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विमर्श

'जनअदालतों' को बंद करने का फैसला आत्मघाती

Janjwar Team
13 July 2017 12:56 PM GMT
जनअदालतों को बंद करने का फैसला आत्मघाती
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योगी सरकार को समझना चाहिए कि न्याय पंचायतें हमारी सांस्कृतिक विरासत हैं। इन्हें समाप्त करना भारतीय संस्कृति तथा सस्ता न्याय के उदात्त भावना का समापन है...

जनार्दन प्रसाद शाही

सुकरात पर एथेन्स की अदालत में मुख्यतया दो आरोप थे— एक, सुकरात एथेन्स के देवताओं की पूजा नहीं करते, बल्कि उन्होंने अपने लिए नये देवताओं का निर्माण किया है। दो, वे नवयुवकों को भ्रष्ट करते हैं।

सुकरात ने अपने बचाव में सुन्दर तर्क दिये और कहा कि ‘सत्य का दंश शायद मानव समाज में कुछ लोगों को सहय नहीं होता।’ सुकरात पर मुकदमा राजनीति से प्रेरित था और राजनीतिक कारणों से ही उसे मृत्युदण्ड दिया गया। प्लेटो ने अपने ग्रन्थ संवाद में फीड़ो नामक अध्याय ने उसके मृत्यु का सम्पूर्ण विवरण दर्ज किया है। उस समय प्लेटो की उम्र 28 वर्ष थी। उसके अनुसार ‘सुकरात उद्विशंना से रहित थे।’ जीवन के प्रति इस प्रकार तटस्थता का भाव वहां उपस्थित लोगों को रोमांचित कर रहा था। लोगों में अजीब सी पीड़ा व दया थी।

27 जून, दिन मंगलवार को योगी जी के शासन के 100 दिन पूरे होने पर सायं 5 बजे लखनऊ के लोक भवन में कैबिनेट की बैठक हुई। प्रवक्ता श्रीकांत शर्मा जी ने बताया है कि चार अहम फैसले कैबिनेट ने लिये हैं जिसमें से न्याय पंचायतों को समाप्त करने का भी निर्णय लिया गया है।

ब्रिटेन में स्थानीय निकाय पूरी तरह स्वतंत्र और अधिकार सम्पन्न हैं, वहां जनता सीधे मेयर का चुनाव करती है। कानून व्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य, नगर विकास तथा नगर प्रशासन के समस्त अधिकार मेयर के पास रहते हैं।

ब्रिटेन में मेयर अपने कार्यकाल के लिए अपनी नौकरशाही का नामांकन स्वयं करता है जो कि उसके कार्यकाल की समाप्ति के बाद स्वमेव समाप्त हो जाता है, जबकि भारत में अंग्रेजों ने नगरपालिकाओं तथा अन्य निकायों में अपनी पकड़ हेतु समस्त अधिकार स्थायी नौकरशाही के अधीन रखा जो आज भी कायम है।

भारत में जो अधिकार प्रान्तों की सरकारों के पास होते हैं वह समस्त अधिकार ब्रिटेन में मेयर तथा जिलाध्यक्षों के पास होते हैं। वहां जिलाधिकारी अथवा कलेक्टर नाम का कोई पद नहीं होता है।

भारत के प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद में सभा अथवा समिति के रूप में लोकतांत्रिक स्वायत्तशाही संस्थाओं का उल्लेख मिलता है। ग्रामीण स्तर पर स्वायत्तशाही इकाइयां/पंचायतें आदि काल से विद्यमान हैं। दक्षिण भारत के पांण्ड्य, चोल साम्राज्य तथा उत्तर भारत के मौर्य, लिच्छवी तथा गुप्तकालीन शासन व्यव्स्था में न्याय पंचायतों को अस्तित्व रहा है।

गाँधी जी के ग्राम स्वराज से प्रेरित होकर संविधान सभा निति निदेशक तत्व के अनुच्छेद 40 में स्वशासन (Self Government) कि आधारशिला रखी, फलस्वरूप आजादी के स्वपनदर्शी लोगो ने 15 अगस्त 1949 से पंचायतों की व्यवस्था की।

न्याय पंचायतों के सरपंच के अधीन भारतीय दण्ड संहिता (एक्ट सं0 45 सन् 1960) की धारा (40, 162, 172, 174, 179, 269, 277, 283, 285, 289, 290, 294, 323, 334, 341, 352, 357, 358, 374, 379, 403, 411, 426, 428, 430, 431, 448, 504, 506, 509, तथा 510) के अन्तर्गत अपराध देखे जाते थे। जैसा कि वर्तमान में न्याय पाना भारत की निर्धन तथा गरीब जनता के लिए असम्भव है।

आपराधिक मुकदमों में 30-40 वर्षों अन्तिम फैसला होता है। निचली अदालतों में इतने मामले लंबित हैं कि उनका निपटारा सैकड़ों सालों तक सम्भव नहीं। विलम्ब से प्राप्त न्याय, न्याय नहीं होता। ऐसी विकट स्थिति में न्याय पंचायतों को समाप्त करना आश्चर्यजनक है।

न्याय पंचायतें जन अदालतें हैं, जिसमें बिना वकील तथा फीस के सुलभ न्याय अल्प समय मिल जाता था। भ्रष्ट नौकरशाही तथा अयोग्य राजनीति के कारण 70 के दशक के बाद न्याय पंचायतों का गठन ही नहीं किया गया, जबकि संविधान की धारा 40 (नीति निर्देशक तत्व) ने पंचायतों को स्वायत्त बनाने का निर्देश दिया गया है।

वर्ष 1931 में प्रथम गोलमेज क्रांफ्रेंस में गाँधी जी से अंग्रेजी सरकार ने तर्क दिया था कि भारतीयों को शासन तंत्र चलाने का अनुभव नहीं है। वैसा ही तर्क वर्तमान में नौकरशाह तथा अयोग्य राजनीतिक पार्टियां दलील देती हैं कि न्याय पंचायतों को न्याय करने का ढंग पता नहीं है। जबकि इतिहास साक्षी है कि अंग्रेजी शासन तथा इसके पूर्व भी अधिकांश समस्याओं का निपटारा पंचायतें हजारो वर्षों से करती आ रही हैं।

न्याय पंचायतें हमारी सांस्कृतिक विरासत हैं। इन्हें समाप्त करना भारतीय संस्कृति तथा सस्ता न्याय के उदात्त भावना का समापन है। सरकार को चाहिए कि अपने पास अपराधों की जांच, प्रांति नहर, प्रांति सुरक्षा बल, प्रांति कर तथा शुल्क अपने पास रखे तथा शेष कार्य शिक्षा, स्वास्थ्य, सफाई, प्राकृतिक संसाधनों आदि पंचायतों तथा निकायों को सौंप देना चाहिए।

स्वायत्तता 21वीं सदी की नवीनतम विकसित सामाजिक व्यवस्था है। 1909 में ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत में विकेन्द्रीकरण के सुझावों के लिए ‘विकेन्द्रीकरण कमीशन’ की नियुक्ति की गयी। जिसने 1915 में सुझाव दिया कि ग्राम पंचायतों की स्थापना की जाये तथा आर्थिक सहायता देकर इसे प्रभावशाली बनाया जाये। फलतः 1920 में उ0प्र0 ग्राम पंचायत अधिनियम पास किया गया। अंग्रेजी राज ने इस अधिनियम में लोकमत को महत्ता न देकर नौकरशाही को सौप दिया। पुन: 1934 में संशोधन किया गया, किन्तु इसकी खामियां दूर न की जा सकीं।

सुकरात का कथन कि ‘सत्य का दंश समाज के कुछ लोगो को सह्य नहीं होता, समीचीन है। संभवतः हमारे नौकरशाह तथा अदूरदर्शी राजनेता जनतंत्र अथवा जनता का शासन नहीं चाहते हैं। विकेन्द्रीकृत प्रशासन न्याय तथा सामाजिक हित के कार्य जनता को सौंप देना चाहिए।

ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, नैतिकता, त्याग तथा जनसेवा जैसी भावना प्रधान सांस्कृतिक गुणों से भरपूर व्यक्ति का चुनाव संघ लोक सेवा आयोग नहीं कर सकती है। इसलिए यह कहना कि ग्रामीण परिवेश में लोग योग्य नहीं होते, गलत है। जिस पंचायती राज व्यवस्था को विदेशी सत्ता ने भी सम्मान देकर स्थापित किया उस व्यवस्था को माननीय योगी जी समाप्त कर दिया। यह बडे़ दुख की बात है। इसके लिए आगे आने की जरूरत है।

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