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मरते पर्यावरण का 'दिवस' मनाना प्रकृति के साथ एक प्रचंड मजाक

Prema Negi
5 Jun 2019 6:41 AM GMT
मरते पर्यावरण का दिवस मनाना प्रकृति के साथ एक प्रचंड मजाक
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केंद्र में बैठी हरेक सरकार गंगा की सफाई के दावे करती है, और इसे पहले से भी अधिक मैली कर जाती है (file photo)

जल प्रदूषण का आदि और आरम्भ तो गंगा नदी पर ही होता है, मगर कचरे का अब नाम लेना भी देश में गुनाह है, क्योंकि भारत अब स्वच्छ हो गया है...

महेंद्र पाण्डेय, वरिष्ठ लेखक

5 जून को मनाया जाने वाल विश्व पर्यावरण दिवस महज एक दिखावा है। इस वर्ष का विषय वायु प्रदूषण है और हम इसे कितना नियंत्रित कर पाते हैं यह सबको पता है। हमारे देश में तो पर्यावरण कभी मुद्दा रहा ही नहीं है। जब भी इसकी चर्चा होती है, संस्कृत के कुछ श्लोक सुना दिए जाते हैं और हमारे परंपरा और संस्कृति की दुहाई दी जाती है। बस, इससे हमारे वर्तमान का पर्यावरण सुधर जाता है।

पर्यावरण दिवस को दरअसल मानव दिवस के तौर पर मनाना चाहिये क्योंकि हम मनुष्य किसी और प्रजाति के बारे में तो कभी सोचते ही नहीं। हमें तो हरेक जगह कृषि, आबादी, उद्योग और खानें चाहिए। इन सबसे जगह बचाती है तो इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट खड़े हो जाते हैं। आज हालत यह हो गयी है कि मानव के दखल से मुक्त भूमि पर कोई जगह ही नहीं है। मनुष्य पूरी पृथ्वी पर इस कदर फ़ैल गए हैं कि अन्य प्रजातियों के लिए जगह ही नहीं रह गयी है।

हमारी नजर में पर्यावरण कैसा है, इसका एक अच्छा उदाहरण हाल में ही देखने को मिला है। मुंबई में मेट्रो के काम के दौरान पर्यावरण को बहुत क्षति पहुँच रही है और अब नागरिक भी पर्यावरण की क्षति को लेकर महाराष्ट सरकार और मुंबई मेट्रोपोलिटन रीजन डेवलपमेंट अथॉरिटी (एमएमआरडीए) को कोस रहे हैं।

में ही एमएमआरडीए ने दो पन्ने का एक पत्र जनता के नाम जारी किया है, जिसमें बताया गया है कि यह सही है कि मेट्रो के काम के दौरान पर्यावरण को नुकसान हो रहा है, पर यह नुकसान अस्थाई है और मेट्रो एक हरित (पर्यावरण अनुकूल) परियोजना है।

आप सोचिये, पर्यावरण को अस्थाई नुकसान कैसे हो सकता है? क्या किसी आदमी का मरना अस्थाई नुकसान होता है? इसी तरह किसी पेड़ का काटना या फिर किसी वन्यजीव का मरना अस्थाई कैसे हो सकता है? वायु प्रदूषण और जल प्रदूषण भी अस्थाई नहीं हो सकते। भोपाल गैस काण्ड में भी दुर्घटना घटी थी, गैस का रिसाव अस्थाई था, पर क्या इसके प्रभाव अस्थाई थे? पर, सरकार और तमाम सरकारी संस्थाएं यह सब अस्थाई ही समझती हैं तभी इनका कोई समाधान नहीं निकलता।

दुनियाभर में जहां पर्यावरण की चर्चा में तेजी आयी है, हम अब इसकी बात भी नहीं करते। जब सर्दियां आतीं हैं तब कुछ दिनों तक वायु प्रदूषण की चर्चा कर लेते हैं। पर यह चर्चा भी प्रदूषण के स्त्रोतों से अधिक हवा के दबाव और हवा की गति पर होती है।

जल प्रदूषण का आदि और आरम्भ तो गंगा नदी पर ही होता है। कचरे का अब नाम लेना भी गुनाह है, क्योंकि भारत स्वच्छ हो गया है। शोर दिखता नहीं, इसलिए चर्चा भी नहीं होती।

कुल मिलाकर पर्यावरण दिवस एक बड़ा दिखावा है, जिसमें हम याद करते हैं कि आज के दिन पर्यावरण की बरसी है।

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