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संस्कृति

वो अपनी जान दे देंगे जमीन नहीं

Prema Negi
25 Feb 2019 6:40 AM GMT
वो अपनी जान दे देंगे जमीन नहीं
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रोहतक के युवा कवि संदीप कुमार की तीन कविताएं

बेदखली

वातानुकूलित कमरों में बैठकर

जंगल में रहने वालों को

जंगल बचाने के लिए

जंगल से बाहर करने का

फैसला सुना रहे हैं।

और हुक्मरान-

जो अध्यादेश पर अध्यादेश लाते रहे हैं

चुपचाप दौरे कर रहे हैं

चुनावी रैलियों के।

वो सत्ता के नशे में भूल गए हैं

जिन्हें अपनी जड़ों से

काटने का फैसला लाए हैं

ये बिरसा मुंडा के वारिस हैं

जंगल से बाहर के लोग

इन्हें जंगली कहें, असभ्य कहें

इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता

जब कोई आदिवासियों को

जीवन से काटकर अलग थलग करेगा

ये अपने तीर-धनुष से

उसका सामना करेंगे ही।

ये जंगल के चप्पे-चप्पे से वाकिफ हैं

पैदाईशी गुरिल्ला हैं

और यही कारण है कि आदिवासी इलाके

कभी गुलाम नहीं हुए

और ये भी सच है कि

जंगलों में कभी युद्ध विराम नहीं हुए।

सावधान! पूंजीपतियों के दलालो

वो अपनी जान दे देंगे

मगर नहीं छूने देंगे

आपके हाथों को

जमीन में छुपे खजाने को।

जंगल उनकी संस्कृति है

जंगल उनका जीवन है

जंगल उनका सबकुछ है

वो अपने सबकुछ को

अच्छी तरह बचाना जानते हैं

हमें कश्मीर चाहिए कश्मीरी लोग नहीं

हमें कश्मीर चाहिए

कश्मीरी लोग नहीं

जो तभी संभव हो सकता है

जब वहां ढूंढ—ढूंढ कर

एक एक को कत्ल किया जाए

जो कभी नहीं हो सकता

एक पूरा इतिहास है

हमारी आंखों के सामने

लातिन अमेरिका से लेकर

फिलिस्तीन तक।

इराक, अफगानिस्तान को खत्म करने चला था

दुनिया का बादशाह अमेरिका

परिणाम हम सबके सामने हैं

वह लौट रहा है वापिस अपने सैनिकों के साथ।

अमेरिका के मेहनतकश

निकलते हैं सड़कों पर

युद्ध के खिलाफ

इतिहास सीखने के लिए है

हर चीज करके देखना

बुद्धिमता नहीं, मूर्खता है।

जब मैंने युद्ध के खिलाफ कविता लिखी

जब मैंने युद्ध के खिलाफ कविता लिखी

मुझे पाकिस्तान समर्थक कहा

और फेसबुक से

मेरी हथियारों के पक्ष में लिखी

कविताएं ढूंढकर लाए

मैं अब भी

उस युद्ध के पक्ष में हूं

जो सीमा रेखाओं के लिए नहीं

पेट की भूख

शांत करने के लिए लड़ा जा रहा है

जो युद्ध इसलिए लड़ा जा रहा है

कि हर हाथ को रोजगार हो

जो युद्ध इस लिए लड़ा जा रहा है

कि किसी का शोषण न हो।

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