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विमर्श

WhatsApp University के अंधेरे के बीच जुगनू की तरह जलते-बुझते बुद्धिजीवी

Janjwar Desk
1 March 2021 11:13 AM GMT
WhatsApp University के अंधेरे के बीच जुगनू की तरह जलते-बुझते बुद्धिजीवी
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निजी काॅलेज खोलने के नाम पर जब सुप्रीम कोर्ट 11 जजों की बेंच बना सकता है तो नागरिक आज़ादी के आसमान का क्षितिज तय करने के लिए एक बड़ी बेंच क्यों नहीं बनाई जानी चाहिए...

वरिष्ठ लेखक कनक तिवारी का विश्लेषण

जनज्वार। भारतीय नागरिकों को एक उदार लोकतंत्र के संविधान के बावजूद बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर दम घुट रहा सा लगता है। अब तो आलम यह है कि नागरिक ने चुभता हुआ विरोध किया तो उसके पहले भी उसे पुलिस, सीबीआई, इनकमटैक्स, ईडी, एनआईए और हर तरह की दमनकारी सरकारी संस्था के द्वारा दबोच लिए जाने की नाउम्मीदी नहीं करनी चाहिए।

26 जनवरी, 1950 से लागू दुनिया के महत्वपूर्ण लोकतंत्रीय संविधानों में एक भारत का संविधान भी है। उसके दो सबसे बड़े रचयिताओं नेहरू और अंबेडकर ने कहा था संविधान के भाग 3 में दिए गए मूल अधिकार आज़ाद नागरिकों का प्राण तत्व हैं। भरोसा दिलाया था सभी संविधान निर्माताओं ने मानो इतिहास को नर्क के गर्त से निकालकर स्वर्ग की उपजाऊ धरती पर मनुष्यता की फसल लहलहाने की सौगात दे दी गई है।

हुक्काम को लोगों ने हीरा समझा था। वह पानी का बुलबुला निकला। नागरिक आजादी का कैदघर पूरा भारत ही हो गया है। लगता है जनता को ज़म्हूरियत के नाम पर गुलामी का पट्टा उसके गले में बांधने के लिए सरकारें और राजनीतिक नेता अहसान करने की भावना के साथ भी दे रहे हैं।

व्हाटसएप विश्वविद्यालय, इंस्टाग्राम इन्स्टीट्यूशन और फेसबुक प्रपंच से प्रभावित अधकचरी बुद्धि के नौजवान, अवकाशघोषित, पेंशनयाफ्ता तथा अन्य तरह के भी बुद्धिजीवी राजनीतिक ढकोसलों के अंधेरे के बीच जुगनू की तरह जलते बुझते आश्वासनों में अपना भविष्य ढूंढ़ रहे हैं। जिन्होंने आईन बनाया, उन्होंने अंग्रेजों की जेलों में बरसों कैद काटी। कई लाठियों से कुचले गए। कुछ के परिवार बर्बाद हुए।

जिस तरह कड़ाही में दूध गर्म होने के बाद ठंडा होने की प्रक्रिया में उस पर मलाई की पर्त चढ़ जाती है, वैसे ही तीन बरस की मशक्कत में संविधान बनाते बनाते आखिर में राजे-रजवाड़ों के प्रतिनिधि, मोटी फीस वसूलने वाले वकील, रायबहादुर, खान बहादुर, दीवान बहादुर, सेवानिवृत्त जज और नौकरशाह एकजुट होकर संविधान की जनअभिमुखी उमंगों पर सरकारी प्रतिबंधों का चमकीला वर्क चढ़ाकर चले गए। उससे लगता भर है कि कोई महंगी मिठाई है, लेकिन दरअसल उसका स्वाद और असर दोनों कसैला हो गया है।

भारत के लोग तो जानते ही नहीं कि निर्वाचन पद्धति के संदेश के अनुसार वे ही खुद चुने गए प्रतिनिधियों के मार्फत संविधान के निर्माता है। वे मालिक हैं। राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और सबसे निचले स्तर के सरकारी कर्मचारी तक के नागरिक वे ही स्वामी हैं। फिर भी वे सामंती रियाया की तरह नेताओं और अफसरों के सामने रिरियाते हैं। कोर्निश बजाते हैं।

जो पांच साल या कभी कभी उससे कम के लिए भी चुने जाते हैं, वे भारत का इतिहास अपने कंधों पर उठाकर चलने का भरम पालते हैं। बहुत शातिर था अंग्रेज। जाते जाते अपनी बादशाहत की सभी बदगुमानियां हिन्दुस्तान के होने वाले लोकतांत्रिक शहंशाहों की पगड़ी में कलगी बनाकर खोंस गया। अब हालत है कि वोट मांगने तो गिड़गिड़ाते हैं, लेकिन सत्ताधीश बनते ही बदजबानी, बदगुमानी और बदखयाली के चाबुक जनता पर फटकारने लगते हैं।

इन्हीं साजिशों में एक सांप आज़ादी के पहले से जनता को डस रहा था। वह गोरी हुकूमत के खिलाफ किसी को आंदोलन या विरोध करने तो क्या बोलने और सोचने तक की आज़ादी देने से परहेज़ करता था। उसने अपने द्विअर्थी तो क्या बहुअर्थी शब्दों की लचीली परिधि में नागरिक के सामने सारी प्रक्रियाओं को समेटते हुए ऐसे फतवे जारी किए कि मनुष्य होना ही अपने आपमें अंग्रेजी सल्तनत के सामने रीढ़ की हड्डी पर सीधे खड़े होना नहीं रह पा रहा था।

यह समयसिद्ध सत्य है कि भारत के पहले बड़े स्वतंत्रता संग्राम 1857 से लगभग घबराकर अंग्रेज ने खुद को दुनिया के सामने कानूनप्रिय कौम बताने के लिए भारतीय कानूनों में जबरदस्त बदलाव, संशोधन और विनियमन किए। भारतीय दंड संहिता का निर्माता प्रसिद्ध अंग्रेज़ कानूनविद और विचारक मैकाॅले है। उसने भारत की शिक्षा व्यवस्था को भी अंग्रेज़ी सल्तनत के झंडे की बादशाहत के लिए बरबाद किया। फिर भी मैकाॅले को संकोच था, क्योंकि वह प्रबुद्ध व्यक्ति था। उसने भारतीय दंड संहिता में राजद्रोह जैसे खतरनाक और एकतरफा पोषित, घोषित होने वाले अपराध को शामिल नहीं किया। यह तो उसकी टक्कर का दूसरा कानूनविद् जेम्स स्टीफन था जिसने दस बरस बाद भारतीय दंड संहिता में धारा 124-क के जरिए राजद्रोह के अपराध को ब्रिटिश हाउस ऑफ काॅमन्स में शामिल कराया।

यह स्टीफन की उर्वर बुद्धि की घातक फसल है। वह भारतीय धरती पर इसलिए बोई गई कि उसकी अफीम भारतीयों को चटाई जा सके और वे पस्त होकर यह समझ लें कि उन्हें सरकार के खिलाफ कुछ नहीं बोलना है। सरकार के खिलाफ नफरत या अप्रीति की भावना के लिए जनता को भड़काना भयानक अपराध कहा गया लेकिन सरकार के पक्ष में रहते हुए कुछ सरकारी अधिकारियों की खिलाफत करने को अपराध नहीं माना गया।

भारत के पहले मुकदमे बंगोबासी में जोगेन्द्र चंदर बोस को सजा देते चीफ जस्टिस सर कोमर पेथेराम ने कहा कि यदि नागरिक के मन में सरकार के लिए प्रीति नहीं है, तो वही अप्रीति है अर्थात् नफरत है। यदि कोई भीड़ या समूह को सरकार के खिलाफ नफरत करने के लिए भड़का रहा हो, भले ही कोई हिंसक भगदड़ नहीं हो तब भी उसने अप्रीति पैदा कर खुद के ऊपर अपराध आरोपित कर लिया है।

तिलक के प्रसिद्ध मुकदमे में 1895 में जस्टिस स्ट्रेची ने लकीर की फकीर पीटते हुए पुराने फैसले पर निर्भर रहकर तिलक को सज़ा देना मुनासिब समझा। तिलक को तो तीन बार दंडित किया गया और काले पानी तक की सज़ा दी गई। अंग्रेज हुक्काम का तर्क था कि यदि आपके मन में सरकार के लिए प्रीति नहीं है तो जरूर कोई दूसरा विपरीत मनोभाव काम कर रहा होगा जो प्रीति के खिलाफ आपको मनोवैज्ञानिक स्तर पर भड़का रहा हो। वही मनोभाव राजद्रोह के अपराध का गर्भगृह है। फिर आगे बढ़कर अंबा प्रसाद के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट और इलाहाबाद और कलकत्ता हाई कोर्ट के अन्य कई मुकदमों में बार बार अंग्रेजियत की गुलामी की वंदना करते हुए वही लीपापोती की गई।

थक-हारकर आखिर 1898 में संशोधन किया गया। उसे वर्ष 1937, 1948 और 1950 के संशोधनों द्वारा विस्तृत किया गया जो मौजूदा धारा 124-क में शामिल है। कितनी खरतनाक भाषा है जो स्पष्टीकरण 1 में कहती है कि 'अप्रीति पद के अंतर्गत अभक्ति और शत्रुता की समस्त भावनाएं आती हैं।' यह कैसा लोकतंत्र है, जहां सरकार जनता से अपने प्रति भारतीय दंड संहिता का डंडा दिखाकर मोहब्बत करने की मजबूरी पैदा करती है?

कोई भी नागरिक सरकार के प्रति भक्त नहीं होकर भी एक संविधानसम्मत राज्य में स्वतंत्र विचारों के साथ क्यों नहीं आचरण कर सकता? यदि कोई निष्ठावान नहीं है तो वह शत्रु है! यह कैसा फलसफा है जो पढ़ाया जा रहा है और उस पर सुप्रीम कोर्ट की अंग्रेजी बुद्धि समर्थक मुहर लगती जाती है? अजीब है अब इंग्लैंड में ही न तो राजद्रोह का अपराध है और न ही अदालतों की अवमानना। हम बंदरिया बनकर मरा बच्चा छाती से चिपकाए बैठे हैं।

यह साफ है कि संविधान सभा ने राजद्रोह को अभिव्यक्ति की आजादी के प्रतिबंध के रूप में सर्वसम्मत होकर हटा दिया। फिर भी वह भारतीय दंड संहिता की आंत में छुपा बैठा रहा। नागरिक आजादी के समर्थकों ने बार बार सुप्रीम कोर्ट में राजद्रोह जैसी बंदिशों को चुनौती दी। उन्हें कई बार सफलता मिली, जिनमें संविधान बनने के तुरंत बाद 1950 में ही प्रसिद्ध पत्रकार रमेश थापर और आर्गनाइज़र समाचार पत्र ने सफल चुनौतियां दी थीं।

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि दोनों पत्र समूहों को आजादी देने से राज्य की सुरक्षा को कोई खतरा नहीं है, भले ही उससे लोकअशांति पैदा होती हो। लोकअशांति अभिव्यक्ति की आज़ादी के रूप में संविधान के अनुच्छेद 19 (2) में प्रतिबंधित नहीं है। यही वह शब्द है जिसके कारण भारत का संविधान अपने जन्म के पहले वर्ष ही नेहरू प्रशासन में अभिव्यक्ति की आज़ादी को कुचलने के नाम पर संशोधित किया गया और अभिव्यक्ति की आज़ादी के प्रतिबंध के रूप में लोकअशांति के खतरे को शामिल कर लिया गया, बल्कि उसकी संभावना को भी।

यह शब्द अंततः भारतीय सुप्रीम कोर्ट को बहुत भाया और वही राजद्रोह के बुखार नापने का थर्मामीटर बन गया। आर्गेनाइज़र और रमेश थापर के मुकदमों में अन्यथा नागरिक आज़ादी के पैरोकार रहने वाले जस्टिस फज़ल अली ने 'पब्लिक डिसआर्डर' को राज्य की सुरक्षा का एक कारक बताते हुए संविधान की पीठ ठोंकी कि वह प्रतिबंध लगा सकता है। इस वजह से 1951 के संविधान संशोधन के बाद नागरिक आज़ादी पर प्रतिबंध लगाने वाला अनुच्छेद 'लोकव्यवस्था' नामक ढीली ढाली अभिव्यक्ति को प्रतिबंध के रूप में चुपचाप शामिल कर चला गया। हम लोग इक्कीसवीं सदी में उसका दंश भोग रहे हैं।

फज़ल अली ने यह पेंच भी अड़ाया कि संविधान निर्माता नागरिक आज़ादी के प्रतिबंध के रूप में राजद्रोह को रखने या हटाने को लेकर पशोपेश में थे। एक तरफ तो उनके सामने जजों के पुराने फैसले थे जिसमें माना गया था कि लोक व्यवस्था या लोक शांति को यदि खतरा हो तो उसे राजद्रोह माना जाए। दूसरी तरफ ज्यूडिशियल कमेटी के अनुसार भारतीय दंड संहिता में राजद्रोह से लोकअव्यवस्था का कोई संबंध नहीं माना गया। इसीलिए संविधान सभा ने अनुच्छेद 19 (2) में राजद्रोह शब्द तो हटा दिया, लेकिन लोक व्यवस्था और लोक शांति को यदि किसी कृत्य से खतरा है, तो उसे संविधान के पहले संशोधन के जरिए नागरिक आज़ादी के प्रतिबंध के रूप में अंततः शामिल किया गया। जस्टिस फज़ल अली का तत्कालीन परिस्थितियों में अंगरेज़ियत की न्याय बुद्धि से दिया गया यह फैसला भारतीय सुप्रीम कोर्ट पर गहरे से चस्पां हो गया।

राजद्रोह नहीं हटाने के एकमात्र समर्थक संविधान न्यायालय के मुकदमे केदानाथ सिंह में इन सब बातों का पांच सुप्रीम कोर्ट जजों ने विस्तार से उल्लेख किया है। न्यायिक बुद्धि, भाषा की उर्वरता, तर्क के लचीलेपन और आम आदमी को असमंजस में डाल देने वाले कई पड़ाव आते हैं। वहां वह शब्दों की रेलमपेल में फंसकर, जो भी उसके मत्थे मढ़ा गया, उसे स्वीकार कर लेता है।

यही राजद्रोह नामक अपराध पकड़ने वाले थानेदार से लेकर छोड़ने या नहीं छोड़ सकने वाले सुप्रीम कोर्ट के जजों के आकाश तक फैला है। यह सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि राज्य से मतलब उन थोड़े से अधिकारियों से नहीं है, जो हुकूमत चला रहे हैं। लेकिन कानून के द्वारा निर्मित राज्य एक स्थायी, निरंतर और उत्तरोत्तर जिम्मेदारियों वाली संवैधानिक परिकल्पना है। वह किसी भी कृत्य से क्षतविक्षत नहीं हो सकती। भले ही हुक्काम आते जाते रहें, इसलिए राजद्रोह को भारतीय दंड संंहिता में राज्य के खिलाफ होने वाले अपराधों की सूुची में शामिल किया गया है, लोकसेवकों के खिलाफ किए जाने वाले संभावित अपराधों की सूची में नहीं।

यदि किसी के कृत्य द्वारा सरकार को ही खत्म कर देने के आग्रह हों, जिन्हें क्रांति भी कहा जा सकता है, तो वह राजद्रोह की परिभाषा में शामिल होगा। इसके विलोम में यदि कितने भी उत्तेजक शब्दों में सरकार के खिलाफ डिसअप्रोबेशन (नापसंद भी) को अभिव्यक्त करें, लेकिन हिंसक गतिविधियों के लिए लोगों को नहीं भड़काएं, तो उसे राजद्रोह नहीं कहा जा सकता।

दूसरे शब्दों में राज्य के विरुद्ध अप्रीति को अभिव्यक्त करना और सरकार के कई कदमों के खिलाफ इस तरह विरोध करना जिससे जनता की भलाई के कई स्त्रोत उसमें छिपे हों या बेहतर वैकल्पिक वैधानिक सुझाव दिए जाएं और सरकार के खिलाफ कोरी शत्रुता अभक्ति और अलगाव पैदा करने की जिद या जिरह में नहीं की जाए तो उसे राजद्रोह नहीं कह सकते। राज्य सरकार के खिलाफ और अधिकारियों के भी खिलाफ केवल भड़काऊ भाषण देना भी राजद्रोह नहीं है, लेकिन किसी भी सूरत में हिंसा भड़काए जाने या लोक शांति और लोक व्यवस्था को बरबाद कर देने की अनदेखी नहीं की जा सकती।

इस तरह संवैधानिक पेंच फंस गया है। उसकी ओर 1962 के केदानाथ सिंह के फैसले के बाद से आज तक सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर उसे नई राजनीतिक परिस्थितियों के मद्देनजर सुलझाने की कोशिश नहीं की गई है। मौजूदा सरकार ने तो नागरिक के मुंह खोलते ही उस पर राजद्रोह का ठूंठ घुसेड़ने का नायाब रिकाॅर्ड कायम कर लिया है। तीन चौथाई से ज़्यादा मुकदमे अदालतों में इसीलिए टिक नहीं पाते। ज़मानतें हो पाती हैं। आरोपी छूट जाते हैं, लेकिन तब तक उनका और व्यापक भारतीय नागरिक आज़ादी का इतना नुकसान हो चुका होता है जिसकी भरपाई विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका नहीं कर पाती हैं।

वक्त आ गया है जब तय किया जाए कि राज्य की परिकल्पना को जहां नक्सलवादी और आतंकवादी ध्वस्त कर देना चाहते हैं, उससे अलहदा और उससे कमतर और उसके विपरीत यदि नागरिक संविधान के अनुच्छेद 19 (1) के मातहत अभिव्यक्ति और बोलने की आज़ादी के आसमान को अंतरिक्ष तक न्यायससंगत ढंग से फैलाते हैं, तो उन्हें राजद्रोह का कोड़ा फटकारते हुए एक थानेदार के विवेक पर क्यों छोड़ा जाता है? और फिर एक मजिस्ट्रेट के विवेक पर जिनमें से बहुमत ने भारत के संविधान का रचनात्मक पाठ पढ़ा ही नहीं होता है ज़ज्ब करना तो दूर।

लोकतंत्र में तो जनता के द्वारा चुनी गई सरकार का फर्ज़ है कि वह खुद जाकर जनता-नागरिक अधिकार समीकरण का खुलासा करते सुप्रीम कोर्ट में एक बड़ी बेंच बनाने के लिए दस्तक दे। निजी काॅलेज खोलने के नाम पर जब सुप्रीम कोर्ट 11 जजों की बेंच बना सकता है तो नागरिक आज़ादी के आसमान का क्षितिज तय करने के लिए एक बड़ी बेंच क्यों नहीं बनाई जानी चाहिए।

(कनक तिवारी वरिष्ठ अधिवक्ता और लेखक हैं।)

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