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दुनिया में तब्लीगी जमात के अलावा कोई भी संगठन नहीं है, जो बिना किसी मीडिया, प्रचार-प्रसार के 50 लाख से एक करोड़ लोग इकट्ठा कर ले….

वरिष्ठ पत्रकार अब्दुल वाहिद आजाद से जानिये क्या है तब्लीगी जमात, क्या हैं उसकी खासियतें और खामियां…

तब्लीगी जमात एक खालिस इस्लामी धार्मिक संगठन है। इसका सियासत से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। ये किसी भी सियासी जलसे जुलूस, तहरीक या प्रोटेस्ट में यकीन नहीं करती। न शामिल होती है, न हिमायत करती है।

ये मुस्लिम समाज के किसी आर्थिक, शैक्षणिक या सांस्कृतिक गतिविधियों में भी शामिल नहीं होती।

ये सिर्फ और सिर्फ इस्लाम का प्रचार मुसलमानों (हिंदुओं में नहीं) के बीच करती है। मुसलमानों को पक्का मुसलमान बनाने का काम करती है।

खूबियां क्या है?
दुनिया का सबसे अमन पसंद संगठन… (दुनिया में मुसलमानों के जितने भी संगठन हैं, अगर उनमें किसी एक संगठन को सबसे अमनपंसद संगठन का तमग़ा दिया जाएगा तो वो होगा- तब्लीगी जमात (इस बात पर मुसलमानों के सभी संप्रदाय एक मत होंगे।) दुनियाभर में मुसलमानों की सबसे डिसिपिलिंड ऑर्गेनाइजेशन है।

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लॉ ऑफ लैंड पर सबसे ज्यादा अमल करने वाली तंजीम है। (देश या दुनिया में किसी भी तरह के अपराध में तब्लीगी जमात के लोग शून्य के बराबर होंंगे।) दुनिया में मुसलमानों का सबसे बड़ा संगठन है।

भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश का कोई कोना नहीं होगा, जहां इस संगठन के सदस्य नहीं होंगे। दुनिया के ज्यादातर देशों में इसके सदस्य हैं।

दुनिया में तब्लीगी जमात के अलावा कोई भी संगठन नहीं है, जो बिना किसी मीडिया, प्रचार-प्रसार के 50 लाख से एक करोड़ लोग इकट्ठा कर ले।

हर साल ढाका के करीब में इसका सालाना इज्तेमा होता है- जिसमें 50 लाख से एक करोड़ की भीड़ इकट्ठा होती है। अभी दो महीने पहले नेपाल में इसका बड़ा इज्तेमा हुआ है।

यह संगठन किसी चंदे पर निर्भर नहीं है, अपना पैसा लगाते हैं, अपने पैसा से जाते हैं। न चंदा, न मदद, सारा खर्चा अपनी पॉकेट से।

खराबी क्या हैं?
ये एक शांतिप्रिय कट्टर संगठन है, अपने संगठन के बड़ों की बातों के अलावा किसी दूसरों की बात नहीं सुनते, नहीं मानते, दूर भागते हैं।

इसके सदस्यों में बड़ी तादाद मुसलमानों के कम पढ़े-लिखे तबके की है। हालांकि, इससे बड़ी तादाद में बिजनेसमैन, इंजीनियर, डॉक्टर और साइंटिस्ट भी जुड़े हए हैं।

ख़ुशू-ओ-ख़ुज़ूअ में इस संगठन का सानी नहीं, लेकिन अक्ल के मारे होते हैं, दुनियावी समझ में लकवाग्रस्त होते हैं। दुनियावी मामले में भी अपने बड़ों की बात पर ही अमल करते हैं। इस्लाम की असल रुह के उलट धर्म के सामने दुनिया को बहुत ही कमतर मानते हैं।

एटमी साइंसदान बनने से ज्यादा तरजीह पैखाने जाने की दुआ याद करने को देते हैं। शायद ये बात मुश्ताक अहमद यूसुफी नहीं अपने तंज में कही है।

आम मुस्लिम संगठनों से कैसे अलग है?
आम मुस्लिम तंजीम आसानी से सत्ता के हाथों बिक जाती हैं। झुक जाती हैं या झुका दी जाती हैं- तब्लीगी कभी नहीं बिकते, नहीं झुकते हैं। बल्कि सत्ता की परवाह ही नहीं करते।

आम मुस्लिम संगठन सियासी पार्टियों की रखैल की तरह होते हैं- कभी इस गोद में बैठते हैं, कभी उस गोद में बैठते हैं- 80 साल की तारीख में तब्लीगी जमात कभी किसी की रखैल नहीं बनी।

आम मुस्लिम संगठन- किसी खास संप्रदाय, सियासी मकसद के लिए होते हैं, तब्लीगी जमात का संबंध एक खास संप्रदाय से है, लेकिन संप्रदाय की राजनीति से काफी दूर है।

आम मुस्लिम संगठन के कारकुन या रहनुमा जब बात करते हैं तो उनमें तसन्नु (दिखावा और तकब्बुर) की बू आती है, लेकिन जब तब्लीगी बात करते हैं तो अपने दुश्मन का दिल जीत लेते हैं।

आम मुस्लिम संगठन चंदे की रकम से बिरयानी उड़ाते हैं, लेकिन तब्लीगी अपने पैसे से किफायतशाअरी के साथ जीते हैं।

(अब्दुल वाहिद आजाद ने यह विचार अपनी फेसबुक वॉल पर व्यक्त किये थे, वहीं से साभार)


Edited By :- Janjwar Team