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इंटरनेट का उपयोग करने वाली एक तिहाई महिलायें ऑनलाइन उत्पीड़न की शिकार

Janjwar Desk
3 July 2021 3:03 AM GMT
इंटरनेट का उपयोग करने वाली एक तिहाई महिलायें ऑनलाइन उत्पीड़न की शिकार
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(ऑनलाइन प्रताड़ना में अश्लील भाषा, यौन हिंसा की धमकी और शारीरिक अंगों की विवेचना शामिल  )

ऑनलाइन प्रताड़ना से तंग आकर 20 प्रतिशत महिलाओं ने सोशल मीडिया का हरेक प्लेटफॉर्म पूरी तरह से छोड़ दिया और 12 प्रतिशत महिलाओं ने इन्टरनेट पर काम करने का अंदाज बदल दिया...

महेंद्र पाण्डेय की टिप्पणी

जनज्वार। पेरिस में संयुक्त राष्ट्र महिला और फ्रांस और मेक्सिको की सरकार द्वारा लैंगिक समानता पर एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय अधिवेशन आयोजित किया जा रहा है। इसकी तैयारियां पिछले दो वर्षों से की जा रही थीं और इसे लैंगिक समानता से सबसे बृहद आयोजन करार दिया गया है। यह आयोजन एक ऐसे दौर में किया जा रहा है, जब कोविड 19 ने महिलाओं को और लैंगिक समानता की उपलब्धियों को दशकों पीछे धकेल दिया है।

इकोनॉमिक इंटेलिजेंस यूनिट की 2021 की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया की इन्टरनेट का उपयोग करने वाली कुल महिलाओं में से एक-तिहाई महिलायें ऑनलाइन उत्पीड़न का शिकार होती हैं, और कम उम्र की महिलाओं में तो यह आंकड़ा 50 प्रतिशत से भी अधिक है।

पेरिस में चल रहे लैंगिक समानता के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के बीच वर्ल्ड वाइड वेब फाउंडेशन के तहत फेसबुक, गूगल, ट्विटर और टिकटोक एक मंच पर आये और एक घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किये, जिसके अनुसार ये सभी अपने प्लेटफॉर्म पर महिल उत्पीड़न रोकने के लिए प्रतिबद्ध हैं। इस घोषणा का स्वागत अनेक पूर्व राष्ट्राध्यक्षों, राजनीतिज्ञ और प्रसिद्ध हस्तियों ने किया है। इन्टरनेट के इस दौर में लैंगिक समानता के लिए महिलाओं को एक सुरक्षित ऑनलाइन माहौल की जरूरत है, और यदि सोशल मीडिया प्लेटफोर्म अपनी प्रतिबद्धता के अनुसार काम करते हैं तो निश्चित तौर पर महिलाओं की दुनिया आसान हो जायेगी।

घोषणापत्र में कहा गया है कि महिलाओं की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए दो महत्वपूर्ण बिंदु हैं – किसी कमेन्ट पर कौन प्रतिक्रिया दे सकता है इसका नियंत्रण सोशल मीडिया का उपयोग करने वाले के हाथ में हो और दूसरा सोशल मीडिया या इन्टरनेट प्लेटफोर्म महिलाओं की शिकायतों को गंभीरता से लेकर उसपर जल्दी कार्यवाही करें। घोषणापत्र के अनुसार इन दोनों बिन्दुओं पर नए सिरे से काम किया जाएगा। इस समय लगभग सभी ऑनलाइन प्लेटफ़ोर्म पर एक इस तरह की समस्याओं की स्पष्ट और प्रभावी रिपोर्टिंग और उस पर कारगर कदम उठाने का अभाव है।

प्लान इन्टरनेशनल नामक संस्था ने दिसम्बर 2020 में 22 देशों की 14000 महिलाओं का सर्वेक्षण किया था। इनकी उम्र 15 वर्ष से 25 वर्ष के बीच थी। इस सर्वेक्षण के अनुसार ऑनलाइन प्रताड़ना से तंग आकर 20 प्रतिशत महिलाओं ने सोशल मीडिया का हरेक प्लेटफॉर्म पूरी तरह से छोड़ दिया और 12 प्रतिशत महिलाओं ने इन्टरनेट पर काम करने का अंदाज बदल दिया।

इस सर्वेक्षण के अनुसार 40 प्रतिशत से अधिक महिलायें ऑनलाइन प्रताड़ना का शिकार बनीं। इस प्रताड़ना में अश्लील भाषा, यौन हिंसा की धमकी और शारीरिक अंगों की विवेचना भी शामिल है। संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2018 में ही सभी देशों को ऑनलाइन महिला उत्पीड़न रोकने के लिए सख्त क़ानून बनाने के लिए कहा था, पर शायद ही किसी देश ने ऐसा क़ानून बनाया।

समाजशास्त्रियों के अनुसार महिलाओं के ऑनलाइन प्रताड़ना के कारण लैंगिक समानता के सारे प्रयास पिछड़ते जा रहे हैं। ऐसी हरकतें महिलाओं के अभिव्यक्ति की आजादी का हनन करती हैं और मानसिक तौर पर कमजोर होती जाती हैं। पश्चिमी देशों में ऑनलाइन प्रताड़ना के बाद महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों का गहराई से अध्ययन किया गया है। जाहिर है, यदि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म गंभीरता से इस समस्या का हल निकालने का प्रयास करते हैं, तब इस डिजिटल युग में महिलाओं का जीवन थोड़ा आसान हो जाएगा।

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