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लड़कियों के साथ आखिर ऐसा क्या होता है कि एक उम्र के बाद नहीं जा पातीं स्कूल

Prema Negi
17 Jan 2020 5:52 AM GMT
लड़कियों के साथ आखिर ऐसा क्या होता है कि एक उम्र के बाद नहीं जा पातीं स्कूल
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file photo

किशोर लड़कियों से बातचीत पर साक्ष्य आधारित इस सर्वे में शामिल हैं देशभर की 74,000 लड़कियां, इससे पता चलते हैं लड़कियों के स्कूल जल्दी छोडने के कारण, उनके सामने आने वाली बाधाएँ और आगे का रास्ता...

रेचल वाइल्डर

राष्ट्रीय शिक्षा नीति का जो मसौदा इस जून में जारी किया गया है, उसमें 3-18 आयु के सभी बच्चों तक मुफ़्त और अनिवार्य शिक्षा को बढ़ाने की बात की गई है। साथ ही शिक्षा के अधिकार (राइट टू एडुकेशन) को भी आठवीं कक्षा के बजाय 12वीं तक लागू करने को कहा गया है। इसमें एक जेंडर समावेशी कोश (जेंडर इंक्लूसिव फ़ंड) बनाने की भी बात है, जिसका मकसद ‘स्कूली शिक्षा में लड़कियों की 100 फीसदी भागीदारी’ को सुनिश्चित करना है।

स लक्ष्य को पाना मुश्किल नहीं है। प्राथमिक दर्जे में भारत ने नामांकन दर में ऊंची छलांग लगाई है। साल 2015-16 में प्राथमिक दर्जे में लड़कियों की नामांकन दर 95 फीसदी रही जोकि पिछले दशक में 81 फीसदी थी।

सली चुनौती माध्यमिक दर्जे की शिक्षा पर होती है। माध्यमिक स्तर पर ही सबसे ज्यादा नामांकन दर में गिरावट आती है जबकि इस समय में ही लड़कियों की शिक्षा के लाभ दिखने शुरू होते हैं जैसे- अच्छा कमाने की क्षमता का विकास, शादी में देरी,बेहतर सेहत और अपने फैसले खुद लेने की योग्यता (एजेंसी) का विकास।

साल 2016-17 में केसी महिंद्रा एडुकेशन ट्रस्ट और नंदी फ़ाउंडेशन ने किशोर लड़कियों (टीनेज गर्ल्स)पर पहला राष्ट्रीय प्रतिनिधि सर्वेक्षण किया। हमारी टीम ने यह टीन एज गर्ल्स (टीएजी) सर्वे दो अहम तथ्यों को मद्देनज़र रखते हुए शुरू किया था; पहला, भारत में किशोरियों के लिए साक्ष्य-आधारित (एविडेन्स बेसेड) कार्यक्रमों और नीति की सख़्त जरूरत है। दूसरा, खासकर इस आयु समूह के लिए हमारे पास राष्ट्रीय स्तर के आंकड़े नहीं हैं। भारत की 8 करोड़ किशोर लड़कियां देश का भविष्य निर्धारित करेंगी और ऐसे में बहुत जरूरी है कि हम उनकी अनूठी चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित कर उन्हें इससे लड़ने में कामयाब बनाए और यह तभी संभव हो सकता है, जब हम उन्हें समझें।

मारे टीएजी सर्वेक्षणकर्ताओं ने देश के सभी राज्यों से प्रतिनिधि सैंपल के आधार पर 74,000 लड़कियों से बातचीत की। शिक्षा के उनके अनुभवों की एक विस्तृत तस्वीर सामने लाने के लिए हमने लड़कियों से उनकी वास्तविकताओं और आकांक्षाओं के बारे में बात की।

स सर्वे के लिए सुखद ख़बर यही थी कि उनमें से 80 फीसदी किशोरियाँ पढ़ रही थीं। इसने हमारा ध्यान उनकी सामने आने वाली अड़चनों की तरफ भी खींचा। हम यही उम्मीद करते हैं कि,यह समझ पाना कि यह लड़कियां कौन हैं, कहाँ रहती हैं, और स्कूल क्यों छोड़ती हैं; नीति निर्माताओं और लागू करने वालों को उचित जगह पर उचित समाधान की तरफ बढ़ने की प्रेरणा दे सके।

Picture courtesy: Naandi Foundation

वो कौन लड़कियां थीं जिन्होंने स्कूल जल्दी छोड़ दिया?

मैं यहाँ उन लड़कियों पर केंद्रित रहूँगी जो या तो कभी स्कूल गईं ही नहीं या फिर जिन्होंने 12वीं कक्षा से पहले स्कूल छोड़ दिया। माध्यमिक स्तर पर नामांकन दर के गैप को खत्म करने के लिए इस समूह को समझना और समर्थन देना बहुत अहम है। 12वीं के पहले स्कूल छोड़ने (ड्रॉप आउट) की दर का उचित अनुमान लगाने के लिए इस विश्लेषण में केवल 18-19 वर्ष की लड़कियां शामिल हैं। कई किशोरियाँ अभी भी कक्षा 11वीं या उससे नीचे पढ़ाई कर रहीं हैं।

म्र बढ़ने के साथ-साथ स्कूल जाने वाली किशोर लड़कियों का प्रतिशत कम होता जाता है। 18-19 वर्ष उम्र आने तक,एक चौथाई से अधिक लड़कियां या तो कभी स्कूल नहीं गईं (4.4 फीसदी) या फिर 12वीं से पहले ही पढ़ाई छोड़ चुकी थीं(22.2 फीसदी)। जो लड़कियां कक्षा 12वीं तक नहीं पहुँच पाईं, वो असंगत तौर पर निम्न आय वाले परिवारों और ग्रामीण क्षेत्रों से थीं। उनमें से 16 फीसदी अनुसूचित जनजातियों से थीं। उनसे अधिक शिक्षित समकक्षों की तुलना में यह आंकड़ा 9 फीसदी था।

12वीं तक न पहुँच पाने वाली लड़कियां (पांच आय समूहों (क्विन्टाइल) के अनुसार प्रतिशत)

स्रोत: टीएजी सर्वे 2016-17 | पांच आय समूहों (क्विन्टाइल)में 18-19 साल की लड़कियों का प्रतिशत जो या तो कभी स्कूल नहीं गईं या फिर जिन्होंने 12वीं से पहले स्कूल छोड़ दिया।

भारत में क्षेत्रों के अनुसार इस समस्या की गहराई भी अलग-अलग है। भारत के उत्तरी-मध्य क्षेत्र में स्थिति बहुत चौका देने वाली है। मध्य प्रदेश और ओडिसा में आधी लड़कियां 12वीं तक नहीं पहुँच पाती हैं।

स्रोत: टीएजी सर्वे 2016-17। 18-19 साल की लड़कियों का प्रतिशत जो या तो कभी स्कूल नहीं गईं या फिर 12वीं से पहले स्कूल छोड़ दिया (राज्यवार प्रतिशत)

इसके अलावा, 12वीं तक पढ़ाई न कर पाने वाली लड़कियां ज़्यादातर कम पढे-लिखे परिवारों से आती हैं। 35 फीसदी लड़कियों के पिताओं ने कभी स्कूल का मुंह भी नहीं देखा था। जबकि जिन लड़कियों ने पढ़ाई जारी रखी, उनमें से मात्र 15.6 फीसदी के पिताओं की कोई स्कूली शिक्षा नहीं थी।

किशोरियों की माताओं की शिक्षा के स्तर में और अधिक अंतर था जो बच्चों की शैक्षिक उपलब्धि मेंउनकी माताओं की भूमिका होने के साक्ष्यों के अनुरूप है।

स्रोत: टीएजी सर्वे 2016-17. 12वीं तक न पहुँचने वाली और पहुँचने वाली लड़कियों की माताओं की शिक्षा का स्तर।

12वीं तक लड़कियों को पहुँचने में क्या बाधाएँ हैं?

आर्थिक समस्या (38 प्रतिशत)

लड़कियों ने अपने स्कूल छोड़ने का सबसे सामान्य कारण माता-पिता के खराब वित्तीय हालत बताए, जिसका मतलब हो सकता है कि माता-पिता स्कूली खर्चे जैसे किताबें, स्कूल आने-जाने का खर्च नहीं उठा सकते हैं या फिर उन्हें अपनी बेटियों से आर्थिक सहयोग की जरूरत पड़ती है। जो लड़कियां अपने माता-पिता के आर्थिक हालत के कारण 12वीं तक नहीं पहुँच उनमें से 45 फीसदी ने कहा कि उन्होंने कमाने के लिए काम किया। जबकि जो लड़कियां 12वीं तक पहुंची, उनमें ऐसा कहने वाली लड़कियों का प्रतिशत 28 रहा।

सामाजिक मानदंड (24 प्रतिशत)

12वीं से पहले स्कूल छोड़ने वाली हर चार में से एक लड़की ने कहा कि उसके स्कूल छोड़ने की वजह उसका लड़की होना था। लड़कियों पर लागू किए गए सामाजिक मानदंड (जेंडर बेसेड स्टैंडर्ड) जैसे- घरेलू काम करना या भाई-बहनों की देखभाल करना या फिर लड़की की पढ़ाई के लिए बने समाज के नियमों का पालन करना इनमें शामिल थे। 61 फीसदी लड़कियों ने माना कि उनके समाज में पढ़ाई के लिए लड़कों को ज्यादा मौके हैं, जबकि मात्र 10 फीसदी ऐसा सोचती थीं कि उनके समाज के लड़के या पुरुष भी लड़कियों या महिलाओं जितना घरेलू काम कर सकते हैं।

सेहत और परिवार की चुनौतियाँ (20 प्रतिशत)

12वीं से पहले स्कूल छोडने वाली हर पाँच में से एक लड़की ने बीमारी या दिव्यांगता(खुद या परिवार के किसी सदस्य की), प्रवसन (माइग्रशन), माता-पिता का ना होना या फिर किसी आपात स्थिति को जिम्मेदार ठहराया।

स्कूल तक की दूरी (15 प्रतिशत)

इन लड़कियों का कहना था कि आसपास एक अच्छे स्कूल का न होना भी उन्हें शिक्षा से दूर रखता है। यह कारण बताने वाली 90 फीसदी लड़कियां ग्रामीण क्षेत्रों से थीं। दरअसल, लड़की के पड़ोस में स्कूल की संभावना उसके बड़े होने के साथ तेज़ी से कम होती जाती है। हमारे देश में जितने 11-12वीं पढ़ने के लिए स्कूल हैं, उससे 14 गुना से अधिक 1-5 कक्षा तक के स्कूल हैं।

पढ़ाई से वास्ता खत्म (11 प्रतिशत)

स्कूल छोडने वाली लड़कियों में से 6 फीसद ने कहा कि उनको आगे पढ़ने में कोई रुचि नहीं। वहीं 5 फीसदी ने इसलिए छोड़ा क्योंकि वे या तो परीक्षा में फेल हो गईं थी या स्कूल उनके लिए बहुत मुश्किल था।

शादी (4 प्रतिशत)

18-19 उम्र की 12वीं के पहले स्कूल छोड़ने वाली लड़कियों में 15 फीसदी की शादी हुई थी। वहीं उनकी सहपाठी जो आगे पढ़ाई जारी रख सकी,उनमें 8 प्रतिशत कि ही शादी हुई थी। हालांकि केवल 4 फीसदी लड़कियों ने कहा कि उन्होंने पढ़ाई शादी या मँगनी होने की वजह से छोड़ी है।

स्कूल में 100 फीसदी लड़कियां: एक रास्ता

12वीं कक्षा तक सभी लड़कियों के नामांकन तक पहुँचने के लिए हमें उनके साथ काम करना होगा जो सबसे ज्यादा संघर्ष कर रहें है;जैसे-कम आमदनी वाले समुदायों की लड़कियां, कमजोर शैक्षिक स्थिति वाले परिवार खासकर राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, और ओडिसा के ग्रामीण इलाकों में। इसके अलावा जो लड़कियां जोखिम में हैं उन्हें ज्यादा मजबूत सहारे और व्यवस्थापन की जरूरत है इनमें बीमारी और दिव्यांगता के साथ जूझ रही लड़कियां, आपात स्थिति में या फिर प्रवास करने वाली परिवार की लड़कियां शामिल हैं।

धिकांश स्कूल से बाहर होने वाली लड़कियों ने कहा कि उन्होंने आर्थिक दिक्कतें या जेंडरगत सामाजिक अपेक्षाएं इसके लिए जिम्मेदार हैं। यह संकेत देता है कि नगद हस्तांतरण (कैश ट्रांसफर) और सामाजिक मानदंड में बदलाव लाने वाले प्रयास जैसे उपाय लड़कियों की शिक्षा के लिए एक अनुकूल वातावरण बनाने में मददगार हो सकेंगे। हम माध्यमिक स्कूलों की संख्या बढ़ाने की भी वकालत कर सकते हैं जैसा कि सर्वशिक्षा अभियान के तहत प्राथमिक विद्यालयों को बढ़ाने की गई थी।

निश्चित तौर पर, हमारा काम सिर्फ लड़कियों के कक्षा तक पहुंचने पर खत्म नहीं हो जाता है। उनकी शिक्षा की गुणवत्ता और कक्षा 12 को उत्तीर्ण करने पर उनके सामने सार्थक विकल्पों का होना कहीं ज्यादा अहम है। फिर भी, स्कूल में इनकी मौजूदगी एक पहला और जरूरी कदम है-एक ऐसा कदम जिसे संसाधनों और दृढ़ निश्चय के साथ हमें कल नहीं बल्कि आज ही उठाना होगा।

नोट : 18-19 वर्ष की लगभग 11.5 प्रतिशत लड़कियां अभी 11वीं या फिर उससे नीचे पढ़ रही हैं, इसलिए कक्षा 12 तक नहीं पहुँचने का अनुपात यहाँ दिये गए अनुपात से कुछ अधिक हो सकता है।

(रेचल वाइल्डर का यह लेख मूल रूप से इंडिया डेवलपमेंट रिव्यु पर प्रकाशित हुआ था और यहाँ देखा जा सकता है।)

(रेचल वाइल्डर Naandi Foundation की पॉलिसी और स्ट्रेटेजी सेल में काम करती हैं। और फ्लोरिडा विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र और अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में स्नातक हैं। वह मुख्य तौर पर लिंग, शिक्षा और आर्थिक विकास के मसलों पर काम कर रही हैं।)

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