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जज के खिलाफ लिखने वाली महिला संपादक दोषी, कोर्ट ने कहा भरो जुर्माना अन्यथा अखबार कर देंगे प्रतिबंधित

Prema Negi
9 March 2019 6:22 AM GMT
जज के खिलाफ लिखने वाली महिला संपादक दोषी, कोर्ट ने कहा भरो जुर्माना अन्यथा अखबार कर देंगे प्रतिबंधित
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कोर्ट ने कहा एक हफ्ते के भीतर शिलॉन्ग टाइम्स के संपादक और प्रकाशक 2—2 लाख रुपए का जुर्माना भरें नहीं तो जाएं छह महीने के लिए जेल

जुर्माना नहीं भरने पर हो सकता है अखबार प्रतिबंधित, मानहानि के मामले में किसी प्रमुख अखबार को लेकर संभवत: पहली बार आया ऐसा डरावना अदालती आदेश

जनज्वार, शिलॉन्ग। मेघालय हाईकोर्ट ने शुक्रवार को मेघालय के मशहूर अंग्रेजी अखबार 'शिलॉन्ग टाइम्स' की एडिटर व सोशल एक्टिविस्ट पैट्रिशिया मुखिम और पब्लिशर शोभा चौधरी को न्यायालय की मानहानि का दोषी मानते हुए दो-दो लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है। स्क्रॉल में छपी खबर के अनुसार एक सप्ताह के भीतर जुर्माना अदा न कर पाने की स्थिति में दोनों को छह महीने की जेल की सजा भुगतनी होगी और अखबार को प्रतिबंधित कर दिया जाएगा।

कोर्ट ने दोनों को दिन भर की कार्यवाही खत्म होने तक कोर्ट रूम के कोने में बैठे रहने का आदेश दिया। कोर्ट के अनुसार उनके अखबार में छपे दो लेख तथ्यहीन हैं और वह सभी जजों को बेइज्जत करने वाले हैं।

कोर्ट ने यह फैसला अखबार में पिछले साल दिसंबर में प्रकाशित दो स्टोरीज को लेकर दिया। ये दोनों स्टोरीज रिटायर्ड जजों और उनके परिवारों को बेहतर सुविधाएं मुहैया कराने के कोर्ट के आदेश के बारे में थीं।

इन दोनों स्टोरीज खासतौर से 'वेन जजेज जज फॉर देमसेल्वेज़' शीर्षक वाली स्टोरी को लेकर कोर्ट ने मुखिम और चौधरी को नोटिस जारी कर यह बताने के लिए कहा था कि क्यों न उनके अखबार के खिलाफ मानहानि की कार्यवाही शुरू करनी चाहिए?

नोटिस में कहा गया था कि कानून या केस की पृष्ठभूमि जाने बिना प्रकाशक व संपादक ने ऐसी टिप्पणियां कीं जो केस को देख रहे जज और पूरे जज समुदाय के सम्मान को चोट पहुंचाने वाला है।

इस मामले में मुखिम और चौधरी ने बिना किसी शर्त के माफी मांग ली थी लेकिन फैसला सुनाने वाली बेंच का मानना था कि यह सजा से बचने की सोची-समझी रणनीति है।

कोर्ट ने अखबार की स्टोरी को तथ्यहीन करार दिया था और कहा था कि यह रिसर्च किए बिना सिर्फ कोर्ट के आदेश को स्केंडलाइज करने के लिए प्रकाशित की गई। अदालत ने उस स्टोरी को फेसबुक पर प्रसारित करने और जजों को मजाक उड़ाने को भी अपराध माना है। कोर्ट ने कहा कि अपनी तथ्यहीन रिपोर्ट को प्रसारित करने के लिए संपादक ने सोशल मीडिया का सहारा लिया।

शिलॉन्ग टाइम्स के संपादक और मालिक के खिलाफ आए फैसले के बाद उन दोनों लोगों का पक्ष नहीं आ पाया है। संपर्क की कोशिश की गयी, लेकिन बातचीत नहीं हो सकी।

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