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संस्कृति

बुरी औरत के सपनों में नहीं होता पति, चरित्र और मर्यादाएँ

Janjwar Team
17 Nov 2017 6:58 PM GMT
बुरी औरत के सपनों में नहीं होता पति, चरित्र और मर्यादाएँ
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'सप्ताह की कविता' में आज कैलाश मनहर की कविताएं

कैलाश मनहर भावाकुल कवि हैं। मदन कश्यप लिखते हैं -एक का रोना सुनती हैं स्त्रियाँ/ और रोने लगती हैं/ रोने लगती हैं स्त्रियाँ कि क्या उनकी अपनी व्यथा ही/ कम है रोने के लिए...' कुछ इन्हीं स्त्रियों का सा ह्रदय पाया है कैलाश मनहर ने। कोई भी दुख टिकता नहीं है जेहन में उनके। आखों के रास्ते या भाषा में कविता के रूप में बह आता है।

छोटे से जीवन में उन्होंने जो दुख झेले हैं और दुखद दृश्यों से दो चार हुए हैं वह उन्हें लगतार विचलित करता रहता है। उसे वे बारम्बार संस्मरणों की शैली में अभिव्यक्त करना चाहते हैं, पर टीस है कि जाती नहीं। महादेवी वर्मा के ‘शापमय वर' की तरह वे धुंआते रहते हैं, भीतर ही भीतर। अपनी अथाह बेचैनी को लेकर उन्होंने एक जगह राजाराम को सही उद्धृत किया है - यही तो तुम्हारी काव्य-रचना का आधार है कैलाश, क्योंकि इन्हीं अंतरद्वंद्वों की प्रश्नाकुलता में छनकर तुम्हारा चिंतन प्रक्षालित होता है और वही तुम्हारी मौलिकता की भाव-भूमि का निर्माण करता है।

कैलाश भाषा में किसी तरह का खेल नहीं करते। वह जो शमशेर ने कहा है - लेकर सीधा नारा /कौन पुकारा/ अंतिम आशाओं की सन्ध्याओं से...' तो शमशेर का वह कौन कैलाश जैसे कवि का कठजीव ही है। विकास की चौड़ी-चिकनी सड़कों के बीहड़ में अपना रास्ता कैलाश भूल जाते हैं बार-बार पर अपनी आत्मदृष्टि पर विश्वास है जो उन्हें बराबर अंधेरे में चीजों को पहचानने की ताकत देती है।

उस पहचान को वे अपने निराले ढंग से अभिव्यक्त करते हैं -'हमारी मनुष्यता के लिए/
अनिवार्य है सफलता के स्वर्ग से बचकर /अच्छाई के नर्क में आनंद लेना/ और उपेक्षणीय रहना समय के छल से...'

जीवन के अंतरद्वंद्वों को कविता के मुकाबिल गजलों में वे ज्यादा गहराई से उतार पाते हैं। 'आज फिर...' नामक छोटी सी गजलों की पुस्तिका में ऐसी तमाम पंक्तियां हैं जो उनके तल्खी भरे मुकम्मल मिजाज को सामने लाता है -'जिंदगी है, कि नहीं है, शायद/ और है भी, तो सांस भर, क्यों है...'आइए पढ़ते हैं कैलाश मनहर की कविताएं -कुमार मुकुल

खेजड़ा
अनुकूल मौसम में पनपते हैं कीट
प्रतिकूलताओं में नष्ट हो जाते हैं
नहीं कहीं भी नहीं है जल
दृष्टि सीमा से भी दूर
हर ओर
पसरी हुई है अथाह रेत
कहीं भी नहीं है जल, या जल की सम्भावना
इस मरूस्थल में

किन्तु पूरी दृढ़ता से खड़ा है
हरियल खेजड़ा
सूरज की ज्वाला को मुँह चिढ़ाता
बादलों को अँगूठा दिखलाता
रेत के प्रेमपाश में बँधा
मुस्कुराता वह
आग में से जल निचोड़ने वाला पारखी
पूरी दृढ़ता से खड़ा है
जलहीन मरूस्थल का जीवन, ऋषिवत्

समय, तेरी चुनौती स्वीकार है हमें
दिशाओं को कर सकता है अपने अधीन
किन्तु हम भी
ख़ूब जानते हैं दिशाओं के द्वार खोलना।


आज फिर गाँव जाके आया हूँ
आज फिर गाँव जाके आया हूँ।
सब से नज़रें चुराके आया हूँ।

जिस की देहरी पे मेरा काबा है,
मैं वहीं सिर झुका के आया हूँ।

सुखा रहा था जिसे वक़्त अपनी आँखों से,
वो एक बूँद, नदी में गिरा के आया हूँ ।

तुझे भी रेत से है प्यार बहुत जानता हूँ,
मैं अपनी रूह उसी में छुपाके आया हूँ।

बुरी औरत के सपनों में
बुरी औरत के सपनों में
नहीं होता पति और चरित्र और मर्यादाएँ
बन्द खिड़कियों वाला पिंजरेनुमा घर

बुरी औरत के सपनों में नहीं होती
बदन को धरती बनाकर
धान कुटवाने वाली निर्जीव सहन-शक्ति
बचपन के प्रेम को भूल जाने वाला
परिवार की प्रतिष्ठा के नाम का
पाखण्ड-पर्व
कभी नहीं होता बुरी औरत के सपनों में

दुनियादारी के घुटते हुए अँधेरे की
चहारदीवारी में
आत्महत्या का अनायास आदर्श नहीं होता
बुरी औरत के सपनों में।

बुरी औरत के सपनों में आता है
एक स्वच्छंद बहती हुई नदी का दृश्य
और मनचाहे फूल पर बैठती हुई
तितली के पंख

बुरी औरत के सपनों में
बार-बार आता है जिबह करने को
लाया जाता ख़ूबसूरत मेमना

उसके स्वच्छंद बहते रंगों पर
टपक जाते हैं
किसी निर्दोष आत्मा के पवित्र
प्रेमाश्रु

बुरी औरत के सपनों में उबलता है
बुरे लोगों के बुरे कामों के विरूद्ध
हृदय का लावा।

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