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विमर्श

क्या है नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) : कुछ बातें, सवाल और उनके जवाब

Prema Negi
13 Jan 2020 6:40 AM GMT
क्या है नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) : कुछ बातें, सवाल और उनके जवाब
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एक बार नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 पर पुनः गौर फरमायें - इसमें कहीं भी 'अल्पसंख्यक' शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है- ना ही गृहमंत्री द्वारा प्रस्तुत 'स्टेटमेंट आफ ऑब्जेक्ट्स एंड रीजंस' में इस बात का कोई उल्लेख किया गया है कि भारत सरकार के पास कोई अध्ययन है, जिसमें वह पता कर सकें कि कितने लोग धार्मिक उत्पीड़न के शिकार होकर भारत में शरण लेने के लिए आए हैं....

इलाहाबाद हाईकोर्ट में अधिवक्ता राकेश गुप्ता का CAA पर विश्लेषण

मानव सभ्यता का इतिहास विस्थापन का भी इतिहास है। प्राचीनकाल से मनुष्य एक जगह से दूसरी जगह पर विस्थापित होता चला आया है। विस्थापन का जो सर्व प्रमुख कारण होता है- वह है बेहतर जीवन स्थितियों की तलाश। आवश्यक नहीं कि सिर्फ धार्मिक उत्पीड़न के कारण ही लोग विस्थापित होते हैं।

सिर्फ विस्थापन के लिए धार्मिक उत्पीड़न को ही कारण मान लिया जाए तो इसी तर्क के आधार पर यह मानना पड़ेगा कि जितने हिंदू भारत से विस्थापित होकर अमेरिका, कनाडा ऑस्ट्रेलिया या यूरोपीय देशों में बस रहे हैं वह सभी धार्मिक रूप से उत्पीड़ित लोग हैं। यदि ऐसा हो जाता है तो इस उत्पीड़न की जिम्मेदारी क्या वर्तमान सरकार लेने के लिए तैयार है?

बॉलीवुड अभिनेता अक्षय कुमार भी भारत से विस्थापित होकर कैनेडियन नागरिक हो चुके हैं। इसी प्रकार नीरव मोदी, मेहुल भाई चौकशी, विजय माल्या आदि भारत से विस्थापित हिंदुओं की एक लंबी फेहरिस्त है... यानी कि विस्थापित होने का एक कारण यह भी है कि लोग अपने देश में देशद्रोह करते हैं, गद्दारी करते हैं, चोरी करते हैं, बेईमानी करते हैं और उसके बाद इस प्रकार से कमाए हुए धन का उपभोग करने के लिए दूसरे देश में भी चले जाते हैं।

नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 देश को धर्म के आधार पर बांटने का एक सुविचारित यत्न भी है। देश का हित देश को बांटने में नहीं होता है- देश को एकजुट करने में होता है। देश का हित फर्जी समस्याएं पैदा करके, आमजन को उस में उलझा देने में नहीं होता है। देश का हित होता है -जो असली समस्याएं हैं उनकी आंखों में आंखें डाल कर उनको हल करने का प्रयास करना।

देश की अभी असली समस्याएं हैं- अशिक्षा, बेरोजगारी, भुखमरी,आर्थिक पतन, रोजगार विहीन फर्जी विकास, चिकित्सा के अभाव में बीमारी से मरते हुए लोग, आवास के अभाव में अमानवीय परिस्थितियों में जीने को विवश लोग, भयभीत और असुरक्षित लोग, भयभीत और असुरक्षित न्यायपालिका... अंतहीन समस्याएं हैं।

बैलट बॉक्स का पापुलर सपोर्ट किसी भी राजनीतिक दल को या राजनीतिक प्रतिनिधियों को अल्ट्रा वायरस कृत्य के लिए अधिकृत नहीं करता। चाहे कार्यपालिका हो- न्यायपालिका हो या विधायिका हो सबको संविधान के निर्देशों के हिसाब से ही कार्य करना होगा। यही राजधर्म है, यही देश धर्म है, यही लोक धर्म है और यही राष्ट्रधर्म है। इसके विरुद्ध जाना ही देशद्रोह है- चाहे कोई भी क्यों न जा रहा हो।

मस्या उस सोच से है जो यह मानकर चलती है कि इस देश में कोई नागरिक नहीं है और कोई नागरिक धर्म नहीं है। वह यह मानते हैं कि हर व्यक्ति एक वोटर है और किसी न किसी पार्टी का सपोर्टर है। वोटर और सपोर्टर से बड़ा नागरिक है- नागरिकता बोध है -नागरिक धर्म है और अपने इस प्यारे देश की खुशहाली और तरक्की का नजरिया है, जो किसी भी पार्टी से निरपेक्ष हो सकता है और होना ही चाहिए।

ह कैसा भारत बनाना चाहते हैं आप जहां हर नागरिक को आप वोटर और सपोर्टर में तब्दील कर देना चाहते हैं। नागरिकता बोध से युक्त नागरिकों के निर्माण पर जोर देना ही सच्ची देशभक्ति है इस या उस पार्टी के पीछे झंडा बैनर लेकर मुर्दाबाद जिंदाबाद करने से कोई देशभक्त नहीं हो जाता है। सच्चे नागरिकता बोध से युक्त व्यक्ति ही सही अर्थों में देशभक्त हो सकता है, जो आपके विचारों से सहमत ना हो, उसके ऊपर किसी अमुक पार्टी के समर्थक होने का लेबल लगा देना बहुत ही घृणित बात है और गैर लोकतांत्रिक बात है।

हे नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 के समर्थको! आपसे निवेदन है एक बार नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 पर पुनः गौर फरमायें - इसमें कहीं भी 'अल्पसंख्यक' शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है- ना ही गृहमंत्री द्वारा प्रस्तुत 'स्टेटमेंट आफ ऑब्जेक्ट्स एंड रीजंस' में इस बात का कोई उल्लेख किया गया है कि भारत सरकार के पास कोई अध्ययन है, जिसमें वह पता कर सकें कि कितने लोग धार्मिक उत्पीड़न के शिकार होकर भारत में शरण लेने के लिए आए हैं।

सिर्फ विस्थापित होकर आना ही पर्याप्त नहीं है। क्या वे धार्मिक उत्पीड़न के कारण आए हैं? ऐसा कोई अध्ययन या आंकड़े हमारे गृहमंत्री के पास है? भारत सरकार के पास है? सिर्फ यहां आ जाने को ही धार्मिक उत्पीड़न के कारण आना मान लिया जाए क्या यह उचित है?

ब तो इसके भी आंकड़े निकालिए कि प्रतिवर्ष कितने हिंदू भारत से विस्थापित होकर अमेरिका में स्थाई रूप से रहने के लिए चले जाते हैं, कनाडा ब्रिटेन या विभिन्न ने यूरोपीय देशों में चले जाते हैं, तो क्या इसी तर्क पद्धति के आधार पर उनको भी धार्मिक उत्पीड़ित लोग मान लिया जाए?

वे लोग, जो नागरिकता संशोधन अधिनियम के मामले में हिंदू- मुसलमान करके खुश हैं उनको यह समझना चाहिए कि यह संशोधन अधिनियम भारत के संविधान को, भारत के लोकतंत्र को और भारतीय समाज की मूल आत्मा को पिछले दरवाजे से चरणबद्ध तरीके से विफल करने का एक सशक्त प्रयास है, हमें इस षड्यंत्र को समझना चाहिए, विभेदकारी शक्तियों को पहचानना चाहिए और अपनी भूमिका को चिन्हित करना चाहिए- जिससे कि हम अपने इस प्यारे देश के समाज को, उसकी मूल आत्मा को, उसके लोकतंत्र को और उसके संविधान की रक्षा कर सकें।

अंत में नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 पर फेसबुक कीमेरी एक पोस्ट पर मित्र नारायण लाल के द्वारा कई सवाल पूछे गए वह सवाल बहुत महत्वपूर्ण हैं और एक हद तक प्रातिनिधिक भी। अतः मेरे तथा नारायण लाल के बीच हुए संवाद का पूरा विवरण मैं यहां दे रहा हूं :-

Narayan Lal : क्या 'स्टेटमेंट आफ ऑब्जेक्ट्स एंड रीजंस' कानून का हिस्सा होता है?

इसे हटाएँ या छिपाएँ?

Rakesh Gupta : हां होता है लेकिन बहुत कठोर अर्थो में नहीं।

Narayan Lal : क्या यह माना जाये कि नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 में 'धार्मिक उत्पीड़न' शब्द शामिल है?

Narayan Lal : क्योंकि यह शब्द सिर्फ ऑबजेक्ट्स एंड रीज़ंस में ही है।

Rakesh Gupta : व्याख्या के लिहाज से और लागू करने के लिहाज से यह धार्मिक उत्पीड़न शब्द इस कानून का अनिवार्य हिस्सा ही माना जाएगा, क्योंकि इस संशोधन अधिनियम का मुख्य आधार यही है।

Narayan Lal : जी, धन्यवाद।

Narayan Lal : समझने के लिए Rakesh Gupta जी, मेरा सवाल है कि वर्तमान संशोधन से पूर्व क्या यह कानून उन लोगों (जिन्हें इस संशोधन के द्वारा चिन्हित किया गया है) को नागरिकता देने में सक्षम नहीं था?

Rakesh Gupta : भारत का नागरिकता अधिनियम 1955 इस अर्थ में पूर्णतः सक्षम था .यह संशोधन अधिनियम ना सिर्फ अनावश्यक है बल्कि विभेदकारी और संविधान विरोधी भी है।

Narayan Lal : संविधान विरोधी एवं विभेदकारी का आधार? अनुच्छेद 14, प्रस्तवना या कुछ और है?

Rakesh Gupta : अनुच्छेद 14

Narayan Lal : कुछ लोग प्रस्तावना को आधार बता रहे हैं, वे कहां तक सही हैं?

Rakesh Gupta : प्रस्तावना भी है अनुच्छेद 21 भी है अनुच्छेद 14 भी है, लेकिन प्रस्तावना को किसी को किसी कोर्ट आफ लॉ के द्वारा लागू नहीं करवाया जा सकता है लेकिन अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 सरकार के सभी अंगों यानी विधायिका कार्यपालिका और न्यायपालिका के ऊपर बाध्यकारी प्रभाव रखते हैं।

Narayan Lal : बहुत बढ़िया राकेश जी, अगर इजाज़त हो तो एक प्रश्न और करूं?

Rakesh Gupta : जी जरूर।

Narayan Lal : कुछ लोगों का प्रश्न है कि यदि आर्टिकल-14 : समानता का अधिकार में कहा गया है कि, "राज्य किसी नागरिक के खिलाफ सिर्फ धर्म, मूल, वंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई भेद नहीं करेगा." तो हिंदू विवाह अधिनियम और मुस्लिम पर्सनल ला जैसे कानून क्यों मौजूद हैं? क्या ये विभेदकारी नहीं हैं?

Rakesh Gupta : "नागरिक" स्थान पर "व्यक्ति" शब्द लिखा हुआ है।

Narayan Lal : चलिये हम "व्यक्ति" ही मान लेते हैं, फिर? इसके बाद प्रश्न की वैधता पर कोई असर? यदि असर पड़्ता हो तो कृपया स्पष्ट करें, नहीं तो उत्तर की अपेक्षा करता हूँ।

Rakesh Gupta : कोई भी पर्सनल ला किन्हीं विशिष्ट समूहों के अपने रीति-रिवाजों को मानने की स्वतंत्रता प्रदान करने से संबंधित हैं, लेकिन कोई भी पर्सनल लॉ उसी हद तक संवैधानिक हो सकता है, जिस हद तक वह भारत के संविधान में वर्णित मौलिक अधिकारों के विरुद्ध ना जाता हो और इस बात का प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 13 में स्पष्ट रूप से किया गया है।

Rakesh Gupta : जब भी कोई ऐसा पर्सनल ला बनाया जाता है, जोकि व्यक्ति के संविधान प्रदत्त अधिकारों का उल्लंघन करता है या उनको सीमित करता है तो उस हद तक वह असंवैधानिक हो जाता है और संवैधानिक रूप से वह बने रहने योग्य नहीं है। इस मामले में कांग्रेस पार्टी की सरकारों का यहां तक कि वामपंथियों का भी नजरिया चयनात्मक रहा है, जिसके लिए उनके ऊपर तुष्टीकरण करने का आरोप लगता रहा है और यह आरोप एक हद तक सही भी है बिना पर्सनल लॉ को खत्म किए संविधान के द्वारा व्यक्ति की गरिमा को स्थापित करने के सर्वाधिक महत्वपूर्ण लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया जा सकता है। क्योंकि सत्ता चाहे व्यक्ति की हो चाहे परिवार की हो चाहे समूह की हो चाहे धर्म की हो, चाहे जाति की हो, हर तरह की सत्ता व्यक्ति की गरिमा का हनन ही करती है और यह संविधान के द्वारा स्वीकार्य नहीं है।

Narayan Lal: यानि जब तक ये पर्सनल ला मौजूद हैं तब तक इस नागरिकता संशोधन को असंवैधानिक ठहरा पाना कठिन है?

Rakesh Gupta : ऐसा नहीं है एक गलती दूसरे गलती को सही साबित करने का कोई प्रमाण पत्र नहीं होता है। आपका तर्क वैसे ही है जैसे कोई बिना टिकट यात्रा करते हुए पकड़ा गया व्यक्ति या कहें कि मेरा बिना टिकट यात्रा करना तब तक सही है जब तक सभी बिना टिकट यात्रियों को आप पकड़ कर जेल में नहीं डाल देते हैं।

Narayan Lal : ये बात आपकी बिल्कुल सही है, लेकिन इसी बीच एक सवाल और पैदा हुआ कि अनुच्छेद 13 के तहत यह संशोधन वैध क्यों नहीं हो सकता?

Rakesh Gupta : नागरिकता संशोधन अधिनियम अनुच्छेद 13 के तहत वैध इसलिए नहीं हो सकता है, क्योंकि यह संविधान में वर्णित अनुच्छेद 14 एवं अनुच्छेद 21 में दिए गए मौलिक अधिकारों के विरुद्ध है।

Narayan Lal : जी, आपसे बात करके बहुत सी जानकारियां प्राप्त हुईं, धन्यवाद।

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