विमर्श

यह केवल पंजाब के किसानों का आंदोलन नहीं, दमन से बाज आए मोदी सरकार

Janjwar Desk
30 Nov 2020 10:30 AM GMT
यह केवल पंजाब के किसानों का आंदोलन नहीं, दमन से बाज आए मोदी सरकार
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मोदीवादी और संघी आंदोलन को विभाजनकारी बतलाकर राष्ट्रवाद का एजेंडा वैसे ही आगे बढ़ा रहे हैं, जैसे मुसलमानों को लेकर, तबलीगी जमात को लेकर अब तक बढ़ाते रहे हैं...

रामस्वरूप मंत्री की टिप्पणी

जनज्वार। देश का किसान आंदोलन महत्वपूर्ण दौर में पहुंच चुका है। पंजाब के किसानों ने पंजाब से दिल्ली आने वाले दो हाईवे पर लाखों की संख्या में डेरा डाला हुआ है तथा 50 किलोमीटर का जाम लगा हुआ है। पंजाब के किसान 6 महीने के राशन पानी की व्यवस्था के साथ पहुंचे हैं।

आजादी के बाद देश में किसी आंदोलन पर सबसे ज्यादा आंसू गैस के गोले चलाने, किसान नेताओं पर हत्या के प्रयास का मुकदमा दर्ज कराने, सड़कों को खोदकर उनका रास्ता रोकने, उन पर लाठी चलाने वाली और उन्हें बदनाम करने के लिए अपमानजनक आरोप लगाने वाली मोदी सरकार को किसानों से माफी मांगनी चाहिए और बिना किसी शर्त के तत्काल देश विरोधी तीनों कानूनों को वापस लेना चाहिए। कम से कम उसे हर हाल में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर किसानों की फसल खरीद की शर्त को शामिल करने की घोषणा करनी चाहिए।

यह केवल पंजाब के किसानों का आंदोलन नहीं है। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश सहित कम से कम छह राज्यों से किसान दिल्ली आने की कोशिश कर रहे हैं। इनमें से तीन राज्यों में भाजपा का शासन है, इन तीनों राज्यों का प्रशासन ही किसानों को दिल्ली आने से रोकता हुआ दिखा है।

किसानों ने पहले ही कह दिया था कि हम दिल्ली आ रहे हैं, लेकिन सरकार ने उन्हें मनाने के लिए क्या किया? प्रश्न है, आखिर देश के किसान क्यों इतने उत्तेजित हैं? उसके कुछ कारण हैं, जो बहुत वर्षों से किसानों की उपेक्षा की वजह से पैदा हुए हैं। केंद्र सरकार कोरोना के बीच ही तीन कानून ले आई। मोदी सरकार ने कहा, पुराने कानून अच्छे नहीं हैं, नए कानूनों से किसानों का भला होगा।

जिस तेजी में राज्यसभा से ये विधेयक पारित कराए गए, उस पर भी प्रश्नचिह्न उठे थे। तब जो विरोध हुआ था, उसमें कुछ विपक्षी सांसदों को निलंबित भी कर दिया गया था। सांसदों को समझाने में भी नाकामी हासिल हुई। अव्वल तो किसानों के साथ समन्वय नहीं बनाया गया था, संवाद कायम करने की बात तो भूल ही जाएं। लंबे समय से भाजपा का सहयोगी रहा शिरोमणि अकाली दल विरोध स्वरूप सरकार व गठबंधन छोड़ गया। आप उन्हें मना नहीं पाए। नाराजगी का कारण समझने की गंभीर कोशिशें नहीं हुईं।

हमारे यहां किसानों को लेकर बड़ी-बड़ी बातें होती रही हैं, 'जय जवान जय किसान', 'भारत एक कृषि प्रधान देश है', पर आज सबसे ज्यादा जोखिम खेती-किसानी में ही है। ऐसे जोखिम में जिंदगी बिताने वाले किसानों की राह सरकार रोक रही है। हास्यास्पद है कि कोरोना के बहाने किसानों को रोकने की कोशिश हुई। बल प्रयोग या उपेक्षा से कतई समाधान नहीं निकलेगा, संवाद-समन्वय के रास्ते किसानों को आश्वस्त करना होगा।

किसानों की बड़ी शिकायत है कि उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिलेगा। सरकार बोल रही है कि मिलेगा, लेकिन उसने इसके लिए नए कानून में प्रावधान नहीं किए हैं। किसानों को लिखकर आश्वस्त नहीं किया गया है । वे तो यहां तक आशंकित हैं कि उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी कम कीमत पर अनाज बेचना पडे़गा।

सरकार कह रही है कि ऐतिहासिक कानून है, किसानों को बिचौलियों से आजादी मिलेगी, आय दोगुनी हो जाएगी, तो किसान आखिर क्यों नहीं इस पर विश्वास कर रहे? क्योंकि ऐसे वादे बहुत सरकारों ने किए, पर ऐसा कभी हुआ नहीं है। आप जो नया कानून लागू कर रहे हैं, किसान समझते हैं कि इससे बड़ी कंपनियों को मदद मिलेगी। इनसे छोटे किसान कैसे लड़ पाएंगे? क्या हमारी सरकारों ने किसानों को इतना मजबूत कर दिया है कि वे बड़ी कंपनियों के हाथों शोषित होने से बच सकें? किसानों के बीच डर है, जिस पर सरकार को ध्यान देना चाहिए।

हमारे यहां करीब साढ़े छह लाख गांव हैं, लेकिन इन गांवों में ज्यादातर किसानों के पास बहुत कम जमीन है। किसानों के पास औसतन ढाई एकड़ जमीन है। देश में 85 प्रतिशत से ज्यादा छोटे किसान हैं। गांव में जो लोग रहते हैं, उनमें से करीब आधे भूमिहीन हैं। आधे से ज्यादा जमीन पर सिंचाई की व्यवस्था नहीं है।

वित्त मंत्री से लेकर किसान तक इंद्रदेव की प्रार्थना करते हैं। इसके बावजूद भारत में जमीन बहुत ही कीमती चीज है, क्योंकि देश में विश्व के करीब 18 प्रतिशत लोग रहते हैं, पर दुनिया की ढाई प्रतिशत से भी कम जमीन यहां है। हमारे सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का हिस्सा 14-15 प्रतिशत तक गिर आया है। समस्या यह है कि देश की आबादी के आधे लोग कृषि पर निर्भर हैं। करीब 66 प्रतिशत ग्रामीणों की जीविका कृषि पर निर्भर है।

किसानों ने रामलीला मैदान मांगा था, लेकिन उन्हें बुराड़ी मैदान दिया गया जो कि दिल्ली के बाहर है। वहां हजारों की संख्या में पुलिस और अर्धसैनिक बल किसानों को घेरने की तैयारी में है इसलिए किसान वहां नहीं जाना चाहते। किसानों में मन मे संदेह तभी पैदा हो गया था जब दिल्ली में 6 स्टेडियमों को जेल में तब्दील करने की बात चर्चा में आई थी।

केंद्र सरकार और उसका गोदी मीडिया किसान आंदोलन को बदनाम और विभाजित करने में दमखम से लगा हुआ है। गोदी मीडिया बेशर्मी के साथ आंदोलन को खालिस्तान समर्थकों, पाकिस्तान समर्थकों, पृथकतावादीयों का आंदोलन साबित करने के लिए हर किस्म के तिकड़म और षड्यंत्र कर रहा है।

एजेंसियों की कोशिश है कि पंजाब के 30 किसान संगठनों में अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति की वर्किंग ग्रुप में तथा संयुक्त किसान मोर्चा में फूट पैदा की जाए। अभी तक एजेंसियों को सफलता नहीं मिली है, लेकिन प्रयास जारी है। पंजाब के किसान संगठन दिन-रात बैठकें कर एक-एक मुद्दे पर लगातार स्पष्टता एवं एकजुटता बनाए रखने के लिए सतत प्रयासरत हैं।

पंजाब के किसान जब भी बात करते हैं तो वह पंजाब के गौरवशाली इतिहास पर बोलते हैं। यह सिख किसान यह बतलाता है कि कैसे सिक्खों ने मुगलों, अंग्रेजों से वीरता पूर्वक संघर्ष कर उन्हें परास्त किया था। वे खुलेआम घोषणा करते हैं कि अब नरेंद्र मोदी की बारी है।

तीन किसान विरोधी कानून के खिलाफ केंद्र सरकार से मुकाबला करने के संदर्भ में पूरे देश में पंजाब का किसान सर्वाधिक चेतनशील दिखलाई पड़ रहा।

देश के 5 वामदलों के साथ कांग्रेस, डीएमके, राष्ट्रवादी कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल, सोशलिस्ट पार्टी इंडिया, एसयूसीआई ने किसानों के प्रति केंद्र सरकार की दमनकारी नीतियों की आलोचना की है एवं राष्ट्रपति से मुलाकात करने की घोषणा की है।

आज जब सरकार के प्रति उपजे गहरे अविश्वास के कारण किसान सड़कों पर हैं, तब भी प्रधानमंत्री द्वारा की गई मन की बात में इन कानूनों को वापस लेने और किसानों के साथ किए दुर्व्यवहार पर एक शब्द नहीं बोला गया। उलटे वह अभी भी देशी विदेशी वित्तीय पूंजी और कॉरपोरेट घरानों के मुनाफे के लिए देश की खेती-किसानी को बर्बाद करने वाले अपनी सरकार द्वारा लाए कानूनों का बचाव ही करते रहे।

गृह मंत्री शर्तें रखकर किसानों को वार्ता के लिए बुला रहे हैं, जबकि किसानों की मांग साफ है कि देश विरोधी तीनों कानूनों को सरकार को वापस लेना चाहिए और कम से कम कानून में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर फसल खरीद की बाध्यता का प्रावधान जोड़ना चाहिए। ऐसी स्थिति में सरकार को किसानों की मांग पर अपना पक्ष स्पष्ट करना चाहिए, न कि किसानों और उनके आंदोलन को बदनाम करने और उसका दमन करने में अपनी ऊर्जा लगानी चाहिए।

केंद्र सरकार के मंसूबों को पंजाब के किसानों ने समझ लिया है, इसलिए भी सड़कों से हटने को तैयार नहीं है। किसान संगठनों (पंजाब संगठनों, अखिल भारतीय किसान सँघर्ष समन्वय समिति - संयुक्त किसान मोर्चा) ने सरकार के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया है। सरकार ने किसानों के खिलाफ माहौल बनाने के लिए तमाम रोड पर कृत्रिम जाम लगाने शुरू कर दिए हैं, ताकि जनता किसान आंदोलन के खिलाफ बोलने लगे।

किसान आंदोलन को सरकार, मीडिया और देश का ध्यान आकृष्ट कराने में अब तक सीमित सफलता मिली है। मोदीवादी और संघी आंदोलन को विभाजनकारी बतलाकर राष्ट्रवाद का एजेंडा वैसे ही आगे बढ़ा रहे हैं, जैसे मुसलमानों को लेकर, तबलीगी जमात को लेकर अब तक बढ़ाते रहे हैं। अन्नदाता किसान आंदोलनकारियों को देश का दुश्मन साबित करने का प्रयास किया जा रहा है।

किसान आंदोलन ऐसे निर्णायक दौर पर पहुंच चुका है जब देश के किसान आंदोलन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि बड़ी संख्या में सड़कों पर निकल कर किसान विरोधी कृषि कानूनों और बिजली बिल 2020 को रद्द कराने के इस संघर्ष में पूरी ताकत से शामिल हों तथा इसे रद्द कराएं।

(लेखक इंदौर के वरिष्ठ पत्रकार, सोशलिस्ट पार्टी इंडिया मध्य प्रदेश इकाई के अध्यक्ष तथा किसान संघर्ष समिति मालवा निमाड़ के संयोजक हैं।)

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