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विमर्श

आखिर मैंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को क्यों छोड़ा ?

Janjwar Desk
25 July 2020 3:30 AM GMT
आखिर मैंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को क्यों छोड़ा ?

इस संगठन के लिए जब मैंने काम करना शुरू किया तो मैं 18 साल का था। उस समय मैं बीएससी प्रथम वर्ष का छात्र था और प्रत्येक दिन स्थानीय नेताओं और आरएसएस के कार्यकर्ताओं से मिलता था और संगठन के कार्यों में हिस्सा लेता था, कुछ समय बाद मैं दक्षिणी मुंबई का जिला सह-सचिव बना, फिर बाद में जिला सचिव और राज्य कार्यकारिणी का सदस्य बना दिया गया.....

जय खोलिया की टिप्पणी

जवान होते ही अगर राजनीति करने का मौका हाथ लग जाये तो इन दो तरीकों से आपका जीवन प्रभावित हो सकता है। पहला, आप एक ऐसा मार्ग चुन सकते हैं जिसपर चलते हुए आपको संघर्ष तो करना पड़ता है लेकिन इसके बावजूद सुकून मिलता है। दूसरा, आप एक ऐसे मार्ग पर निकल सकते हैं जो आपको भटका दे और मुख्य उद्देश्य तक न पहुंचने दे।

दुर्भाग्य से दूसरे मार्ग पर प्रशस्त होना ही मेरी नियति बनने जा रही थी लेकिन तभी मेरे अंतर्मन ने मुझे कुछ और ही कदम उठाने को बाध्य कर दिया और यह कदम था सत्ता का त्याग कर सत्य की राह पर निकल पड़ना।

2014 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री की गद्दी पर विराजमान करने वाली भगवा आंधी के थपेड़ों ने बहुत सारे उत्साही युवकों को मन-वचन-कर्म से नई सरकार का घोर समर्थक बना दिया था। इनमें से बहुत सारे युवा पहले के भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए कुछ करना चाहते थे और इसीलिए काला धन और गरीबी के मुद्दों का निपटारा करने का सांस रोके इंतज़ार करते रहे क्योंकि ऐसा करने का उनसे वादा किया गया था।

इन युवाओं में मैं भी एक था। राष्ट्र के लिए कुछ कर गुजरने के लिए मेरी बाहें फड़कने लगी थीं और मैं धीमी चाल से चलने वाली नौकरशाही और राजनीतिक व्यवस्था को बदल देने के लिए जो कुछ भी कर सकता था वो करना चाह रहा था। यही वो समय था जब मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी से जुड़े दक्षिणपंथी विद्यार्थी संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (एबीवीपी) के संपर्क में आया।

इस संगठन के लिए जब मैंने काम करना शुरू किया तो मैं 18 साल का था। उस समय मैं बीएससी प्रथम वर्ष का छात्र था और प्रत्येक दिन स्थानीय नेताओं और आरएसएस के कार्यकर्ताओं से मिलता था और संगठन के कार्यों में हिस्सा लेता था। कुछ समय बाद मैं दक्षिणी मुंबई का जिला सह-सचिव बना, फिर बाद में जिला सचिव और राज्य कार्यकारिणी का सदस्य बना दिया गया। तब तक संगठन में काम करने वाले बहुत से लोगों के साथ मेरे दोस्ताना संबंध बन चुके थे।

तभी 2019 के लिए जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी छात्र संघ के चुनावों की घोषणा हुई। अपने दो साथियों के साथ मैंने मुंबई से दिल्ली के लिए प्रस्थान किया। दूसरी विचारधाराओं से सीधे रु-ब- रू होने और अपने खुद के संगठन के गुप्त एजेंडे को समझने का यह मेरे लिए पहला मौका होने जा रहा था।

जेएनयू में मेरी उपस्थिति संगठन प्रतिनिधि के रूप में ही थी और मैं वहां रहते हुए यह समझना चाहता था कि चुनाव कैसे संपन्न होते हैं। मैं लगभग दो हफ़्तों तक वहां रहा और इन दो हफ़्तों के वहां मेरे प्रवास ने मेरे उस निर्णय को बहुत कुछ प्रभावित किया जो मैं अब लेने जा रहा था।

जेएनयू में रहते हुए मुझे वामपंथी विचारधारा के बारे में और अधिक सीखने को मिला। पिछले कई सालों के दौरान अपने संगठन द्वारा किये गए दुराचारों के प्रति भी मैं जागरूक हुआ। मुझे जेएनयू के कुछ छात्रों से मिलने का मौका मिला और ये मुलाकातें मेरी आँख खोलने वाली साबित हुईं।

चुनाव ख़त्म होने पर जेएनयू छोड़ते हुए मैंने इस 'दौर' को भी पीछे छोड़ दिया। मुंबई लौटकर एक बार फिर मैंने खुद को संगठन के कार्यों में व्यस्त कर लिया लेकिन नागरिकता संशोधन कानून पास होने के बाद सब कुछ पहले जैसा नहीं रहा, हालांकि बार-बार हमसे कहा गया कि यह क़ानून भारत के मुसलमानों पर रत्ती भर भी असर नहीं करेगा और यह कि 'पाकिस्तान में हिन्दू खतरे में हैं।'

मेरे नेतृत्व में 19 दिसंबर को नागरिकता संशोधन क़ानून के समर्थन में एक मार्च निकाला गया लेकिन कहीं अंदर ही अंदर मैं महसूस कर रहा था कि सब कुछ ठीक नहीं है। आपकी ज़िंदगी में वो वक़्त भी आता है जब आपकी अन्तरात्मा आपके भौतिक वजूद से घृणा करने लगती है। मेरे लिए वो वक़्त आ चुका था।

मेरा ह्रदय परिवर्तन हो रहा था और ऐसा कुछ हद तक हमारे मुसलमान भाइयों के खिलाफ हो रहे अत्याचार के कारण था। लेकिन साथ ही एक कारण यह भी था कि हमारा संगठन छात्रों की असल आवाज़ बनने के बजाय संघ परिवार की प्रचार करने वाली एक और इकाई के रूप में कार्य कर रहा था।

अपने निर्णय को लेकर बेचैनी में जाग कर काटी गयी अनेक रातों और सोचते-सोचते बिताये गए अनेक दिनों के बाद आखिर नूतन वर्ष का स्वागत मैंने संगठन को अलविदा कह कर किया। यहां तक कि एक औपचारिक पत्र के माध्यम से इसकी सूचना भी संगठन को नहीं दी। वैसे भी संगठन में औपचारिकता जैसी कोई बात होती नहीं है।

मैं चाहता तो संगठन में शीर्ष तक पहुंच सकता था। वहां 'उज्जवल भविष्य' मेरी बाट जोह रहा था, जैसा कि मुझसे कहा गया था लेकिन मुझे असली खुशी तो मुंबई की सड़कों पर नागरिकता संशोधन क़ानून के खिलाफ आवाज़ उठाते हुए मिली थी। मैं अपने मुसलमान भाइयों के साथ एकता का प्रदर्शन करते हुए खड़ा था, उनके साथ मिलकर नारे लगा रहा था और 'हम देखेंगे' तथा 'बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे' जैसी क्रांतिकारी कविताएं और गीत गा रहा था।

मेरे अंदर क्रांति जन्म ले चुकी थी। दक्षिण से वाम की यह यात्रा केवल कुछ साहित्य पढ़ लेने का परिणाम नहीं थी। यह परिणति थी प्रत्येक भारतीय के साथ एकजुटता का प्रदर्शन करती सड़कों पर उतर आई मोहब्बत का।

इस तरह मेरे जीवन का वो अध्याय समाप्त हुआ जिसमें मैं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् का सदस्य बना था, कुछ उसी तरह जैसे एक नौसिखिया अभी-अभी जवान हुआ खुले दिमाग वाला युवक एक विशाल दुनिया में प्रवेश करता है और अब शुरू होती है एक ज़िम्मेदार नागरिक के रूप में मेरी यात्रा।

(वर्तमान में जय खोलिया मुंबई में समाज शास्त्र और राजनीति शास्त्र में बी. ए. की पढाई कर रहे हैं। उनका यह लेख साभार द वायर से लिया गया है।)

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