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राजनीति

उत्तराखंड की मंत्री का पति निकला किडनी चोर

Janjwar Team
14 Oct 2017 4:55 PM GMT
उत्तराखंड की मंत्री का पति निकला किडनी चोर
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उत्तराखंड की मंत्री रेखा आर्य के पति गिरधारी लाल साहू ने अपने यहां ही काम करने वाले एक कर्मचारी की किडनी अपनी दूसरी पत्नी के लिए निकलवा ली...

दिगदर्शन रावत की विशेष रिपोर्ट

उत्तराखण्ड में पिछले दिनों एक बड़े किडनी चोरों के रैकेट का पर्दाफाश हुआ है। देहरादून की पुलिस ने ग्यारह सितंबर को एक बड़ी सफलता दर्ज करते हुए देश में अब तक के सबसे बड़े किडनी चोरों को खुलासा किया है।

किडनी चोरों की इस गिनती में उत्तराखंड के एक मंत्री का पति का भी शामिल है।

उत्तराखण्ड सरकार की महिला कल्याण एवं बाल विकास मंत्री रेखा आर्य का पति गिरधारी लाल साहू पूर्व में न केवल बरेली में हिस्ट्रीशीटर रहा, बल्कि उत्तराखण्ड में वह जमीनों के फर्जीवाड़े को लेकर कुख्यात है। एक तफ्तीश में तो वह शातिर किडनी चोर भी निकला। उसने धोखे से अपने एक गरीब कर्मचारी की किडनी निकलवाकर अपनी दूसरी पत्नी को ट्रांसप्लांट करवा दी। जिस गरीब आदमी नरेंश चंद्र की किडनी निकाली गई अब वह न्याय के लिए भटक रहा है।

किडनी निकालने के बाद उसके निशान दिखाता नरेश चंद्र गंगवार और हिस्ट्रीशीटर रहा उत्तराखण्ड सरकार में मंत्री रेखा आर्य का पति गिरधारी लाल साहू

बकौल नरेश चंद्र, गिरधारी लाल साहू ने छल-फरेब करके उनकी एक किडनी निकलवाकर अपनी दूसरी पत्नी वैजयंती को ट्रांसप्लांट करवा दी। इस मामले में विस्तृत और खोजी रपट करने वाले साप्ताहिक अखबार संडे पोस्ट के हेड आॅफिस में नरेश चंद्र का फोन आया था उसके बाद इस रिपोर्ट के लेखक ने नरेश चंद्र से हल्द्वानी में मुलाकात की। इसके बाद वे तमाम दस्तावेज लेकर हमारे नोएडा कार्यालय आए। यहां पर हमारी टीम ने उनकी पूरी बात सुनी और उनकी जानकारी में इस बातचीत को रिकाॅर्ड भी किया है।

भूमाफिया गिरधारी लाल साहू का यह कृत्य गंभीरतम अपराध की श्रेणी में आता है। 2011 में लोकसभा में मानव अंग प्रत्यारोपण कानून को संशोधित करते हुए गैरकानूनी तरह से अंग प्रत्यारोपण की न्यूनतम सजा 10 बरस और आर्थिक जुर्माना एक करोड़ तक कर दिया गया है।

नरेश चंद्र के साथ हुए इस घोर अमानवीय कृत्य में श्रीलंका के बड़े अस्पताल की संलिप्तता भी सामने आई है।

नरेश चंद्र गंगवार उत्तर प्रदेश के जनपद बरेली के गांव जशनपुर, थाना शेरगढ़ के रहने वाले हैं। गिरधारी लाल साहू से इनका परिचय कई दशक पुराना है। वर्तमान में नरेश चंद्र साहू के यहां बतौर सुपरवाइजर दस हजार रुपया मासिक वेतन पर काम करते हैं और गिरधारी लाल साहू के फार्म हाउस आरटीओ रोड, विजेंद्र विहार, हल्द्वानी में ही रहते हैं।

नरेश चंद्र गंगवार को वर्ष 2015 में गिरधारी लाल साहू ने उन्हें बताया कि उसकी दूसरी पत्नी वैजन्तीमाला गंभीर रूप से बीमार है। बीमारी के इलाज के लिए वैजन्तीमाला को दिल्ली के किसी बड़े अस्पताल में दिखाना होगा। गिरधारी लाल साहू ने नरेश चंद्र गंगवार से कहा कि वे वैजन्तीमाला का ध्यान रखने के लिए दिल्ली चलें। गुरुग्राम स्थित मेदांता अस्पताल में वैजन्तीमाला को लाया गया। नरेश चंद्र गंगवार के साथ गिरधारी लाल साहू का बेटा धर्मेंद्र राठौर भी इस दौरान गुरुग्राम में रहा।

नरेश गंगवार के अनुसार लगभग दस दिन तक अस्पताल में वैजन्तीमाला का इलाज चला। इसी दौरान गिरधारी लाल साहू ने नरेश गंगवार को जानकारी दी कि वैजन्तीमाला का इलाज श्रीलंका में ही संभव है। चूंकि वहां भी देखभाल के लिए गंगवार को साथ जाना पड़ेगा इसलिए उनका पासपोर्ट बनाना होगा। यहीं से फरेब का खेल गंगवार संग साहू ने शुरू कर दिया।

पासपोर्ट बनाने के नाम पर मेदांता अस्पताल में नरेश चंद्र गंगवार को मेडिकल चेकअप के बहाने भर्ती करा दिया गया। 20-05-2015 की एक रिपोर्ट ‘मेदांता किडनी एंड यूरोलाॅजी इंस्टीट्यूट - डोनर ट्रांसप्लांट प्रोफोरमा’ में नरेश चंद्र की किडनी से संबंधित टेस्ट का पूरा विवरण है। 19-05-2015 की एक अन्य मेडिकल रिपोर्ट में उन्हें ‘प्राॅस्पेक्टिव डोनर फाॅर हिज सिस्टर’ यानी अपनी बहन के लिए संभावित अंगदानकर्ता लिखा गया है।

प्रश्न उठता है कि मेदांता अस्पताल ने नरेश चंद्र गंगवार को किडनी ट्रांसप्लांट के लिए भर्ती करने से पूर्व ‘मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम 2014’ के अनुसार नियमों का पालन करते हुए यह सुनिश्चित क्यों नहीं किया कि वे सही में वैजन्तीमाला के भाई हैं भी या नहीं।

साहू ने मेदांता अस्पताल में नरेश चंद्र गंगवार को भर्ती करा यहां पक्का कर लिया था कि गंगवार की किडनी का प्रत्यारोपण हो सकता है। ऐसा करने के लिए उसने मेदांता अस्पताल को भी धोखे में रखा। मेदांता अस्पताल में नरेश चंद्र गंगवार को वैजन्तीमाला का भाई कह भर्ती कराया गया। जब मेदांता में हुए मेडिकल चेकअप से स्पष्ट हो गया कि नरेश चंद्र गंगवार की किडनी का प्रत्यारोपण वैजन्तीमाला को संभव है तो अस्पताल ने आगे की कार्यवाही के लिए साहू से कागजात मांगे, जिनसे यह स्थापित हो सके कि किडनी देने वाला और लेने वाला सगे-संबंधी हैं। मगर साहू ने असमर्थता जाहिर की। जब मेदांता को मामले में झोल नजर आया तो किडनी ट्रांसप्लांट से मना कर दिया।

इसके बाद ही उसने धोखे से गंगवार को श्रीलंका चलने को राजी कर लिया। जहां कोलंबो स्थित लंका हाॅस्पिटल्स एंड डाइग्नोस्टिक प्रा लि में गैरकानूनी तरीके से किडनी प्रत्यारोपण की व्यवस्था साहू ने कर ली थी। जब इस अस्पताल और श्रीलंका में मानव अंग प्रत्यारोपण कानून की बाबत जानकारी एकत्रित की तो कई चौंकाने वाले खुलासे सामने आए हैं।

सबसे महत्वपूर्ण है श्रीलंका का मानव अंग प्रत्यारोपण कानून जो काफी हद तक भारतीय कानून जैसा ही है। श्रीलंका में भी किडनी एवं अन्य मानव अंगों का गैरकानूनी तरीके से व्यापार होने की बात भी सामने आई है।

जनवरी 2016 में तेलंगाना की पुलिस ने एक बड़े किडनी रैकेट का भंडाफोड़ किया था। तेलंगाना के नालगोडा जिले की पुलिस ने तीन ऐसे लोगों को गिरफ्तार करने में सफलता पाई जिन्होंने साठ गरीब भारतीयों को पैसों का लालच दे श्रीलंका ले जाकर उनकी किडनी निकलवा दी थी।

इस किडनी रैकेट का पर्दाफाश होने के बाद श्रीलंका सरकार हरकत में आई। श्रीलंका सरकार ने तत्काल किसी भी विदेशी के श्रीलंका में किडनी ट्रांसप्लांट पर प्रतिबंध लगा दिया था। साथ ही वहां के चार बड़े अस्पतालों के खिलाफ जांच भी शुरू कर दी थी। इन चार अस्पतालों में एक अस्पताल श्रीलंका हाॅस्पिटल्स एंड डाइग्नोस्टिक प्रा लि भी है, जहां नरेश चंद्र गंगवार की किडनी निकाली गई।

नरेश चंद्र गंगवार के दुखों का यही अंत नहीं होता। वे एक पैर से लाचार हैं। आर्थिक स्थिति भी बेहद खराब हैं। उन्हें साहू द्वारा एक भी रुपए की मदद नहीं दी गई।

उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखण्ड पुलिस को दिए अपने प्रार्थना पत्र में नरेश चंद्र गंगवार ने आरोप लगाया है कि पैसे मांगने पर गिरधारी लाल साहू, धर्मेंद्र राठौर और सत्येन्द्र राठौर उनके संग मारपीट करते हैं। नरेश चंद्र गंगवार ने यह भी बताया कि इस किडनी चोरी की बाबत गिरधारी लाल साहू की तीसरी पत्नी रेखा आर्या सबकुछ जानती हैं।

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत उत्तराखण्ड सरकार की मंत्री रेखा आर्या और उनके किडनी चोरी के आरोपी पति गिरधारी लाल साहू के साथ

गौरतलब है कि रेखा आर्य वर्तमान में सोमेश्वर (सुरक्षित) सीट से विधानसभा सदस्य और त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार में महिला एवं बाल विकास राज्यमंत्री हैं। अब देखना होगा कि ‘जीरो टाॅलरेंस आॅन करप्शन’ वाली त्रिवेंद्र सरकार नरेश चंद्र गंगवार को न्याय दिलाने की दिशा में क्या पहल करती है। यहां प्रश्न कानून की रक्षा के साथ-साथ सार्वजनिक जीवन में शुचिता का भी है। गिरधारी लाल साहू के खिलाफ जमीनों की धोखाधड़ी और बेनामी संपत्ति के लगातार समाचार प्रकाशित होने के बावजूद अभी तक उस पर कोई कार्यवाही न होना त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार की मंशा पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।

इस मसले पर महिला कल्याण एवं बाल विकास राज्यमंत्री और गिरधारी की पत्नी रेखा आर्य कहती हैं, 'जो विषय आप रख रहे हैं, इसकी मुझे कोई जानकारी नहीं है।' उत्तराखंड पुलिस महानिदेशक उत्तराखण्ड अनिल रतूड़ी कहते हैं कि मेरे पास मामला नहीं आया है। मामला जनपद नैनीताल का है। वहां के एसएसपी से बात करें। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक नैनीताल, जन्मेजय खण्डूड़ी का कहना है कि मुझे शिकायत पत्र मिला है। मैं संबंधित थाने को जांच के लिए निर्देशित कर रहा हूं।

गिरधारी की दूसरी पत्नी वैजन्ती माला, जिनकी की किडनी ट्रांसप्लांट की गई, इस मामले में कहना है कि लंका हाॅस्पिटल में किडनी मुझे दी गई। इनकी मर्जी से किडनी ट्रांसफर हुई थी। हमने कोई पैसे की बात नहीं की थी। इनकी बच्ची की शादी के लिए पांच लाख रुपए देने की बात हुई थी। लंका में किडनी तो ट्रांसफर होती है। ऐसा तो सभी कर रहे हैं। अभी देश की बड़ी मंत्री का किडनी ट्रांसप्लांट हुआ है।

इस मामले में गिरधारी लाल साहू से फोन पर संपर्क करने की कोशिश की गई। फोन उठने पर इन रिपोर्टर का नाम कहने पर ही फोन काट दिया गया। इसके बाद कई बार उन्हें फोन किया गया पर काॅल रीसिव नहीं हुआ।

केंद्र सरकार ने 2014 में मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम 1994 को संशोधित करते हुए नया कानून ‘मानव अंग और उत्तक प्रत्यारोपण नियम 2014’ लागू किया है जिसके अनुसार अंग दान करने वाला व्यक्ति केवल निकट संबंधी जैसे माता-पिता, पुत्र-पुत्री, भाई-बहन अथवा दादा-दादी, नाना-नानी अर्थात् खून के संबंधी ही हो सकते हैं।

इसके अतिरिक्त यदि कोई व्यक्ति जो सगा-संबंधी न हो, यदि प्रेम वश अपने किसी करीबी को अपना अंगदान करना चाहता हो तो एक लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद वह ऐसा कर सकता है। यही कारण है कि अवैध किडनी कारोबार हमारे देश में फल-फूल रहा है।

वर्ष 2002 में अमृतसर किडनी रैकेट का भंडाफोड़ हुआ था जिसमें डेढ़ सौ करोड़ का काला कारोबार करने की बात सामने आई थी। 2015 में शिरडी, महाराष्ट्र का एक डाॅक्टर पकड़ा गया जो तीस लाख में गैरकानूनी तरीके से किडनी ट्रांसप्लांट करता था। देहरादून पुलिस ने जिस अमित कुमार को गिरफ्तार किया है वह एक अनुमान के मुताबिक अब तक छह सौ से अधिक किडनी ट्रांसप्लांट करवा चुका है।

खरबों के इस काले कारोबार में देश के कई प्रतिष्ठित अस्पतालों का नाम भी सामने आ चुका है। जून 2016 में दिल्ली के प्रतिष्ठित अपोलो अस्पताल का नाम इस घिनौने अपराध से जुड़ने की खबर आई थी।

(साप्ताहिक अखबार द संडे पोस्ट में प्रकाशित रिपोर्ट का संपादित अंश)

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