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फेक न्यूज पर सवार मीडिया के लिए आपदाएं और त्रासदियां बन चुकी हैं त्योहार

Nirmal kant
16 April 2020 3:30 AM GMT
फेक न्यूज पर सवार मीडिया के लिए आपदाएं और त्रासदियां बन चुकी हैं त्योहार
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मीडिया अपने दुश्चरित्र में इतना खोता जा रहा है कि वह सूचना को निगल कर गलत सूचना को जन्म देता है। शायद इसी वजह से ज़ी न्यूज़ ने एक ख़बर में अरुणाचल प्रदेश में 11 जमात के लोगों को कोरोना से संक्रमित बताया। बाद में ज़ी न्यूज़ ने इस मानवीय गलती के लिए ऑन एयर माफी मांग ली क्योंकि यह फेक न्यूज़ थी...

मीडिया की भूमिका पर सूरज सिंह बघेल का विश्लेषण

पिछले हफ्ते नानी ने मुझे फोन किया। ये फोन कॉल आम दिनों के फोन कॉल से अलग था। फोन उठाते ही नानी ने मुझे बताना शुरू किया कि कैसे मैं इलायची, कपूर, जायफल और लौंग की मदद से कोविड-19 से बच सकता हूँ। ख़ैर गाँव में रहने वाली मेरी नानी को नहीं पता था कि यह एक अफ़वाह थी जो मार्च के शुरुआती दिनों से लगातार सोशल मीडिया और मैसेंजिंग नेटवर्कों में शेयर की जा रही थी। और तो और अमर उजाला ने 5 मार्च के ऑनलाइन संस्करण में भी इसे 'न्यूज़डेस्क' की क्रेडिट लाइन के साथ छापकर मान्यता दे दी।

भारत में फेक न्यूज़ के फैलने और फैलाने के किस्से अभी तक जहाँ सोशल मीडिया से ज्यादा आ रहे थें, वहीं पिछले कुछ दिनों से इसमें मीडिया भी सीधे-सीधे शामिल हो गया है। अमर उजाला का उदाहरण भी उनमें से एक है। कोरोना के भारत आने के साथ ही भारतीय मीडिया अपने पोस्ट ट्रुथ चरित्र को और ज्यादा उभार सामने ला रहा है। वर्तमान में मौजूद झूठ एवं अफवाहों से निपटने के बजाय वह नए-नए झूठ गढ़ने में शामिल हो गया।

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राष्ट्रीय और वैश्विक आपदा के समय मीडिया पर संवेदनशील और सहज होकर सूचनाओं को नागरिकों तक पहुंचाने की ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है। यह ज़िम्मेदारी उतनी ही सरकार पर भी आती है। लेकिन आयुष मंत्रालय के एक विज्ञापन ने इस ज़िम्मेदारी को अँगूठा दिखाते हुए एक ऐसा दावा पेश कर दिया कि उस पर कोई भी पाठक आसानी से भरोसा कर लेता। 29 जनवरी के अपने विज्ञापन में आयुष मंत्रालय ने दावा किया कि आयुर्वेद और यूनानी दवाओं के माध्यम से कोरोना को रोका जा सकता है। और इसके लिए उसने वैज्ञानिक शोध के दावों का सहारा लिया। इस विज्ञापन के बाद आयुष मंत्रालय को काफी आलोचना का सामना करना पड़ा। और 2 महीने बाद, 1 अप्रैल को आयुष मंत्रालय ने ऐसे सभी विज्ञापनों को हटाने के निर्देश जारी किए।

काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी मीडिया संस्थानों को आयुष मंत्रालय के इस विज्ञापन को नहीं छापने का निर्देश जारी किया। यहाँ तक सब ठीक था लेकिन पिछले हफ्ते केंद्रीय आयुष मंत्री श्रीपद नाइक ने तो यह तक कह दिया कि कोविड19 से संक्रमित ब्रिटेन के प्रिंस चार्ल्स का इलाज भी आयुर्वेदिक और होम्योपैथी पद्धति से किया गया। जिसका खंडन बाद में प्रिंस चार्ल्स के प्रवक्ता को करना पड़ा। उसके बाद भी वह इस बयान को दुहारते रहें।

भारतीय मीडिया के लिए आपदा का समय त्यौहार जैसा होता है। फिर चाहे वह 1999 का कारगिल युद्ध हो या फिर 2008 का मुंबई हमला। भारतीय मीडिया इसे एक मौके की तरह इस्तेमाल करता है। मीडिया आपदा के हालात में रिपोर्टिंग करते वक़्त अपने नीतियों से बार-बार समझौता करते हैं। बिहार में चमकी बुखार के दिनों कुछ 'वरिष्ठ मीडियाकर्मियों' की 'एक्सक्लूसिव' रिपोर्ट याद करिए। उस वक़्त भी मीडिया अपने असंवेदनशील रूप का एहसास हमें करा रहा था। लेकिन कोविड19 के मामले में वह उससे भी आगे जा चुका है। अपना विकरालरूप और विशाल करता जा रहा है।

सल में तो मीडिया की कोशिश उस सच को खोजने की होती है जो तथ्यों और तर्कों के कठिन विश्लेषण के बाद हासिल होता है न कि केवल जो लोकप्रिय है और अधिकतर जनमत से सहमत है। पर 24/7 घंटे दौड़ रहे चैनलों और उनके सेलेब्रिटी एंकर्स के पास इतना समय कहाँ कि वह तथ्य और तर्क के साथ सच खोज सके। कोरोना के शुरुआती प्रकोप में देश के स्वास्थ्य और उससे लड़ने की तैयारी का जायज़ा लेने की बजाय वह अपने क्रोमा स्टूडिओ और ग्राफिक्स के साथ इसका चीन में पड़ताल कर रहे थे। जबकि इसी दौरान सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर धड़ल्ले से फेक न्यूज़ सामग्री तेजी से सबके फोन स्क्रीन पर जगह बना रही थी।

गभग हर बड़े समाचार चैनल वायरल सच की पड़ताल करते हैं लेकिन कोरोना से जुड़े वायरल सच की पड़ताल करने में मीडिया नाकाम रही। जिसका उदाहरण हमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के थाली बजाओ और रोशनी फैलाओ अभियान के आव्हान के बाद ट्विटर, फेसबुक पर देखने को मिला। जब अलग-अलग वैज्ञानिक खोजों का हवाला देकर उनके इन अभियान को मास्टरस्ट्रोक बताया जाने लगा। जिसमें मीडिया भी शामिल हो गया।

ट्रोल्स की बात छोड़ भी दें तो राष्ट्रीय महिला आयोग की प्रमुख रेखा शर्मा ने एक सरकारी एफ़एम चैनल के कार्यक्रम में दिये जलाने के तिथि-समय को 9 के शुभ संयोग से जोड़ दिया और कहा कि अंकशास्त्र में इसे शुभ माना गया है।

और इन्हीं अफ़वाहों और झूठी खबरों के बीच में तबलीगी जमात से कोरोना के केस आने शुरू हो जाते हैं। यह मीडिया के लिए सोने पर सुहागा जैसा था जब निज़ामुद्दीन, दिल्ली में आयोजित एक तबलीगी जमात कार्यक्रम में आए जमतियों में कोरोना के लक्षण पाये गये और इनमें से अनेक कोरोना पॉज़िटिव के मामले थे। इसके बाद मीडिया में चीन और कोरोना नहीं, बल्कि इस्लाम, जमात और कोरोना थे। और वैसे भी इस्लाम और सांप्रदायिकता हिन्दी मीडिया की पसंदीदा “बीट” है। इसलिए अब मीडिया के लिए कोरोना की वजह चीन नहीं, इस्लाम और मुसलमान था।

कोरोना कोई बीमारी नहीं थी, अब यह जिहाद हो चुका था, आतंकवाद बन चुका था। और तमाम प्रिंट व इलेक्ट्रोनिक मीडिया इसे भुनाने में पीछे नहीं थे। जो सबसे आगे थे वह रोज नये क्रिएटिव हैडलाइंस खोज रहे थे, जिसमें जमात, इस्लाम और कोरोना को साथ में बैठाया जा सके। कुछ उदाहरण में यहाँ दे देता हूँ- कोरोना से संक्रमित जमात का एंटी वायरस (ज़ी न्यूज़); जमात के वायरस इलाज क्या? (एबीपी न्यूज़); धर्म के नाम पर जानलेवा अधर्म (न्यूज़18इंडिया)।

सके बाद मीडिया स्वयं में फेक न्यूज पैदा करने का संस्थान बनता चला गया। खुद पुलिस को ट्वीट करके कहना पड़ा कि यह खबरें झूठी हैं, और इनमें ज़्यादातर खबरें जमात से जुड़े लोगों पर थी। मीडिया ने कई ऐसे मामलों में जिसमें जमात की कोई भूमिका नहीं थी, उसे भी जमात से जोड़ने की कोशिश की। मीडिया का हाशिये के समाज के प्रति पूर्वाग्रह खुल-खुलकर सामने आने लगे। मीडिया अपना चरित्र सदैव एलीट बनाए रखना चाहता है। खुद को लोकतन्त्र का चौथा खंभा बताते हुए उस खंभे को हर पल कुरेदता भी रहता है।

मीडिया अपने दुश्चरित्र में इतना खोता जा रहा है कि वह सूचना को निगल कर गलत सूचना को जन्म देता है। शायद इसी वजह से ज़ी न्यूज़ ने एक ख़बर में अरुणाचल प्रदेश में 11 जमात के लोगों को कोरोना से संक्रमित बताया। बाद में ज़ी न्यूज़ ने इस मानवीय गलती के लिए ऑन एयर माफी मांग ली क्योंकि यह फेक न्यूज़ थी। वैसे भी एक आम दर्शक को मालूम है कि ज़ी न्यूज़ के ख़बरों की राजनीति क्या रही है, ऐसे में शायद ही इसे कोई मानवीय गलती माने। हिंदुस्तान अख़बार ने लॉकडाउन खुलने के बाद रेल्वे द्वारा लिए जाने वाले प्रोटोकाल पर स्टोरी कर की, जिसका खंडन बाद में स्वयं रेल मंत्रालय ने ट्वीट कर किया। इन सब ख़बरों क्या वजह हो सकती ? यह सोचा जाना चाहिए।

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निजी चैनलों की समस्या यह भी हो सकती है कि कोरोना के वजह से ग्राउंड रिपोर्टिंग, जो पहले भी कम होती थी और अब और कम हो गयी है। कोरोना से जुड़ी ख़बरों के लिए नागरिक सरकारी चैनल और ट्विटर अकाउंट और न्यूज़ वेबसाइट्स का सहारा ले रहे हैं। आपदा के समय में खबरों की कमी है, और उसके लिए मीडिया मनगढ़ंत कहानियाँ भी बुनने आतुर है। ऐसे में उनके सामने कोरोना और उससे जुड़े नए रहस्य, नए खोज और नए अपराधी ढूँढने के सिवा कुछ बच नहीं जाता और इसी प्रक्रिया में ज़ी न्यूज़ जैसी मानवीय गलती हो जाती है। और दर्शकों के सामने ऑन एयर फेक न्यूज़ परोस दी जाती है।

रकार भी इस बात को समझ रही है कि मौजूदा समय में नागरिक सूचना के लिए ऐसे स्त्रोत पर निर्भर हैं जो ज्यादा सटीक जानकारी, बिना लाग-लपेट के उन तक पहुंचाए। मौजूदा समय में सरकार के पास एक मौका भी है कि वह टेलीविज़न उद्योग के लिए एक रेगुलेटरी संस्था का निर्माण करें, जो समाचार चैनलों की मनमानी पर लगाम लगा सके। और साथ ही साथ एक रेगुलेटरी संस्था ऑनलाइन न्यूज़ प्लेटफॉर्म के लिए भी अस्तित्व में लायी जाये। ताकि दोनों ही माध्यमों पर अफ़वाह और फेक न्यूज़ से निपटने में नागरिक इन संस्थानों का रुख़ अख़्तियार कर सके। इसके अलावा सरकार नागरिकों को फ़ेक न्यूज़ और अफ़वाहों से बचाने के लिए एक जागरूक अभियान की भी शुरुआत करनी चाहिए।

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