की स्वास्थ्य सुरक्षा में 0.7 प्रतिशत की कमी आई जबकि शहरी इलाकों के गरीबों के स्वास्थ्य सुरक्षा में 1.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

रिपोर्ट में बताया गया कि साल 2017-18 में ग्रामीण इलाकों के सबसे अमीरों की आबादी के 21.9 प्रतिशत और शहरी इलाकों के अमीर भारतीयों के 33 प्रतिशत ने स्वास्थ्य सुरक्षा पर खर्च किया। 2014 से 2017 के बीच ग्रामीण क्षेत्रों में 0.3 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 4 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई।

चन्ना रेड्डी इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन रिसॉर्स डेवलपमेंट ऑफ तेलंगाना गवर्मेंट के हेल्थ प्रोफेसर आमिर उल्लाह कहते हैं कि भारत में स्वास्थ्य बीमा सुरक्षा की स्थिति खराब है क्योंकि प्राइवेट हेल्थ इंश्योरेंश इंडस्ट्री अभी शुरुआती चरण में है। गरीब परिवारों के जो लोग कम बीमा प्रीमियम का भुगतान करने में सक्षम हैं उनके हिसाब से बीमा प्रीमियम अधिक है। इसके अलावा क्योंकि भारतीयों (विशेषकर ग्रामीण भारत में) की स्वास्थ्य सेवाओं जैसे डॉक्टरों और अस्पतालों तक सीमित पहुंच है, इसलिए भी उनके स्वास्थ्य बीमा खरीदने की संभावना कम है।

नएसओ की रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में आधे से अधिक निजी अस्पताल हैं जिनमें 51.9 प्रतिशत ग्रामीण और 61.4 प्रतिशत शहरों में हैं। एक निजी अस्पताल में इलाज पर औसतन 31,845 रुपये खर्ज आता है जो कि सरकारी अस्पताल से सात गुना अधिक है। सरकारी अस्पताल में इलाज पर औसतन 4,452 रुपये खर्च आता है।

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स खर्चे के चलते अस्पतालों में गरीब लोगों की भर्ती की संभावना कम है। आंकड़े बताते हैं कि सबसे अमीर 20 प्रतिशत परिवार (31.9 प्रतिशत ग्रामीणऔर 22.4 प्रतिशत शहरी इलाकों में) ही अपना इलाज इन अस्पतालों करवा पाते हैं। जबकि 20 प्रतिशत गरीब परिवारों (12.9 ग्रामीण और 16.2 प्रतिशत शहरी) से कम घरेलू बचत की वजह से अस्पताल में भर्ती नहीं हो पाते हैं।

मिर उल्लाहकहते हैं कि अपनी जेब से स्वास्थ्य सेवा के लिए भुगतान करने का सबसे बड़ा परिणाम गरीबी है। इसके अलावा जब वे स्वास्थ्य देखभाल के लिए खर्च नहीं उठा पाते हैं तो तपेदिक, कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के लिए और अधिक महंगा खर्च करते हैं।

मीरों को स्वास्थ्य बीमा की संभावना भी अधिक है। अमीरों के पास पैसा और अस्पतालों तक अधिक पहुंच है। एनएसओ के आंकड़े बताते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब सरकारी स्वास्थ्य सहायता से भी वंचित रह जाते हैं। आबादी के 40 प्रतिशत अमीरों ने गरीबों से 40 प्रतिशत ज्यादा सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रमों का लाभ लिया है।

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